दिन विशेष कथेतर : “जीवन यात्रा और गंतव्य” – मीरा गोयल
इस संस्मरण में मीरा गोयल दो देशों नामत: भारत और अमरीका की जीवन-शैलियों का विवरण देती हैं. जन्म-स्थान वाराणसी में अमरीका में रहते हुए अपने प्रवास-पूर्व के अनुभवों का साझा करते हुए अनजाने में ही दोनों देशों की जीवनचर्या का दिलचस्प ब्योरा पेश करती हैं. सरल-सहज भाषा में इस आलेख को उन्होंने पठनीय बनाया है। अवश्य पढें और लेखिका के आत्मीय व्यक्तित्व से परिचित हों। – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र, संपादक
मीरा गोयल
जन्म-स्थान : वाराणसी, उ.प्र., भारत
सम्प्रति, अमरीका में प्रवास और स्वतंत्र लेखन
ई-मेल : madeera.goyal@gmail.com
आज जीवन के चौथे प्रहर में इस बीते जीवन का परीक्षण करने से प्रकृति का रहस्य खुलकर सामने आया है और मैं बरबस मुस्कुरा रही हूँ। इस जीवन ने अनेक गलियों में भटकाया है और बहुत कुछ दिखाया है! रुलाया, हँसाया, विस्मित और भ्रमित किया है; पर, मैं भाग्य को जीवन-निर्णय समर्पित कर पूरी आस्था से जिजीविषा का हाथ थामे चलती रही हूँ। आज की मुस्कान उस पीड़ा को समर्पित है, जिसने समय से पहले अपना रहस्य प्रकट नहीं किया। आज मैं विह्वल हो जाने वाले उस अनचाहे दर्द की महत्ता को समझती हूँ और स्वागत करती हूँ।
सुशिक्षित धन-धान्य और मान-सम्मान से संपन्न परिवार में बीता बचपन, जहाँ बहुत रहते हुए भी कम से निर्वाह करने की परम्परा थी और हम खुश थे। हम सब के पास कुछ कपड़े और एक जोड़ी जूता या चप्पल होती थी, घिस-टूट जाने पर दूसरा दिला दिया जाता था। आज के बच्चों के पास आवश्यकतानुसार अनेक जोड़ी जूते रहना अनिवार्य समझा जाता है। नौकर कूएँ से एक बार में दो बाल्टी पानी कन्धे के सहारे लाता था, पूरे घर के काम के लिये| साँझ पहर चार लालटेन जलाई जाती थी। एक बाल्टी पानी से स्नान कर के हम संतुष्ट थे, आज शावर में शरीर को छूता हुआ अंगणित जल नाली में बह जाता है और नहाने वाला अनभिज्ञ!
उन दिनों हम कितने ही काम अँधेरे कमरे में टटोलकर, कर लिया करते थे। गर्मियों में हाथ का पंखा झलकर राहत पाते थे। कभी खाना खाते समय बाबूजी को माँ, दादी पंखा झल देती थीं, कभी नौकर| आज की पीढ़ी के बच्चे बिजली का पंखा और बत्ती जलता छोड़ कमरे से बाहर निकलते संकोच नहीं करते। बगैर प्रयास के आसानी से मिली सुविधा और वस्तु का मूल्य नहीं होता! क्या विडम्बना है मानव मन की!
मेरा जन्म, शिक्षा, संस्कार भारत की प्राचीनतम नगरी काशी में हुआ। परम्परानुसार वैवाहिक जीवन आरम्भ हुआ, फिर जीवन ने करवट लिया और मैं अपने छोटे से परिवार के साथ विश्व के दूसरे छोर पर अमरीका में आ बसी। यहाँ के तौर तरीके हर अवसर पर मेरी शिक्षा और सभ्यता को चुनौती देते हुए लगे। जब आप किसी के घर अतिथि हैं तो बिना कहे ही गृह कार्य में मदद करना हमारी सभ्यता ने सिखाया था, पर यहाँ इसे दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप और अवांछित माना जायेगा। बगैर अभिभावक की अनुमति के उनके बच्चे को ‘कैंडी’ देना भी उचित व्यवहार न समझा जायेगा| यदि अतिथि कागज़ में लिपटा रिबन से बंधा उपहार मेज़बान के लिए लाता है, तो उसे खोल कर प्रशंसा के दो शब्द कहना सहज और अपेक्षित व्यवहार होगा, भारत में ऐसा व्यवहार अनपेक्षित और असाधारण लगेगा। दोनों देशों की सभ्यता, शिक्षा और सामाजिक मूल्यों ने भ्रमित किया पर विवेक बुद्धि से दोनों का समन्वय कर अपना पथ और समाज में स्थान बनाने का सुअवसर मिला, जिसके लिये मैं कृतज्ञ हूँ, प्रसन्न हूँ!
उन दिनों भारत में लड़कियों को उनके कर्तव्य की शिक्षा, बार बार याद दिलाई जाती थी पर जीवन में उनके कुछ अधिकार भी हैं, इसकी चर्चा कभी नहीं होती थी। उनका स्थान परिजनों के सौहार्द पर निर्भर रहता था। बड़ों की आज्ञा पालन करना सर्वोपरी धर्म माना जाता था। यहाँ पश्चिम में इसका सम्मान नहीं है| यहाँ अपना स्थान स्वयं बनाने और खोजने में शान है। धन और सुविधा रहते हुए भी माता-पिता अपनी संतान को स्वावलम्बी बनाने के लिए पढ़ाई के साथ कुछ काम करके धनोपार्जन की महत्ता सिखाते हैं। यहाँ मेहनत और ईमानदारी से किया कोई काम छोटा नहीं माना जाता; पर, भारत में यह विचार प्रचलित नहीं है। मेरे थियोसोफिस्ट पिता का यह मानना था कि बच्चे सप्ताह में छ: दिन स्कूल में सारे दिन घंटों किताबी शिक्षा के लिये बिताते हैं और घर आकर भी उन्ही पुस्तकों (पाठ्यक्रम की पुस्तकों) का अध्ययन करते रहेंगे तो जीवन के पूर्ण विकास के लिये अन्य शिक्षा और ज्ञानोपार्जन कब करेंगे! बच्चों को निरुदेश्य खेलने और दिवास्वप्न देखने का भी तो समय चाहिए। प्रकृति की मूक शिक्षा और सौन्दर्य को आत्मसात करने के लिये भी समय चाहिए! शिक्षा आत्म ज्ञानवर्धन के लिये होती है, किसी से होड़ लेने और जीतने के लिए नहीं। आज के भागमभाग जीवन की प्रतिस्पर्धा में किसी के पास समय नहीं है। पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों को भी प्रतिदिन ‘होम वर्क’ मिलता है। बच्चा थका हो तो माँ उसका काम निपटाती है। वह अपने बच्चे को दूसरों से पीछे क्यों रहने दे! यह है समय की मांग! जो न निभाए वह पीछे छूट जायेगा!
भारत में हमारी शिक्षा थी कि लावारिस वस्तु को वहीं पड़ा रहने दो, जिसका है आकर ले जायेगा। यदि तुमने उठाया तो उस वस्तु को मालिक तक पहुँचाने का बीड़ा लिया, और वही तुम्हारा धर्म बन जाता है। अमेरिका आये तो देखा कि ‘finders keepers, losers weepers’ का नारा बुलंद था। पूरब और पश्चिम दो विपरीत दिशा में स्थित, विपरीत विचारों से रहते और अपनी जीवन-शैली पर गर्व करते हैं। अपने हृदय की सुनो, (follow your heart )–यही है अपने प्रति सच्चे होकर जीना और पश्चिम की परिभाषा।
पूरबी कहता ‘मन तो बन्दर है’, अकारण मचलना और दूसरों की नक़ल करना उसका स्वभाव है। पटल पर तैरते विचारों को आने जाने दो। अपनी विवेक-बुद्धि से प्रतिक्रिया का निर्णय लो। हम मनुष्य हैं, ईश्वर की श्रेष्ठतम कृति! पशुवत व्यवहार अशोभनीय है।
दोनों सभ्यता के ज़्प्ज़्न्द-अपने तर्क हैं! अमेरिका आने के लिए मैं पहली बार हवाई जहाज पर बैठी, और यहाँ प्रायः बच्चे गर्भ में ही ऐसी यात्रा कर चुके होते है। वयस्क होने के बाद हिमपात का प्रथम दर्शन एक अद्भुत अनुभूति थी।भारत में अंतर्देशीय पत्र भेजा और पाया जाता था, जिसमें प्रतीक्षा और धैर्य की परीक्षा हो जाती थी। आज ‘ईमेल’ और ‘फेस टाइम’ से विश्व की दूरियाँ सिमट गयी हैं। बदलाव दो देशों और सभ्यताओं का ही नहीं है, प्रगतिशील समय की मांग है! मेरे पिता का थियोसोफिस्ट विचार था ‘I will rather be deceived than disbelieve’ इसी में मानसिक शांति है, क्योंकी दुनिया में ईमानदार लोगोंकी संख्या धोखेबाजों से अधिक हैं। इस शैली से कुछ धोखे भी खाए पर मूल रूप से सम्मान और शांति का सफल जीवन व्यतीत किया।
अब शायद, मात्रा में बदलाव आ गया है। आज के माहौल में ऐसे व्यवहार को नासमझ और मूर्खता का स्थान मिलता है। व्यक्ति और परिस्थिति भिन्न-भिन्न होने के कारण विश्वास करने की आदत से कई बार चोट खाकर भी शिद्दत से सीखी शिक्षा को नकारना आसान नहीं। प्रारंभिक विकास काल में बच्चों को भाषा, व्यवहार और विचार करने का तरीका सिखाया जाता था, इस विश्वास के साथ की बड़े लोग अनुभवी हैं, जीवन देखा है, वे जानते हैं! आज का विश्वास है कि इस तेजी से प्रगतिशील समाज में जन्मे बच्चों से सीखो जिनके विचार किसी पुराने अनुभव से दूषित और प्रभावित नहीं हैं। ये आधुनिक शिक्षा से नए विचार, नए समाधान प्रस्तुत करेंगे।
आवश्यकतानुसार बदलाव प्रकृति का नियम है और यही इसके आकर्षण का रहस्य भी! मोटर-गाड़ी में पेट्रोल हो और ‘जीपीएस’ में ‘पता’ तो आप कहीं भी आसानी से ड्राइव करके पहुँच सकते हैं–यही है आधुनिक सुविधा का चमत्कार! अपनी भारतीय शिक्षा और मान्यताओं ने निरीह कोमल आज्ञाकारी मन को बहुत भटकाया।
‘अपने लिए जिये तो क्या जिये…’
‘बिच्छू अपना धर्म करता है, ब्राह्मण अपना।’
ऐसी शिक्षा आज के बुद्धिजीवियों को शोभा नहीं देती; पर, मैं विनम्रता का चोला पहने अपनी धुन में चलती रही। अहं ने आत्मा को दबोचकर गौरव से दुःख भोगा। नहीं समझ पाई थी कि ये भुलावा है। बार-बार की हार और लक्ष्य-प्राप्ति के अभाव से तन्द्रा टूटी और संसार में सफलता की प्रथम शिक्षा मिली! आत्मविश्वास और आत्मस्नेह आवश्यक है, दूसरों का स्नेह और सम्मान पाने के लिये। यह स्वाभाविक है कि जब हम अपने को निरीह अज्ञानी और कमज़ोर प्रस्तुत करेंगे तो दया और अवहेलना ही मिलेगी! हार, पीड़ा और तिरस्कार, जिसे अपना दुर्भाग्य समझती रही, सब स्वनिर्मित था। अपने से ज्यादा दूसरों के कथन पर विश्वास किया, इस भूल को समझने पर मेरी उन्मुक्त हँसी ने स्वयं मुझे चौका दिया। प्रकृति का रहस्य समझ में आया। अपने प्रति स्नेह और विश्वास बिना दूसरों से सम्मान पाने की अपेक्षा करना व्यर्थ है। हमारे व्यवहार और कथन से लोग हमारा मूल्यांकन करते हैं। अपनी कमियों का इज़हार करना, अपने ऊपर कुल्हाड़ी मारना है।
जीवन उपहार की रक्षा और स्नेह देना हमारा कर्तव्य है। जीवन के दोराहे पर सही मार्ग का चुनाव और कठिन लोग हमें अपने अन्दर निहित शक्ति को निखारने और कुछ सिखाने आते हैं। इस अवसर को चूकना हमारी नादानी होगी। अर्धसुसुप्तावस्था में चलते जाने से रास्ता भटक सकते हैं। आत्मसंतोष और मानसिक शांति का सफल जीवन सचेत रहकर ही संभव है। शिक्षा में बल है। स्त्रियों को अशिक्षित रखना पुरुष समाज की साज़िश थी। उत्पीड़न के आधिक्य से नारी जगत में जागरण आया और समाज को बदलना पड़ा। जन्मसिद्ध अधिकार सीधे न मिले तो लड़कर लेने की ललक जागी और नए युग का निर्माण हुआ।
भिन्न होते हुए भी स्त्री पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं, जैसे नदी के दो किनारे! दोनों के समन्वय से ही सरल जीवन-प्रवाह संभव है और इहलोक का पूर्ण आनंद! भारत में सम्पन्न परिवारों में सेवा पाने का सुख है जो अमेरिका में इतना आसन नहीं है; पर, यहाँ के जीवन में मानसिक स्वतंत्रता है जो मुझे आकर्षक और प्रिय लगती है। यहाँ हम मुख्य रूप से अपने लिए, अपनी तरह से जीते है और प्रतिफल भोगते हैं। भारत में हर मोड़ पर निर्देश पालन कुछ अर्थों में जीवन को आसान बनाता था; पर, अंत में हम सोचते हैं, मैंने अपना जीवन, अपने सपने जिये ही कहाँ और यात्रा का दूसरा छोर आगया!
प्रायः अन्याय होता तभी है, जब हम अपने प्रति कोई कर्तव्य नहीं समझते और ऐसा होने देते हैं। सब अपना सफल जीवन जीने के प्रयास में व्यस्त होते हैं, अपने को उनके विचार और व्यवहार के केंद्र में समझना अपनी अनावश्यक महत्ता का प्रदर्शन होगा! यहाँ युवक-युवातियाँ अपने जीवन का कठिन, अनजाना मार्ग चुनते हैं, सुख और आनंद के सपने के साथ। यदि स्वप्न भंग भी होता है तो इतना संतोष रहता है कि यह मेरा अपना निर्णय था। अनुभव से जो सीखा उसका पाथेय लिए पुनः जीवन मझदार में कूद पड़ते हैं। अनुभव ही तो जीवन-धन है! असफलता के भय से नये अनुभव को नकारते गये, तो क्या जिये! अनुभव से सीखना, गिरकर दुबारा उठने का हौसला आवश्यक है, वहीं जीवन की सफलता और अपने सचेत प्रयास का मधुर फल निहित है। आँखे अपने को स्वयं नहीं देख सकती। यदि कोई दर्पण दिखाए तो सहायक है, दुश्मन नहीं! हमें कृतज्ञ होना चाहिये! गंतव्य तक पथ प्रदर्शन के लिए प्रकृति ने जाने कितने ही जाने अनजाने सहायक और अवसर प्रदान किये हैं। नतमस्तक, शत शत धन्यवाद!

