पुस्तक समीक्षा : ‘स्त्री और प्रेम’ : डॉ. नीलिमा पाण्डेय की काव्य-कृति पर पल्लवी रानी की समीक्षा

‘क्षणिका’ काव्य साहित्य की एक विशिष्ट विधा होते हुए भी उतनी लोकप्रिय नहीं है, जितनी होनी चाहिए. क्षणिकाओं के बहुत कम संग्रह उपलब्ध हैं। इस विधा को यथेष्ट प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता हैं। ‘क्षणिका’ विधा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि कम शब्दों में भाव-प्रवण विचार अभिव्यंजित किए जा सकते हैं। पाठक, डॉ. नीलिमा पाण्डेय के इस क्षणिका संकलन को अवश्य पढ़ें और हमें अपनी टिप्पणियों से अनुगृहीत करें! — डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र, संपादक

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पुस्तक् : “स्त्री और प्रेम”
विधा : क्षणिका (काव्य)
लेखिका : डॉ. नीलिमा पाण्डेय
प्रकाशक : प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग
प्रकाशन वर्ष :
पुस्तक का मूल्य : दो सौ रुपए
समीक्षक : पल्लवी रानी

“विचार करने का एक क्षण! व्यक्त करने को अंजुरी भर शब्द!! और पढ़ने को एक गहरी सांस!!!”

डॉ. नीलिमा पाण्डेय जी द्वारा रचित क्षणिकाओं का यह‌ अनोखा संकलन, प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत द्वारा प्रकाशित हुआ है।
यह पुस्तक मैंने विश्व पुस्तक मेला २०२६ के पुस्तक मेले से खरीदी थी। इस पुस्तक के शीर्षक ने मुझे आकर्षित किया था। साथ ही नीलिमा जी के स्नेह का भी बहुत योगदान रहा जिसके कारण विश्व पुस्तक मेले में उनके ना आ पाने के कारण मुझे उनकी पुस्तक खरीद कर उनको एक अनपेक्षित उपहार देने का विचार आया।
“स्त्री और प्रेम” सचमुच यह नाम ही एक दूसरे को अर्थ देने के लिए पर्याप्त हैं। इसमें संकलित ‘क्षणिकाएं ‘अपने नाम से ही अपना अर्थ प्रकट कर रही हैं। जैसे ही आप पढ़ना शुरू करेंगे आपको वैसी ही तीक्ष्णता का अनुभव होगा जैसे आसमान में उमड़ आई घटाओं के बीच अचानक से बादलों को चीरकर कौंधती हुई बिजली को देखकर होता है, जो अनायास ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लेती है।
इस पुस्तक की भाषा जितनी सरल है, अर्थ उतने ही ज्यादा गहरे हैं। बिना किसी जटिल अलंकार या भारी-भरकम शब्दों के जब किसी भी सामाजिक सच्चाई को सटीकता के साथ सामने रखा जाता है तो निश्चित रूप से उस अभिव्यक्ति का संयोजन पाठकों के हृदय पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।‌
इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मैं यह कह सकती हूं कि इस पुस्तक में संकलित सारी रचनाओं के भाव ही उनके अलंकार हैं, जिनमें तस्वीर के हर पहलू को बहुत ही बेबाकी से चित्रित किया है– नीलिमा पाण्डेय जी ने।
पहली रचना देखिए, जब कवयित्री कहती हैं–
“स्त्रियां ससुराल में निराश होती हैं तो
क्या मुँह लेकर नैहर जाएं,
यह सोचकर,
आत्महत्या कर लेती हैं। “

और तभी अन्तराल के बाद दूसरा सशक्त पक्ष भी सामने रख देती हैं जब वह कहती हैं–
“स्त्रियां बहुत सशक्त होती हैं,
यह बात,
पुरूषों से ज्यादा
स्त्रियों को समझने की
आवश्यकता है।”
आत्मचिंतन की तरफ ले जाती यह रचना जहां एक तरफ समाज की उदासीनता को दर्शाती हैं वहीं दूसरी तरफ, स्त्री शक्ति को भी परिलक्षित करने की क्षमता रखती हैं।
स्त्री और प्रेम का विषय जितना भावनात्मक है, उतना ही बहुआयामी भी। यह विषय स्त्री के संपूर्ण अस्तित्व, उसकी स्वतंत्रता, उसकी इच्छाओं और सामाजिक परिवेश में उसके संबंधों को भी गहराई से छूता है।
इस पुस्तक की हर रचना स्त्री के समर्पण के‌ उस उच्च भाव को चित्रित करती है, जिसमें प्रेम, स्त्री के लिए केवल पाने या खोने की अनुभूति नहीं है बल्कि यह उसके आत्म- स्वरूप से भी जुड़ा होता है। चाहे यह प्रेम एक बेटी के रुप में पिता से हो, बहन के रूप में भाई से हो, पत्नी के रूप में पति से हो या फिर प्रेमिका के रुप में अपने प्रेमी से हो। यह मुझे भी लगता रहा कि सबके लिए समर्पित हो जाने वाली स्त्रियों को स्वयं से ही प्रेम करना याद क्यों नहीं रहा!
नीलिमा जी के शब्दों में –
“आधुनिक समय आने पर भी,
माताओं ने अपने बच्चों को
उन्हीं कोमल‌ भावनाओं के साथ पाला ,
जैसे वे आदिकाल में
स्नेह से पालती थीं
अपने बच्चे।”

वहीं अंतराल के बाद दूसरा भाव
लोग करते रहे
प्रेम के विषय में बातें
प्रवचन और बहस
एक स्त्री ने
कुछ कहा नहीं किसी से
प्रेम के विषय में
बस जी लिया प्रेम में।
संवेदना की इस सूक्ष्मता तक निश्चित रूप से वही पहुंच सकता है, जिसने प्रेम जिया हो पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने लंबे समय तक प्रेम को भी नियंत्रित किया है। प्रेम को कर्तव्य के रुप मे परिवर्तित कर स्त्री की भावनाएं सीमित कर दी गईं। स्वस्थ प्रेम स्वायत्तता के साथ पहचान प्रदान करता हैं जिससे स्त्री कमजोर नहीं सशक्त होती है। साहित्य और लोककथाओं में भी स्त्री का प्रेम अक्सर बलिदान के रूप में चित्रित होता रहा है।
हिंदी साहित्य में स्त्री और प्रेम के कई रूप देखने को मिलते रहे हैं –
‘कभी वह विरह में तड़पती नायिका रही,
कभी विद्रोह करती हुई प्रेमिका।
कभी अपने आत्मसम्मान के लिए प्रेम को छोड़ देने वाली स्त्री।
एक और रचना-‘गुड़िया के पैरों में, पैंजनी पहनाई गई।‘

यह कविता सीधा हृदय को बींधती है, जिसमें यह भाव स्पष्ट है कि पैरों में पैंजनी पहनाना एक बाहरी सज्जा और दिखावटी खुशी का प्रतीक है, जो वास्तव में गुड़िया की उन बड़ी खुशियों का बलिदान कराना चाहती है जिसकी वह हकदार थी ।
यह समाज का वह दोहरा रवैया प्रदर्शित करता है जिसमें समाज कई बार व्यक्ति को अपनी इच्छाओं का त्याग कर दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने के लिए बाध्य करता है।
समग्र रुप से यह क्षणिका बल्कि मैं यह कहूँगी की इस पुस्तक में रचित ऐसी अनेक क्षणिकाएं हैं जो समाज में व्याप्त उस मानसिकता पर प्रश्न-चिह्न लगाती हैं, जहां स्त्री के व्यक्तित्व और स्वतंत्र इच्छा को दबाकर, छोटी-छोटी खुशियों के नाम पर समझौता करना सिखाया जाता रहा है। यह पाठक को सोचने पर मजबूर करती है और भीतर एक हल्की सी बेचैनी भी उत्पन्न करती है, जो कि एक सशक्त रचनाकार की पहचान है।
पुस्तक पढ़ते हुए आगे बढ़ने पर तस्वीर का एक और पहलू भी उजागर होता है जब, नीलिमा जी की अभिव्यक्ति में एक तरफ माटी-सने पैरों से धान लगाती व गेहूं काटती स्त्रियों का दिव्य स्वरूप है तो वहीं दूसरी तरफ हाथों में सीसे के ग्लास ले, चिकनी फर्श पर, फिसलती, गिरती स्त्रियां भी हैं जिनका कद माटी-सने पैरों वाली स्त्रियों के कद के आगे बौना जान पड़ता है।
एक रचना में नीलिमा जी कहती हैं –
“प्रेम को ही
सर्वोपरि मानती स्त्रियों ने
कभी परवाह नहीं की
परिवार, समाज
संसार और संस्कार की।“
आधुनिक दृष्टिकोण में परिवर्तन के दौर को अपने अंदर समेट यह क्षणिका स्त्रियों की हर मनोदशा पर आत्ममंथन करने को प्रेरित करती है, जहां अब स्त्रियां भी अपनी स्वतंत्रता को अर्थ देते-देते उसका सही अर्थ भूलने लगी हैं। मैं नीलिमा जी की इन भावनाओं से पूर्णतः सहमत भी हूँ। आज के परिवेश में स्त्री और प्रेम दोनों ही आधुनिकता के धुंध से लिपटे पड़े हैं।
अंततः मैं पल्लवी रानी की एक पाठक के रुप में “स्त्री और प्रेम” को लेकर यह जरुर कहना चाहूँगी की हम इस पुस्तक को केवल भावनात्मक रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत अनुभव के रुप में देखें। यह पुस्तक निश्चित रुप से बहुत ही सहजता के साथ अपने पाठकों को स्वयं से जोड़ लेती है। डॉ. नीलिमा पाण्डेय जी ने संवेदना के हर महीन धागे को बांधकर इतनी सुन्दरता से हर भाव को सशक्त रुप प्रदान किया है कि कोई भी पाठक “स्त्री और प्रेम” के स्पर्श से अछूता नहीं रह सकेगा।
नीलिमा पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई और अनेक शुभकामनाएं!

समीक्षक का परिचय :

पल्लवी रानी
ई-मेल – abhivyakti24@gmail.com

लेखिका का परिचय : डॉ. नीलिमा पाण्डेय

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