
कुम्भ पूर्णता का प्रतीक है : वैश्विक हिंदी परिवार की महाकुम्भ पर एक विशेष संगोष्ठी
प्रयागराज में एक विशेष समयांतर पर आयोजित किया जाने वाला कुम्भ मेला, भारतीय लोक संस्कृति की एक अजस्र धारा है—कुछ ऐसे ही विचार थे, जिन्हें सम्मिलित रूप से प्रबुद्ध वक्ताओं द्वारा दिनांक 2 फरवरी 2025 को वैश्विक हिंदी परिवार की संगोष्ठी में व्यक्त किया गया। इस विशेष संगोष्ठी के आयोजन का श्रेय जाता है-वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल शर्मा जोशी को। आभासी मंच पर आयोजित इस संगोष्ठी के अध्यक्ष थे – केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के पूर्व-निदेशक तथा अनेक विश्वविद्यालयों के वाइसचांसलर रहे डॉ. सुरेंद्र दुबे जी।

उल्लेख्य है कि वैश्विक हिंदी परिवार हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के वाङ्मय और उनकी भाषा-बोली-लिपि को सहेजने के लिए कृतसंकल्प एक वैश्विक संस्था है जो विश्व के अक्षांश-देशांतर रेखाओं को मिलाने का बीड़ा उठा रही है। इसके अतिरिक्त, इस संस्था द्वारा आयोजित संगोष्ठियों में भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर भी संगोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। दिनांक 2 फरवरी 2025 को जो संगोष्ठी आयोजित की गई, उसका विषय था—‘कुम्भ : पृष्ठभूमि और दृष्टि’।
संगोष्ठी के आरंभ में बर्मिघम की साहित्यकार सुश्री वंदना मुकेश ने प्रतिभागी वक्ताओं का सुविध परिचय दिया और कुम्भ-आयोजन के संबंध में इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। भारत के प्रबुद्ध लेखक और विचारक डॉ. जयशंकर यादव ने मंच-संचालक की भूमिका में बताया कि यह संगोष्ठी इसलिए भी विशिष्ट है कि इसका आयोजन महाकुम्भ की पृष्ठभूमि में वसंत पंचमी के पावन उत्सव के दिन किया जा रहा है. प्रयाग में आयोजित यह दिव्य महाकुम्भ धर्म-अध्यात्म-संस्कृति का संगम है।
इंडिया एशिया बैंक के महाप्रबंधक नवेंदु बाजपेयी ने यात्रा के दौरान जुड़ते हुए अपने संक्षिप्त उद्बोधन में सभी प्रतिभागी वक्ताओं को धन्यवाद दिया और संगोष्ठी के सफल होने की कामना की। भारत सरकार के पूर्व-राजभाषा निदेशक, डॉ. वरुण कुमार भी अपनी एक महत्त्वपूर्ण यात्रा के दौरान जुड़ते हुए प्रख्यात साहित्यकार श्री निर्मल वर्मा के कुम्भ के परिप्रेक्ष्य में विरचित एक संस्मरण के कुछ अंश सुनाए। उन्होंने कहा कि महाकुम्भ अंदर-बाहर का एक स्नान है. परंपरा, स्व-काल के बोध और अस्तित्व का भान कराता है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी और अनेकानेक सम्मानों से अलंकृत, डॉ. नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के बौद्धिक वक्तव्य को सभी उपस्थितों ने मुक्त कंठ से सराहा। उन्होंने कहा कि कुम्भ मोही, रागी, अनुरागी और वैरागी सभी को बांधता है। महाकुम्भ आस्था और संकल्प की अभिव्यक्ति है। यह आस्था का संकल्प है; कामना को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प-पर्व है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से संबद्ध प्रख्यात विद्वान, कलाविद और प्रोफेसर राजीव रंजन चतुर्वेदी ने अपने पिता की स्मृतियों को सहेजते हुए बताया कि कुम्भ एक स्वाभाविक आस्था का आयोजन है जिसके लिए न तो कोई विज्ञापन दिया जाता है, न कोई धन खर्च किया जाता है। कुम्भ, परंपरा में अंतर्भूत गहरी शक्ति की अभिव्यक्ति है तथा यह लोक संस्कृति की अजस्र धारा का परिचायक है। ‘ज्ञान कुम्भ’ के संयोजक तथा अनेकानेक संस्थाओं से संबद्ध, प्रयागवासी श्री संजय स्वामी भी इस संगोष्ठी के साक्षी रहे। उन्होंने बताया कि महाकुम्भ इस बात को रेखांकित करता है कि भारत में जाति-वर्ण-वर्ग से संबंधित कभी कोई भेदभाव रहा ही नहीं. सभी समुदायों, वर्गों और जातियों के श्रद्धालु कुम्भ की त्रिवेणी में स्नान करके मोक्ष के अधिकारी बनते हैं।

जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की प्रोफेसर. तोमोका मुशिगा ने अपने शोधों का दृष्टांत देते हुए कहा कि हर्षवर्धन के राज्यकाल में भारत आए ह्वेनत्सांग ने प्रयाग के महाकुम्भ की चर्चा की है। समुद्र-मंथन के दौरान जयंत के कलश से छलकी जल-बूंदों से कुम्भ के पवित्र स्थल बने। उन्होंने ग्रहों और राशियों की स्थितियों का उल्लेख करते हुए कुम्भ मेले के आयोजन को रेखांकित किया. उल्लेखनीय है कि सुश्री मुशिगा इस संगोष्ठी की मुख्य अतिथि थीं।
कवि-लेखक श्री अनिल शर्मा जोशी ने अपने वक्तव्य में कुम्भ के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में बताया कि मुगल सम्राट अकबर कुम्भ आयोजन को देखकर विस्मित हुए थे। हर्षवर्धन और जहाँगीर भी कुम्भ-आयोजन देखने आए थे। कुम्भ का सांस्कृतिक पुनर्जागरण में भी विशेष महत्त्व है। उन्होंने विज्ञान को मानने वाली नई पीढ़ी और बुद्धिजीवी समाज से आह्वान किया कि वे कुम्भ की विरासत को सुदीर्घ भविष्य में प्रक्षेपित करें।
प्रख्यात विद्वान डॉ. सुरेंद्र दुबे ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में महर्षि अरविंदो घोष का संदर्भ देते हुए कहा कि भारतीय अध्यात्म भौतिकता का निषेध नहीं करता और कुम्भ मनुष्य का भौतिक-आध्यात्मिक स्नान है। जो पूर्णता सारे ब्रह्मांड में विद्यमान है, उसी की अभिव्यक्ति यह कुम्भ-आयोजन है। प्रयाग कुम्भ अनादिकाल से आयोजित होता रहा है और अनंतकाल तक चलता रहेगा। यह पर्यटन और तीर्थाटन के पुण्य लाभ-अर्जन के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी कराता है। यह न तो अंध आस्था है, न कोई ज़ुनून है।

यह संगोष्ठी लगभग दो घंटे तक अविराम चलती रही और बड़ी संख्या में श्रोता-दर्शक जुड़े रहे। श्रीमती सुनीता पाहुजा के आत्मीय धन्यवाद ज्ञापन के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ।
प्रेस रिपोर्ट : डॉ. मनोज मोक्षेंद्र
