दिन विशेष कविता में आशा बर्मन की कविताएँ
मूलतः कोलकाता, पश्चिम बंगाल की आशा बर्मन इन दिनों टोरंटो, ओंटारियो, कनाडा में रहती हैं।
‘कही-अनकही’ आपका प्रथम काव्य-संकलन है, जिसका प्रकाशन हिंदी राइटर्स गिल्ड द्वारा वर्ष 2011 में किया गया। कविताएँ, नाटक तथा संस्मरण आपके लेखन विधा की विशेषताएँ हैं। आप लगभग 30 वर्षों से हिंदी परिषद, हिंदी साहित्य सभा तथा हिंदी राइटर्स गिल्ड आदि हिंदी संस्थाओं के साथ सक्रिय रूप से कार्यरत।
संपर्क: aburman384@gmail.com
मौन बहुत है
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो।
माना कि तुम व्यस्त बहुत हो,
जीवन द्रुत है, त्रस्त बहुत हो।
अंतर्मन की परतों को निज
अब तो धीरे-धीरे खोलो।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो।
दूर कहीं कोई चिड़िया चहकी,
पास कहीं पर जूही महकी,
मधुर-मादक परिवेश है छाया,
वाणी का इसमें रस घोलो।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो।
पहले तुम थे बहुत चहकते,
यूँ ही कुछ भी कहते रहते,
इस गंभीर मुखौटे को तज,
क्यों न पहले जैसे हो लो।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो।
जो अंतर में, मुझे बताओ,
कह सब कुछ हल्के हो जाओ।
अपने मन के मनकों को
प्रेम-पगे तारों में पिरो लो।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो।
बीते ऐसे दिन
बीते ऐसे दिन बहुतेरे।
बीते दिन, बीती रातों में,
स्मृतियों के बढ़ते से घेरे।
बीते ऐसे दिन बहुतेरे॥
बचपन के सुंदर सपनों में
छिपा हुआ सुखमय संसार।
सहज-प्राप्य अभिलाषाओं में
भरा हुआ सुख-चैन अपार॥
सब थे अपने, सुंदर सपने,
जागा करते साँझ-सवेरे।
बीते ऐसे दिन बहुतेरे॥
कुछ उजला और कुछ अँधियारा,
संध्या का धूमिल गलियारा।
खोज रही थी मेरी आँखें
दो हाथों का सबल सहारा॥
भावों से भीगे-भीगे से
कुछ पल तेरे, कुछ पल मेरे।
बीते ऐसे दिन बहुतेरे।
जीवन ने निज वरदहस्त से
मुझ पर कितना कुछ बरसाया।
सुख से घिरी रही, पर मन में
यह कैसी उदास-सी छाया?
सतरंगों से सजी अल्पना,
पर किसने ये रंग बिखेरे?
बीते ऐसे दिन बहुतेरे।

