
नई केंद्रीय कार्यकारिणी का गठन, धर्मांतरण और OTT सामग्री के विरुद्ध प्रस्ताव पारित; रीवा की विंध्य भूमि पर हुआ साहित्य का महाकुंभ
अखिल भारतीय साहित्य परिषद का तीन दिवसीय 17वां राष्ट्रीय अधिवेशन, जो ‘आत्म बोध से विश्व बोध’ के केंद्रीय उद्देश्य के साथ रीवा में शुरू हुआ था, शानदार समापन समारोह के साथ सम्पन्न हो गया। भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों से आए एक हज़ार से अधिक साहित्यकारों और विद्वानों ने इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लिया।
प्रमुख उद्घोष और संकल्प
समापन सत्र के दौरान साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को लेकर कई महत्वपूर्ण विचार रखे गए और आगामी वर्षों के लिए परिषद की रूपरेखा तय की गई।
एकात्म विचार पर बल: पंचम सत्र की शुरुआत में राष्ट्रीय महामंत्री मनोज कुमार ने धर्मांतरण के मुद्दे पर चिंता व्यक्त की और कहा कि एकात्म विचार के माध्यम से ही भारत का पुनर्वैभव संभव होगा।
हनुमान जी का जीवन मूल्य आदर्श: संगठन सत्र में महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने परिषद के वर्ष भर के कार्यों की आगामी रूपरेखा तय की। उन्होंने कार्यकर्ताओं को हनुमान जी के जीवन मूल्य को आदर्श बनाकर प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया।
OTT सामग्री के विरुद्ध प्रस्ताव: अधिवेशन में एक प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमें OTT प्लेटफॉर्म द्वारा प्रचारित दूषित सामग्री के विरुद्ध परिषद के उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया।
समापन उद्बोधन: समापन उद्बोधन अतुल जी ने दिया, जिसमें उन्होंने कला, मीडिया और शिक्षा जगत के समन्वय पर अपने विचार रखे।
परिषद की नवीन केंद्रीय कार्यकारिणी का गठन

समापन सत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की केंद्रीय कार्यकारिणी का नवीन गठन रहा। नवनियुक्त पदाधिकारियों ने परिषद के उद्देश्य की पूर्ति का संकल्प लिया।
पद पदाधिकारी का नाम
संरक्षक – प्रो. बलवंत भाई जानी, श्रीधर पराड़कर
अध्यक्ष – डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी जी मधुपेश उत्तर प्रदेश
उपाध्यक्ष – डॉ. दिनेश प्रताप सिंह (महाराष्ट्र), डॉ. के. सी. अजय कुमार (केरल)
महामंत्री – डॉ. पवनपुत्र बादल, उत्तर प्रदेश
संगठन मंत्री – मनोज कुमार, दिल्ली
कोषाध्यक्ष – प्रकाश बैताला, उड़ीसा
संयुक्त महामंत्री – डॉ. नीलम राठी, दिल्ली
सह-कोषाध्यक्ष – कमलाकांत गर्ग, मध्य प्रदेश
रेवा खंड की महिमा का बखान
परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी जी ने आयोजन के स्थान रेवा खंड (विंध्य) के महत्व को बताया, जिसे सुनकर उपस्थित साहित्य जगत के विद्वान गौरवान्वित हुए।
कार्यक्रम का समापन भारत माता की जय के उद्घोष के साथ हुआ। देशभर से आए साहित्यकारों ने विंध्य की पावन भूमि को नमन किया और यहाँ की पुण्य गाथाओं को साहित्य के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया।
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अखिल भारतीय अध्यक्ष द्वारा जारी वक्तव्य
भाषा केवल अभिव्यक्ति का ही माध्यम नहीं, अपितु संस्कृति की भी संवाहक होती हैं। किसी भी समाज की परम्परा और उसका जीवन दर्शन उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा व्यवहार में प्रतिध्वनित होता है। भाषाएँ केवल संचार का साधन भी नहीं होती, वे स्मृति की संवाहक, विरासत का भंडार और पहचान की जीवनरेखाएं होती हैं। सारा विश्व बहुभाषिकता का समृद्ध समुच्चय है।
प्रत्येक भाषा का एक पारंपरिक समुदाय होता है, जिसका अपना देशज व्यवहार और सांस्कृतिक दृष्टि होती है, जो उसी भाषा में व्यक्त हो पाती हैं। अन्य भाषाओं में उनका रूपांतरण उसी तरह संभव नहीं है जैसे भारतीय भाषाओं के पोंगल, नवरात्र, दीपावली, होली, यज्ञ, पर्यूषण, धम्म जैसे शब्दों का अन्य भाषाओं में अनुवाद। इसीलिए प्रत्येक भाषा एक विश्वदृष्टि रखती है और जीवन की व्याख्या करने का एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करती है।
भारत जैसे चिर पारंपरिक राष्ट्र में भाषाई गौरव तथा अपनी अपनी भाषा के प्रति प्रेम और लगाव का होना स्वाभाविक है। किन्तु इस भाषायी स्वाभिमान ने भारत देश में अपने से भिन्न भाषा और भाषा-भाषियों के प्रति प्रेम और सौहार्द का भाव रखा है।
हम भारतवासी प्राचीन काल से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्रति आस्था रखते हैं अतः अथर्ववेद की इस मान्यता के प्रति हमारा दृढ़ विश्वास हैं कि, ‘जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्’ अर्थात् यह पृथ्वी कई तरह की भाषाएँ बोलने वाले और विभिन्न धर्मों का पालन करने वाले मनुष्यों को एक परिवार की तरह धारण करती है। अतः भाषाई वैविध्य हमारी समृद्धि का द्योतक है न कि पारस्परिक राग द्वेष का।
हमारी यह सुदृढ़ मान्यता है कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्र भाषा हैं। हिंदी अखिल भारतीय संपर्क भाषा है। लोक जीवन में भाषाई प्रतिद्वंदिता अथवा वैमनस्य को कभी कोई स्थान नहीं रहा। राजनैतिक स्वार्थ और दुराग्रहों के कारण कुछ राजनीतिक दल पारस्परिक द्वेष और संघर्ष का वातावरण भले ही बनाते हों किन्तु हम भारत के लोंग प्राचीन काल से यात्राओं, तीर्थाटनों, चलचित्रों और व्यापारिक मंडियों के माध्यम से भाषायी वैविध्य को स्वीकार करते हुए, इस विविधता में एकात्मता के दर्शन करते रहे है।
भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। इन भाषाओं के अतिरिक्त देश के विभिन्न क्षेत्रों में सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विविधता की सजीव प्रतीक हैं। ये भाषाएँ प्रतिस्पर्धी पहचान नहीं बल्कि राष्ट्रीय जीवन के व्यापक फलक पर पूरक रंग हैं। इन भाषाओं का संरक्षण, संवर्धन और उत्सव प्रतिरोध का कार्य नहीं है-ये समावेशिता और स्वाभिमान के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की पुष्टि हैं। अतः भारतीय भाषा दिवस (11 दिसंबर) के उपलक्ष में पूरे देश में व्यापक समारोह आयोजित किए जाए।
भारत के जीवंत और निरंतर विकसित होते सांस्कृतिक ताने-बाने में भी भाषाई विविधता का स्वर अपना गौरवशाली स्थान रखता है।
– डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी, अध्यक्ष- अखिल भारतीय साहित्य परिषद
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अधिवेशन –2025 रीवा (म. प्र.) में पारित प्रस्तावः
ओ टी टी प्लेटफॉर्म की सामग्री का नियमन हो।
‘पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई’ और‘परोपकराय सताम् विभूतयः’ की मान्यता पर आधारित हमारी संस्कृति आज अति भौतिकता से प्रभावित होकर बाजारवाद का संत्रास झेल रही है। आज हम जिस घोर व्यावसायिक समय में जी रहे हैं, उसने जीवन के मूलभूत संसाधनों को व्यापार में परिवर्तित कर दिया है। तकनीकों पर बाजारवादी शक्तियों का नियंत्रण है। इसी की परिणति है कि डिजिटल मीडिया का एक अति विशाल उद्योगतंत्र खड़ा हो गया है तथा पारंपरिक प्रसारण माध्यमों की जगह ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने ले लिया है। ओवर-द-टॉप (ओटीटी) के सभी प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्पस पर अधिकांश मनोरंजनकी सामग्री का स्वरूप बदलकर नकारात्मक एवं जीवनमूल्यों रहित होता जा रहा है।
मनोरंजन के नाम पर इनके द्वारा जो हिंसक, अश्लील एवं मर्यादा हीन सामग्रियां परोसी जा रही हैं, वे अत्यंत लज्जास्पद एवं निंदनीय हैं। ये युवावर्ग और बालमन व मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार और नशाखोरी जैसे दुराचारों को महिमा मंडित कर उन्हें अधोपतन की ओर अग्रसित कर रही हैं। इन माध्यमों में प्रदर्शित अधिकांश दृश्य, वोकिज़्म और नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होती हैं। आज इस तरह के प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्पस युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहे है। साथ ही अधिकांश प्लेटफॉर्म भारत के सांस्कृतिक मूल्यों एवं परम्पराओं पर आघात कर उनको विकृत रूप में चित्रित करती हैं। इनका अनियंत्रित प्रसारण समाज एवं राष्ट्र जीवन के लिए अत्यधिक घातक हैं।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जो भारतीय साहित्य, संस्कृति और चिंतन के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए समर्पित है, इस गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। परिषद का यह मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए। स्वतंत्रता और अनुशासन, सृजन और मर्यादा, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
अतः यह अधिवेशन भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से मांग करता है कि –
- ओ टी टी प्लेटफॉर्म एवं गेमिंग एप्पस पर प्रसारित होने वाली प्रत्येक सामग्री के परीक्षण, नियमन, और वर्गीकरण हेतु शासन द्वरा एक सशक्त, स्वायत्त विधायी नियामक संस्था का गठन किया जाए।
- डिजिटल माध्यमों में प्रस्तुत किसी भी दृश्य, संवाद या विचार जो भारत की संविधानिक गरिमा, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक मूल्यों या सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा को आहत करते हों, उन पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
- किशोरों और युवाओं के लिए उपयुक्त सामग्री के आयु आधारित नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाए।
- जो मंच या माध्यम अश्लीलता, हिंसा, नशाखोरी या विकृत जीवन मूल्यों का प्रचार करते हैं, उनके विरुद्धकठोर कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
- भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्धन हेतु भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन माध्यमों को प्रोत्साहित किया जाए।
अंत में, अखिल भारतीय साहित्य परिषद का मानना है कि साहित्य, संस्कृति और समाज की शुचिता तभी सुरक्षित रह सकती है जब जनमानस में सजगता, संवेदनशीलता और नैतिकता बनी रहे। अतः अखिल भारतीय साहित्य परिषद भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से यह मांग करती है की उपर्युक्त सभी विषयों का संज्ञान लेकर इस दिशा में उचित कदम उठाए।




