साक्षात्कार : “कलम में किसी भी तानाशाह की तलवार से ज़्यादा शक्ति होती है” – हिमांशु जोशी

Alkaa sinha
Himanshu joshi

दिल्ली की एक शांत, हल्की सर्द शाम। कमरे में चारों ओर किताबों का अंबार लगा है। आधी सदी से अधिक समय तक हिन्दी कथा-साहित्य और पत्रकारिता को अपने सृजन से समृद्ध करने वाले कथाकार-उपन्यासकार हिमांशु जोशी अपनी चिर-परिचित आत्मीय मुस्कान के साथ मेरे सामने बैठे हैं। आप गत चालीस वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं। ‘अंततः’, ‘मनुष्य चिह्न’, ‘जलते हुए डैने’ ‘इस बार बर्फ गिरी तो’ जैसे कहानी-संग्रहों से लेकर ‘अरण्य’, ‘महासागर’, ‘छाया मत छूना मन’, ‘तुम्हारे लिए’, और ‘कगार की आग’ जैसे उपन्यासों तक की उनकी रचनात्मक यात्रा हिन्दी साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय है। कालापानी पर आधारित कृति ‘यातना शिविर’ हिंदी साहित्य की विशेष उपलब्धि है। समस्त भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त आपकी रचनाएं अंगरेजी, नॉरवेजियन, स्लावचेक, बल्गारियन, चीनी, जापानी, बर्मी, कोरियाई, नेपाली में भी अनूदित हुईं। रेडियो, टीवी तथा रंगमंच पर भी कुछ कृतियां प्रदर्शित की गई हैं। आप इन दिनों रचना-कर्म के साथ-साथ ‘वागर्थ’ का संपादन भी कर रहे हैं। आज उनसे उनके रचनात्मक अनुभवों पर विस्तार से बात करने का इरादा करके आई हूं। चाय की चुस्कियों के साथ शुरू होता है यह आत्मीय संवाद…

अलका सिन्हा : हिमांशु जी, आपकी रचनाओं ने हिन्दी के पाठकों पर एक गहरा जादू किया है। विशेष रूप से आपकी दो कृतियों, ‘तुम्हारे लिए’ और ‘छाया मत छूना मन’ ने बहुत बड़े पाठक वर्ग को प्रभावित किया है। आज जब हम मुड़कर देखते हैं, तो आपको क्या लगता है, इस अपार लोकप्रियता के क्या मूल कारण रहे? क्या आपने लिखते समय पाठकों की इस नब्ज़ को पहचान लिया था?
हिमांशु जोशी : (चाय का घूंट भरते हुए, कुछ पल वे अपनी पुरानी स्मृतियों में खो जाते हैं। फिर वर्तमान में हाजिर होते हुए कहते हैं) देखिए अलका जी, किसी भी लेखक के लिए सटीक रूप से यह बता पाना बिल्कुल आसान नहीं होता कि कौन-सी रचना किस लिए सराही गई। लेखक कोई गणितज्ञ नहीं होता जो फॉर्मूला बनाकर लोकप्रियता तय कर ले। लेखक का काम होता है पूरी ईमानदारी से, अपनी गहरी निष्ठा के साथ, जैसा उसने अपने आस-पास देखा और जैसा जिया, उसे बिल्कुल वैसा ही व्यक्त कर देना।
यह सच है कि ‘तुम्हारे लिए’ को लोगों ने बहुत पसंद किया, उस पर काफ़ी लंबी चर्चाएँ भी हुईं और आपको याद होगा कि उस पर एक बेहद सफल टीवी धारावाहिक भी बना था। कई देशी-विदेशी भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। इसी तरह ‘छाया मत छूना मन’ का भी कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। अगर आप मुझसे इसका कारण पूछती हैं, तो मुझे लगता है कि ये दोनों ही रचनाएं कहीं-न-कहीं जिये हुए यथार्थ के बहुत निकट थीं। मध्यवर्गीय जीवन की जो कशमकश है, जो अपूर्णता है, वह इसमें थी। शायद इस कारण पाठकों ने इन पन्नों में अपना ही प्रतिबिंब देखा। रचना वही प्रभावित करती है जो सीधे हृदय से निकलती है, जिसमें लेखक के जिये हुए जीवन का अंश साफ़ दिखाई देता है। लेकिन कहानी विशुद्ध यथार्थ नहीं है, इसमें कल्पना का भी थोड़ा सा पुट तो होगा, फिर भी, उसकी ज़मीन, उसकी जड़ें यथार्थ पर ही आधारित होती है।

अलका सिन्हा : जी, इसके बिना कोई रचना चर्चित नहीं हो सकती, इसे ही दूसरे अर्थों में कालजयी भी कहा जाता है। इन दोनों उपन्यासों के बीच एक तीसरा उपन्यास भी आया था, ‘कगार की आग’। यह भी अपने समय में उतना ही चर्चित रहा।
हिमांशु जोशी : लेकिन इसकी ज़मीन बिल्कुल अलग थी। इसमें मैंने उत्तराखंड के पर्वतीय जनजीवन को, जिसे मैंने बचपन से बहुत निकट से देखा था, वहां के लोगों का जो हाड़-तोड़ संघर्ष देखा था, उसे पूरी प्रामाणिकता से चित्रित करने की कोशिश की थी। पहाड़ों का जीवन दूर से जितना रूमानी लगता है, भीतर से वह उतना ही कठोर है। शायद वह कच्चा और खुरदुरा यथार्थ भी पाठकों को रुचिकर लगा।

अलका सिन्हा : यह वैविध्य सचमुच हैरान करता है। एक तरफ आपका ‘छाया मत छूना मन’ और ‘तुम्हारे लिए’ जैसे उपन्यास हैं, तो दूसरी तरफ ‘इस बार बर्फ गिरी तो’ की मर्मस्पर्शी कहानियां। जबकि इन दिनों आप अंडमान की सेल्युलर जेल के खौफनाक इतिहास पर आधारित ‘यातना शिविर’ जैसी बिल्कुल नए तरह की शोधपरक कृति लिख रहे हैं। एक लेखक के भीतर इतनी अलग-अलग दुनिया कैसे बसती है? इस वैविध्य को आप अपने लेखन में किस तरह जुटाते हैं?
हिमांशु जोशी : (गंभीर होते हुए) अलका जी, यह वैविध्य कोई योजना बनाकर नहीं जुटाया जाता। जीवन अपने आप में इतना बहुआयामी है कि आप उसे किसी एक सांचे में ढाल ही नहीं सकते। जिस बात को हम जितना गहरे तक जीते हैं, जो हमारे अपने अनुभव होते हैं, उसी ढंग की अनुभूति भी भीतर से जन्म लेती है। जैसी परिस्थिति होगी, वैसा ही लिखा जाएगा। मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि लेखक साहित्य नहीं रचता, रचना स्वयं लिखी जाती है, वह लेखक से अपने को लिखवाती है।
आपने ठीक ही कहा कि ‘इस बार बर्फ गिरी तो’ की कहानियों और मेरी बाक़ी रचनाओं में बहुत ज्यादा फ़र्क है। मुझे तो कई बार ख़ुद लगता है कि मेरी एक कहानी दूसरी कहानी से मिलती ही नहीं है, भले ही दोनों किसी एक ही धरातल पर लिखी गई हों, पर हर एक का अपना एक अलग और स्वतंत्र महत्त्व होता है। यथार्थ को किस तरह व्यक्त किया जाए कि वह बहुत-से लोगों की आत्मा से जुड़ सके, दरअसल यही लिखने का असली कौशल है। यानी लेखक जो भी कहना चाहता है, उसे ऐसे कहे कि पाठक को वह एक कहानी न लगकर, उसका अपना सच लगने लगे।
साहित्य में अभी कई नए प्रयोग होने बाक़ी हैं, लेकिन वे स्वतः होंगे, बाहर से आयातित नहीं होंगे। फ़्रांस में जो कहानी लिखी जा रही है (जैसे ज्यां-पॉल सार्त्र या कामू के अस्तित्ववाद के प्रभाव में), अमरीका में जो लिखी जा रही है या जापानी कहानियों में जो तत्व है— वह यही है कि वह अपनी विशिष्ट परिस्थितियों में, अपने ही परिवेश से स्वतः प्रस्फुटित हुई है। ऐसा साहित्य, ऐसा ऑर्गेनिक प्रयोग ही पाठकों को हमेशा प्रभावित करता है।
आपको याद होगा, बहुत वर्ष पहले हिन्दी में अकहानी और अकविता का एक बड़ा शोर भरा दौर चला था। उस समय हमने पश्चिम से सब कुछ ज्यों-का-त्यों उठा लिया था, क्योंकि वहां यूरोप में एंटी-स्टोरी (Anti-story) और एंटी-नॉवल (Anti-novel) का सिलसिला चल रहा था। हमारे यहाँ के कई लेखकों ने भी उसे एक बौद्धिक फ़ैशन के रूप में अपना लिया, पर आप ख़ुद देखिए कि वह ज़्यादा चला नहीं। और वह इसलिए नहीं चला क्योंकि वह हमारी भारतीय भावनाओं के, हमारे सामाजिक परिवेश और हमारी ज़मीनी स्थितियों के बिल्कुल अनुकूल नहीं था। अब ऐसा क्यों है कि वह वहां अनुकूल था और यहां अनुकूल नहीं है? दरअसल, साहित्य शून्य से नहीं, समाज से ही निकलता है, वह समाज का दर्पण होता है। यूरोप और अमरीका की परिस्थितियां, उनका अलगाववाद और महायुद्धों की त्रासदी भारत की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न हैं। हमारे दुःख अलग हैं, हमारी भूख अलग है, तो हमारा साहित्य पश्चिम की नकल कैसे हो सकता है?
अलका सिन्हा : आपने परिवेश और भिन्नता की बात की। इसी वैविध्य को लेकर बड़ी बहस चलती है। आजकल जो रचनाकार देश से बाहर रह रहे हैं, उनकी रचनाओं को प्रायः ‘प्रवासी साहित्य’ के एक अलग खांचे में रख दिया जाता है और कई बार मुख्यधारा के आलोचक उसका मूल्यांकन भी शेष साहित्य से अलग पैमानों पर करते हैं। क्या साहित्य को खांचों में बांटना ठीक है? इस प्रवृत्ति को आप किस तरह देखते हैं?
हिमांशु जोशी : (थोड़े आवेश के साथ, हाथ से इशारा करते हुए) यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। देखिए, मूल रूप से साहित्य प्रवासी या अप्रवासी नहीं होता। कोई रचना जितनी अपने लोकल (स्थानीय) यथार्थ से जुड़ी होगी, वह उतनी ही इंटरनेशनल (अंतर्राष्ट्रीय) भी होगी। साहित्य को तौलने के पैमाने दूसरे होते हैं। अभी तक भी हम और हमारे आलोचक अपने-आप को इस खुशफ़हमी से अलग नहीं कर पाए हैं कि यदि कोई कहानी किसी एक देश या महानगर में लिखी गई तो स्वतः उसका सर्वव्यापी असर होगा। यह सच नहीं है। सच्चाई यह है कि साहित्य जितना आंचलिक होता है, जितना अपनी मिट्टी में धंसा होता है, वह उतना ही यूनिवर्सल (सार्वभौमिक) होता है। भारत का ही नहीं, दुनिया भर का श्रेष्ठ साहित्य ले लीजिए — लोगों को जो वैश्विक पहचान मिली है, वह उनकी यूनिवर्सल अप्रोच पर ही मिली है। कहने का अभिप्राय यह है कि आंचलिकता ही रचना को दूर तक पहुंचाती है, उसके पाठकों के माध्यम से।
लेकिन, इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि प्रवास में लिखी जा रही रचनाओं को ‘प्रवासी साहित्य’ की श्रेणी में न रखना और उनका मूल्यांकन सामान्य भारतीय यथार्थ के तौर पर करना एकदम आत्मघाती होगा। ऐसा कैसे हो सकता है कि प्रवासी साहित्य को प्रवासी न कहा जाए? संगम तो तीन अलग-अलग नदियों का ही होता है न? प्रवासी भारतीयों की जो विशिष्ट समस्याएं हैं, उनकी जो दोहरी नागरिकता की मानसिक धारणाएं हैं, उन पर लिखा जाना ही तो उसकी मूल पहचान है। उसे उससे अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, मॉरीशस में लिखी जाने वाली रचनाओं की समस्याएं, वहाँ के गिरमिटिया इतिहास की अनुभूतियां, दिल्ली या लखनऊ की अनुभूतियों से भिन्न होंगी ही। ये चीज़ें समय के साथ बदलती हैं और साहित्य में इस बदलते समय का प्रामाणिक चित्रण भी होना चाहिए। अभिप्राय यह है कि हमें साहित्य की पारंपरिक परिभाषा बदलनी पड़ेगी और उसे उस विशेष परिवेश से जोड़ना पड़ेगा जहाँ वह रचा जा रहा है।
प्रवासी साहित्य को अलग मानने की भावना को किसी भेदभाव के रूप में ग़लत नहीं समझा जाना चाहिए। अप्रवासी साहित्य तो अलग होगा ही। घोड़े और बंदर में, चिड़िया और कबूतर में अंतर तो होगा ही न, इससे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। परेशानी तो तब होगी जब ग्लोबलाइजेशन के नाम पर सब कुछ एक जैसा, एक रंग का हो जाएगा। एक देश से दूसरे देश के रहन-सहन, क़ानून और मानवीय संवेदनाओं में अंतर होना ही चाहिए।
मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। हाल ही में मैं पश्चिम में लिखी गई एक कहानी पढ़ रहा था जिसमें पुलिस आती है और बच्चों के मां-बाप को पकड़कर जेल में डाल देती है और पड़ोस या समाज का कोई भी व्यक्ति उन बच्चों को अपने घर में रखने को तैयार नहीं है। यह हमारे भारतीय पारिवारिक परिवेश से बिल्कुल अलग परिवेश की कहानी है। भारत में तो पड़ोसी या रिश्तेदार बच्चों को तुरंत सहेज लेते। तो यह जो सांस्कृतिक विविधता है, यही उस साहित्य की पहचान बनाती है। गुलदस्ता क्या कभी एक ही फूल का बनेगा? हर कहानी दूसरी से भिन्न है, उसका दृष्टिकोण भिन्न है, पर यह भिन्नता हमारे साहित्य के परिवर्धन से भरी होनी चाहिए।

दूसरी बात यह कि प्रवासी साहित्य का मूल्यांकन करते समय हमें दूसरों की तरफ़ देखने से ज़्यादा अपनी तरफ़ देखना चाहिए। इस साहित्य का एक बड़ा इतिहास है। एक समय था जब 19वीं सदी में यहाँ से हमारे देश के भोले-भाले लोगों को अंग्रेज़ जानवरों की तरह जहाज़ों में भरकर मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम ले गए थे, सुब्रमण्यम जी, रामदेव धुरंदर या वी.एस. नायपॉल के पूर्वज उन्हीं गिरमिटिया मज़दूरों में थे। उनकी दशा, उनके दर्द और उनकी दिशा को लंबे समय तक किसी ने ठीक से देखा-समझा ही नहीं। उनकी सोच और चिंतन में आज से बहुत फ़र्क रहा होगा, उन्होंने अपनी भाषा और रामायण को बचाए रखा, उनकी तो पूजा की जानी चाहिए।
पर आज जो डायस्पोरा है, आज जो भारतीय वहां गए हैं, वे मज़दूर बनकर नहीं गए। वे अपनी शैक्षिक योग्यताओं, अपनी मेधा के आधार पर अपनी पहचान बना रहे हैं। इसलिए उनकी समस्याएं आधुनिक हैं, बिल्कुल अलग हैं। साहित्य में उनके इस नए समाज का चित्र तो होगा ही। मालवीय जी की एक कहानी है जो मन को बहुत छूती है। आज ब्रिटेन में जो भारतीय रह रहे हैं, वे जागरूक भी हैं और साधन-संपन्न भी — वे गोरे लोगों से अपना हक़ लेना जानते हैं और वहां से ब्रिटेन, अमरीका, आयरलैंड की कई बहुत अच्छी कहानियां सामने आई हैं। तोषि अमृता और सोमा वीरा ने भी इस दिशा में बहुत काम किया है और लिखा है।
पर यहाँ एक चेतावनी भी है— यह भी उतना ही सच है कि अगर इन प्रवासी रचनाओं में साहित्यिक मैच्योरिटी (परिपक्वता) नहीं होगी तो वे महज़ डायरी के पन्ने बनकर रह जाएँगी, टिकेंगी नहीं। पाठक किसी वर्ण, वर्ग या भूगोल का नहीं होता, उसके लिए अपना-पराया कुछ नहीं होता, पाठक बस रचना की गहराई को देखता है, इसके अतिरिक्त कोई पैमाना नहीं है। ज़रूरी यह है कि हर रचना का मूल्यांकन उसकी अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थितियों में किया जाए, बाक़ी जो ‘सरवाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट’ (जो सबसे सशक्त होगा) में टिकेगा, वही भविष्य में रहेगा। मॉरीशस के महान लेखक अभिमन्यु अनत के उपन्यास ‘लाल पसीना’ को किसी ने आगे नहीं बढ़ाया, उसके अपने दुख थे, लेकिन वह मील का पत्थर है। प्रवासी रचनाकारों ने अपनी जड़ों को बचाते हुए जो किया है वह कम नहीं है — अगर वे यह भी न करते तो हम यहाँ बैठकर क्या कर लेते? पर सच यही है कि आगे चलकर हमारा संपूर्ण हिन्दी साहित्य इन्हीं से समृद्ध होगा। रचना चाहे नाटक के रूप में हो या उपन्यास के रूप में, उसकी अपनी एक अलग पहचान होनी चाहिए, उसका अपना एक औरा (प्रभामंडल) और अपना व्यक्तित्व होना चाहिए।

अलका सिन्हा : (सहमति में सिर हिलाते हुए) आपकी बात ने प्रवासी साहित्य के कई बंद दरवाज़े खोल दिए हैं। अगर हम विश्व पटल की बात करें, तो हिन्दी लेखन पश्चिम के लेखन से काफ़ी प्रभावित रहा है। लेकिन मैं यह जानना चाहती हूँ कि बाहरी लेखन पर हिन्दी या भारतीय साहित्य का कितना प्रभाव पड़ा है? क्या हम केवल ग्रहण ही कर रहे हैं?
हिमांशु जोशी : (एक गहरी साँस लेकर) अलका जी, यह हमारे इतिहास की एक बड़ी विडंबना रही है। ऐसा होता है कि बड़ी और शक्तिशाली बात छोटी बात को अपने प्रभाव में ले लेती है। हम सदियों तक पराधीन रहे, शोषित भी रहे, हमने असीम गरीबी का जीवन जिया — यह पूरी पिछली शताब्दी हमारी नहीं थी, वह संपन्न, उपनिवेशवादी देशों की थी। उन्होंने हमारे जैसे कई देशों को ग़ुलाम बनाया, हमारा आर्थिक और मानसिक शोषण किया और सबसे बड़ा आघात यह किया कि हम पर अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने संस्कार लादने की कोशिश की। इसी औपनिवेशिक माध्यम से उनका साहित्य भी, उनकी भाषा भी, और उनका ज्ञान भी उन ग़ुलाम देशों तक पहुंचा। इसमें कोई शक़ नहीं कि आज का हमारा साहित्य उस पश्चिमी से, उनके फॉर्म और शिल्प से प्रभावित है।
पर एक बात जो हमें मैकाले की शिक्षा के कारण भूलनी नहीं चाहिए, वह यह है कि हमारे साहित्य की, भारतीय ज्ञान-परंपरा बहुत-बहुत पुरानी और समृद्ध है। पश्चिमी लोग कल्पना भी नहीं कर सकते कि हज़ारों साल पहले यहाँ कैसा कालजयी साहित्य लिखा जा सकता है और लिखा गया था। आज हम अपने हिन्दी उपन्यास को सौ-सवा सौ साल पुराना मानते हैं और सोचते हैं कि नॉवल विधा पश्चिम से आई है, पर हम यह भूल जाते हैं कि हज़ार-दो हज़ार साल पहले हमारे यहाँ बाणभट्ट ने ‘कादम्बरी’ लिखी थी — उसकी संरचना देखिए, क्या वह एक महान उपन्यास नहीं था?
कहने का अभिप्राय यह है कि साहित्य सृजन का यह सिलसिला अनादिकाल से भारत में एक अविरल प्रवाह के रूप में चल रहा है — जैसे कोई नदी कई बार बहते-बहते रेत में धंस जाती है, लुप्त हो जाती है और फिर कई मील बाद अचानक किसी नए रूप में प्रकट होती है, वैसी ही हमारी संस्कृति भी है। वह विदेशी आक्रांताओं के दौर में अंधकार में रही, बहुत विस्मृत भी रही, पर उसकी अंतर्धारा के तार अब आज़ादी के बाद फिर जुड़ने लगे हैं। हम अब यह सोचने लगे हैं कि हमारी परंपरा केवल दो-पांच सौ साल की नहीं है। परंपरा साहित्य हो या कला की, वह हज़ारों साल से अबाध चली आ रही है।

अलका सिन्हा : तो क्या विश्व साहित्य भारतीय साहित्य को इसी रूप में, इसी गरिमा और सम्मान के साथ देखता है? या वहां भी कोई पूर्वाग्रह है?
हिमांशु जोशी : (चेहरे पर चमक लाते हुए) बिल्कुल देखता है! और हमें यह समझना होगा कि प्राचीन भारतीय साहित्य में केवल हिन्दी ही नहीं आती। आप पश्चिम पर प्रभाव की बात करती हैं— संस्कृत भाषा और उसके दर्शन का जितना गहरा प्रभाव यूरोपीय भाषाओं और वहां के विचारकों पर पड़ा है, उसके बाद शायद ही दुनिया की किसी और भाषा का पड़ा हो। आज भी दो-दो सौ साल से ऊपर के अनेक यूरोपीय विश्वविद्यालयों में पूरी निष्ठा के साथ संस्कृत पढ़ाई जा रही है — चेकोस्लोवाकिया की प्राचीन चार्ल्स यूनिवर्सिटी में, स्वीडन के विश्वविद्यालयों में, जिनका इतिहास बहुत लंबा और पुराना है।
और हमारा जो साहित्य है, वह केवल आज का आधुनिक साहित्य नहीं है। बीच का जो हमारा भक्तिकालीन साहित्य है (सूर, तुलसी, कबीर, मीरा), वह अद्भुत रूप से समृद्ध है। अभी पिछले दिनों इमरेबंघा (बहुत बड़े स्कॉलर हैं, उनका नाम सुना होगा) ने घनानंद पर जीवन भर शोध किया और ‘स्नेह का मारग’ शीर्षक से उनकी पुस्तक भी छपी। उन्होंने हंगेरियन भाषा में भी बहुत काम किया है। आपको हैरानी होगी कि भक्तिकाल के जिस साहित्य को हमारे यहां कई बार अकादमिक हलकों में ‘धार्मिक’ कहकर उपेक्षित समझा जाता है, पश्चिम और पूर्व के विद्वान उसे सबसे महत्वपूर्ण और मानवीय मानते हैं।
मुझे याद आ रहा है, मैंने एक बार बीजिंग (चीन) विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष प्रो. चिन तिन हान से एक मुलाक़ात में पूछा था कि आपको कौन-सा भारतीय साहित्य सबसे ज़्यादा पसंद है, तो उन्होंने बेहिचक कहा कि भक्तिकालीन साहित्य आज भी हमें बहुत गहराई से प्रभावित करता है। आप उनकी साधना देखिए— उन्होंने पूरे सात वर्षों के कठोर श्रम के बाद गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ का पदबद्ध (काव्यात्मक) अनुवाद चीनी भाषा में किया। उनसे भी पहले प्रो. श्री जी ज़्वेन (Ji Xianlin) ने संस्कृत सीखने के लिए भारत का नहीं आए थे, गौटिंगन बहुत पुराना विश्वविद्यालय है। इसमें उन्होंने संस्कृत सीखी, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं आदि का अध्ययन किया और जब चीन लौटे तो उन्होंने बाल्मीकि रामायण का पद्यबद्ध चीनी अनुवाद किया और उसकी ढाई लाख प्रतियां बिकीं। उन्होंने विक्रमोर्वशीम् तथा पंचतंत्र का भी अनुवाद किया। तो अलका जी, हमारा जो प्राचीन साहित्य है, हमारी जो अथाह विरासत और पहचान है, उसे तो ख़ुद हम भारतीय आज तक पूरी तरह पहचान ही नहीं पाए हैं कि उसने विश्व साहित्य को, विश्व की चेतना को कितना व्यापक रूप से प्रभावित किया है।

अलका सिन्हा : यह वाकई हमारी आंखें खोलने वाला तथ्य है। अनुवाद का ज़िक्र आया है, तो मैं पूछना चाहूँगी कि भारतीय साहित्य के संदर्भ में अनुवाद की भूमिका और उसकी संस्थागत उपलब्धियों पर आप क्या कहना चाहेंगे? क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं?
हिमांशु जोशी : (थोड़े क्षोभ के साथ) देखिए, जब हम भारतीय साहित्य कहते हैं तो उसमें हिन्दी के साथ तमिल, तेलुगू, मलयालम, बांग्ला, मराठी भी पूरी मज़बूती से आती है। यह सच है कि पश्चिम के साहित्य से हमने अनुवाद किए हैं और इससे हमारा साहित्य नए विचारों से समृद्ध भी हुआ है। दूसरी तरफ़ भारत का जो बहुत अच्छा साहित्य है, वह इतालवी, स्वीडिश, रूसी, जापानी और इंडोनेशियाई जैसी भाषाओं में अनूदित नहीं हुआ। यह इसलिए नहीं हुआ कि पहले इस तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया था, बल्कि इसलिए कि जब देश अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था तो अपनी भाषा को कौन आगे ले जाता? लोग पिछड़े हुए थे, शिक्षा नहीं थी, अपनी भाषा-संस्कृति-संस्कार के लिए वह जागरूकता कहां थी।
पर मेरा दुख दूसरा है। आज़ादी मिलने के बाद भी, अपने संसाधनों के रहते हुए, अनुवाद के क्षेत्र में जिस तरह युद्ध स्तर पर काम होना चाहिए था, वह दुर्भाग्य से अब तक नहीं हुआ है। इन पचास-साठ वर्षों के स्वतंत्र भारत में भी हम ऐसे अनुवादक तैयार नहीं कर सके जो पश्चिम या पूर्व की महान कृतियों को अंग्रेज़ी की बैसाखी के बिना सीधे हिन्दी में ला सकें, या हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्य को बिना अंग्रेज़ी के माध्यम के विदेशी लोगों तक पहुंचा सकें।
आज हमारे पास बड़ी-बड़ी अकादमियां और भाषा संस्थान हैं, जिन पर सरकार के लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, पर दुख की बात है कि आज भी किसी हंगेरियन या अन्य विदेशी कहानियों का अनुवाद करने के लिए अंग्रेज़ी का ही सहारा लिया जाता है। छोड़िए विदेश की बात, भारत के भीतर एक मणिपुरी कहानी का तमिल में अनुवाद करने के लिए भी पहले उसे अंग्रेज़ी में अनूदित किया जाता है और फिर अंग्रेज़ी से तमिल में— यानी अंग्रेज़ी का ही सहारा लिया जाता है। इस प्रक्रिया में उस मणिपुरी कहानी में जो मिट्टी की महक है, वह अंग्रेज़ी के अनुवाद में ही मर जाती है। और सबसे ज़्यादा दुखद यह भी है कि उस ‘वाया इंग्लिश’ कृति को श्रेष्ठ अनूदित कृति के रूप में सम्मानित भी कर दिया जाता है। यह हमारी भाषाई नीतियों का दिवालियापन है।

अलका सिन्हा : हिमांशु जी, आपने जब प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वागर्थ’ का संपादन सँभाला था, तो उसके पहले ही अंक में आपने हिन्दी की वैश्विक स्थिति पर एक बहुत तीखा और विचारोत्तेजक संपादकीय लिखा था। आज हमारे पाठकों को बताएं कि हिन्दी को विश्व भाषा बना पाने में साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है?
हिमांशु जोशी : (आँखों में एक दृढ़ता लाते हुए) मैंने उस संपादकीय में जो लिखा था, वह हमारा ऐतिहासिक सच है। कोई भी चतुर शासक जब किसी देश को ग़ुलाम बनाता है, तो वह सबसे पहले वहाँ की फ़ौज को नहीं हराता, बल्कि वहाँ की जनता का मनोबल तोड़ता है। वह बार-बार यह साबित करता है कि तुम्हारी भाषा रद्दी और असभ्य है, तुम्हारी संस्कृति पिछड़ी हुई है, तुम्हारा रहन-सहन तो उल्लेखनीय ही नहीं है। इस तरह पीढ़ियों को डिमॉरलाइज़ (हतोत्साहित) करके वह आदमी का बुनियादी आत्मविश्वास तोड़ देता है, जिसके कारण आत्मजागृति हो ही नहीं पाती। अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति के प्रति जो गौरव की भावना भीतर से होनी चाहिए, वह पैदा ही नहीं हो पाती। हम खुद पढ़े-लिखे होकर अपनी ही संस्कृति की उपेक्षा करने लगते हैं और अंग्रेज़ियत की नक़ल को विकास मान बैठते हैं।
मैं हमेशा कहता हूँ कि हमारी मां ग़रीब हो सकती है, अनपढ़ हो सकती है, लेकिन हमारे लिए हमारी मां का महत्व ब्रिटेन की क्वीन एलिज़ाबेथ से कहीं अधिक है, होना चाहिए। दुर्भाग्य से अपनी भाषा के प्रति यह भावना हमारे भीतर उस गहराई से आ ही नहीं पाई। जिस मज़बूती के साथ हमारी भाषा (हिन्दी) को विश्व के मंच पर प्रोजेक्ट किया जाना चाहिए था, वैसे संस्थागत या राजनीतिक स्तर पर किया ही नहीं गया।
जहां तक साहित्यिक स्तर पर हिन्दी के अंतरराष्ट्रीय भाषा बनने की संभावना का सवाल है, तो मैं मानता हूँ कि लेखक को अपनी कलम से वह ताक़त दिखानी होगी। आपको ऐसा विश्वस्तरीय और कालजयी साहित्य लिखना होगा कि इंग्लैंड का पाठक उसे पढ़े बिना रह ही न पाए। आज देखिए न, कालिदास को पढ़े बिना विश्व साहित्य का एक नया क्षितिज नहीं खुलता — आज भी कालिदास पश्चिम के देशों में किसी-न-किसी रूप में प्रासंगिक बने हुए हैं, संस्कृत साहित्य पूरी दुनिया में कालिदास की रचनात्मक उत्कृष्टता के ही कारण इतना पढ़ा गया।
हिन्दी को दुनिया में जो सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए था, वह अब तक नहीं मिला — तो इसमें मैं पश्चिम का कोई दोष नहीं मानता, बल्कि हमने ही हीनभावना से डरकर अपनी भाषा को वह स्थान नहीं दिया। आज हिन्दी लगभग एक अरब लोगों की भाषा है — इतनी विशाल आबादी की भाषा — तो ज़रा सोचिए उसका साहित्य कैसा उदात्त होना चाहिए, लोगों का अपनी भाषा के प्रति रुझान कैसा होना चाहिए, इस पर आज तक कभी कुछ ठोस रणनीति बनाकर कहा ही नहीं गया।

अलका सिन्हा : साहित्यिक पत्रकारिता की बात छिड़ी है तो एक बहुत चर्चित विवाद का ज़िक्र करना चाहूँगी। आपका एक साक्षात्कार छपा था जिसमें आपने बेबाकी से कह दिया था कि ‘मैं हंस नहीं पढ़ता’। इस एक वाक्य पर साहित्यिक गलियारों में ख़ासा हंगामा हुआ था, प्रतिक्रियाओं का एक धारावाहिक-सा सिलसिला चल निकला था। पहले तो यह बताएं कि साहित्य में ऐसी धारावाहिक बहसों और विवादों को आप क्या स्थान देते हैं? और आपने किस आधार पर ‘हंस’ को अपने लिए पठनीय नहीं माना। आपकी नज़र में एक साहित्यिक पत्रिका के पठनीय होने के असल पैमाने क्या हैं?
हिमांशु जोशी : (चेहरे पर एक शांत मुस्कान के साथ, पर स्वर में पूरी दृढ़ता लिए हुए) अलका जी, यह बहुत ही सीधा-सा मामला था जिसे बेवजह तूल दिया गया। मैं किसी अमुक पत्रिका को पढ़ता हूं या नहीं, यह पूरी तरह से मेरी व्यक्तिगत राय है, मेरी अपनी चॉइस है। इसे किसी ‘सामूहिक राय’ या फतवे के रूप में नहीं बदला जाना चाहिए। मैं उसे क्यों नहीं पढ़ता, इसके मेरे अपने कई वैचारिक कारण हो सकते हैं — मुझे वह पत्रिका अपने रचनात्मक विकास के लिए उतनी ज़रूरी नहीं लगती। यह भी हो सकता है कि जिस ढंग से और जिस व्यावसायिक या खेमेबाज़ी के उद्देश्य से वह छपती है, उस पूरी प्रक्रिया से मैं सहमत ही न होऊं।
आजकल साहित्य में एक चलन हो गया है कि कुछ उग्र वक्तव्यों को देखकर तुरंत उनके प्रति प्रतिक्रिया देना, फिर चर्चा और परिचर्चा का एक अंतहीन और खोखला सिलसिला चल पड़ना… इससे कुछ समय के लिए पाठकों के बीच उस पत्रिका या पत्रकारिता का बाज़ारी महत्व भले ही बढ़ने लगे, उसकी प्रतियां ज़्यादा बिकने लगें, पर मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि किसी भी गंभीर साहित्यिक पत्रिका का उद्देश्य महज़ कुछ सनसनीखेज़ घटनाएं, विवाद या कहानियां छाप देना भर नहीं होता। उसके पीछे समाज को देखने की एक स्पष्ट और स्वस्थ दृष्टि भी होनी चाहिए।
मूल सवाल यह है कि क्या किसी पत्रिका के संपादन में वह दृष्टि है जो आदमी को एक बेहतर आदमी बनाने की दिशा में प्रेरित करती है, या वह केवल बाज़ारवाद के तहत मनोरंजन, सस्ते चुटकुले अथवा किसी ख़ास विचारधारा के प्रति घृणा फैलाती है? मैं मानता हूँ कि साहित्य का मूल काम मनुष्यता और सद्भाव फैलाना है, समाज को तोड़ना नहीं। यह पत्रिका बेशक आज बहुत चर्चित होगी, पर मेरे साहित्यिक मूल्यों के लिए उसका कोई ख़ास महत्व नहीं है। जो पत्रकारिता केवल अपना बाहुबल और अपनी प्रतिभा-प्रदर्शन तक ही सीमित रह जाती है, वह इतिहास में किसी मंज़िल तक नहीं पहुंचती। उसे कालजयी होने के लिए कुछ ख़ास काम करना होगा, समाज को एक दृष्टि लानी होगी, भटके हुए को दिशा-निर्देश देना होगा। आज की पत्रकारिता और समकालीन लेखन में जो गहरा ह्रास दिखाई दे रहा है, वह इसीलिए है कि बहुत-से नए लेखक बस ‘काता और ले उड़े’ यानी रातों-रात मशहूर होने के छिछले हिसाब से आ रहे हैं और वे समाज को कोई सफल दृष्टि देने में पूरी तरह अक्षम हैं।

अलका सिन्हा : कुछ साहित्यिक समूह ऐसे भी बन गए हैं जो किसी भी औसत लेखक को ‘महान लेखक’ बना देने या रातों-रात उसे जड़ से उखाड़ देने का दंभ भरते हैं, ऐसे समूहों से एक सच्चा लेखक कितना प्रभावित होता है?
हिमांशु जोशी : (गहरी आत्मीयता से मेरी ओर देखते हुए) ये जो समूह या खेमे हैं, ये असली लेखकों के लिए एक बड़ी चुनौती ही हैं, एक भंवर की तरह हैं। एक सच्चे रचनाकार को इन प्रलोभनों के बीच से, कीचड़ के बीच से कमल की तरह होकर ही निकलना होता है। शॉर्टकट से कोई प्रेमचंद या रेणु नहीं बनता। लोग जब अपने एकांत में पढ़-लिखकर, जीवन के गहरे अनुभव से अपने-आप को भीतर से समृद्ध करेंगे, तो अंततः वे ही अपने सृजन से समाज को एक नई दृष्टि दे पाएंगे। जिस दिन आपके भीतर एक सच्ची और पारदर्शी दृष्टि बनेगी, वही आपके उस संगठन या संस्था को भी दिशा देगी और उसे अंततः वास्तविक सफलता तक भी पहुंचाएगी।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लेखक मात्र दो हाथ-पैर वाला कोई साधारण जीव नहीं है, वह समाज का बहुत सशक्त प्राणी है — उसकी कलम में किसी भी तानाशाह की तलवार से ज़्यादा शक्ति होती है। सवाल बस इतना ही है कि क्या उस लेखक ने अपनी तपस्या से, अपनी साधना से अपने-आप को इतना शक्तिशाली बनाया भी है? हर रचनाकार को अपनी पूर्वपीठिका, अपनी परंपरा और अपने संघर्षों का आभारी होना ही होगा। ऐसा जीवन में कभी नहीं होता कि आपको राम-बनाया (पका-पकाया) भोजन मिल जाए, आपके चलने के लिए कालीन बिछी हो और रास्ते में कठिनाइयां आएं ही नहीं। जो लेखक इन दुर्गम और पथरीले रास्तों से होकर आगे बढ़ते हैं, जिनके पैरों में छाले होते हैं, वही असली लेखक हैं — क्योंकि वे ही समाज की कुरीतियों को पहचानते हैं, उनके दर्द को समझते हैं, और तभी वे अपनी रचनाओं के माध्यम से उन पर सटीक प्रहार भी कर पाते हैं।
(वे एक पल रुकते हैं, उनके चेहरे पर एक असीम शांति है।) तो सार यही है अलका जी, कि लेखक को किसी खेमे की नहीं, बस अपनी अनुभूति की ज़रूरत है। आपको इतना शक्तिशाली बनना ही होगा।

सर (यह कहते हुए हिमांशु जोशी बातचीत को विराम देते हैं। उनके शब्दों की गूंज अब भी कमरे में है — ‘अक्षर संगोष्ठी’ और इस अत्यंत वैचारिक और दिशा-निर्देशक बातचीत के लिए, मैं अलका सिन्हा, उन्हें हृदय से धन्यवाद देती हूँ और उनके स्वस्थ तथा दीर्घायु जीवन की मंगल कामनाओं के साथ विदा लेती हूँ।)

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