हिन्दी भवन में कृतियों का लोकार्पण, स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन सम्पन्न

दिनांक 28.02.2026 को नई दिल्ली के आईटीओ स्थित हिन्दी भवन के सभागार में उद्यमी, समाजसेवी एवं साहित्यकार डॉ अंजू क्वात्रा रचित नवीनतम कृति “शब्दों का सफर” तथा उन्हीं की पोती नवांकुर सुश्री प्रनिका क्वात्रा की सृजित प्रथम कृति “तितली के पर” कृतियों का लोकार्पण, स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया।
इस अवसर पर प्रज्ञान विश्वम के संपादक एवं वरिष्ठ साहित्यकार पंडित सुरेश नीरव, वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती मधु मिश्रा, आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री लक्ष्मीशंकर वाजपेई, वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती ममता किरण, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सविता चडढा, वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती वीणा अग्रवाल, कविता प्रभा समूह की अध्यक्षा एवं कवयित्री डॉ कविता सिंह ‘प्रभा’, वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती उमंग जौली सरीन तथा उद्यमी श्री विमल क्वात्रा का सानिध्य रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित करने के साथ हुआ। तत्पश्चात्, श्री विमल क्वात्रा द्वारा पुष्पगुच्छ भेंट स्वरूप प्रदान करके सभी मंचासीन विभूतियों का स्वागत करते हुए सम्मानित किया गया। श्रीमती वीणा अग्रवाल ने अपने मुखारविंद से डॉ अंजू क्वात्रा द्वारा रचित मां सरस्वती वंदना का वाचन किया गया। अगले चरण में जहां एक ओर, क्रमबद्ध तरीके से मंचासीन विभूतियों के साथ-साथ श्रीमती वीणा अग्रवाल, डॉ कविता सिंह ‘प्रभा’ तथा श्रीमती उमंग जौली सरीन को अंगवस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। वहीं दूसरी ओर, मंचासीन गणमान्य विभूतियों एवं अन्य अतिथियों ने डॉ अंजू क्वात्रा का भी माल्यार्पण, अंगवस्त्र ओढ़ाकर एवं भेंट स्वरूप उपहार प्रदान करके सम्मानित किया गया।
डॉ अंजू क्वात्रा ने अपने आरंभिक उदबोधन में कार्यक्रम की रूपरेखा को रेखांकित करते हुए सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को अवगत कराया कि उद्योग, साहित्य-सृजन और समाजसेवा में अर्पित की जा रही सेवाओं का ही प्रतिफल है कि आप सभी गणमान्य विभूतियां आज यहां दादी-पोती को उनकी कृतियों पर अपना पयार, स्नेह और आशीर्वाद प्रदान करने के लिए एकत्रित हुए हैं, इसके लिए आप सभी की कृतज्ञता से आभारी हूं। उन्होंने आगे कहा कि मैंने नवांकुरों को लेखन के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए ₹2,100/- से पुरस्कृत करने की योजना बनाई है, जिसे जल्द ही क्रियान्वित किया जाएगा। साथ ही, उन्होंने अपनी देह दान करने का फैसला लिया है, इससे भी उपस्थित जनसमुदाय को अवगत कराया। अपनी पोती सुश्री प्रनिका क्वात्रा का परिचय कराते हुए बताया कि वह सरदार पटेल स्कूल में कक्षा चार की छात्रा है और कथक नृत्य में द्वितीय वर्ष की साधिका है। यह उसकी पहली संरचना है, जिसका कवर मेरे छोटे पोते ने बनाया है।
तत्पश्चात्, मंचासीन विभूतियों को विभिन्न संचालिकाओं के माध्यम से उनके व्यक्तित्व से संबंधित परिचयात्मक वाचन पश्चात् क्रमबद्ध तरीके से अपने-अपने उदबोधनों के लिए आमंत्रित किया गया।
श्री सुरेश नीरव ने अपने वक्तव्य को संस्कृत की कुछ पंक्तियों का उच्चारण किया और फिर, हिन्दी में उसका भावार्थ समझाते हुए अवगत कराया कि डॉ अंजू क्वात्रा के काव्य संग्रह का लोकार्पण उनके व्यक्तित्व से जुड़े मनोभावों और समाजसेवी कार्य-कलापों सहित शब्दों की लोकयात्रा है, जो जन-जन के बीच तक पहुंचाने का माध्यम है। इनके नाम की उत्पत्ति गंगोत्री के उदभव से हुई है, जहां से शब्द नृत्य करते हुए जीवन में प्रकट होते हैं। उनके नाम के अन्य पर्यायवाची शब्दों का उदाहरण देते हुए प्रकाश डाला कि इनकी सृजित रचनाओं में करूणा के मनोभावों का आधिक्य है, जो इनके समाजसेवी कार्यों के प्रति नारायण सेवा संस्थान से जुड़ाव का द्योतक है। हम कह सकते हैं कि इनकी मानवीय रचनाएं मनुष्यता को संचारित और उद्वेलित करने में सक्षम हैं। मनुष्य के अभ्यंतर का उदघोष हैं। उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया कि जिस प्रकार घर के कार्यों में व्यस्त मां का ध्यान पालने में लेटे अपने बच्चे की ओर सदैव चेतना अर्थात् ध्यान में रहता है, उसी प्रकार इनकी कविताओं में करूणा, ममता, आनंद, चेतना और ध्यान के मनोभावों का कुछ इसी तरह का समावेशी निरूपण किया गया है, जो इन्हें किसी भी प्रकार की परिस्थितियों में विचलित हुए बिना अपने ध्येय से विमुख नहीं होने देता। इसी को मैडिटेशन कहकर संबोधित किया जाता है। इनकी सृजित रचनाओं का मूल केंद्र है – मानवता की सेवा। इनका ‘शब्दों का सफर’ मात्र शब्दों की दौड़-धूप नहीं, अपितु उनकी प्राकृतिक लय के अनुसार उस जगह तक पहुंचने की एक सार्थक कोशिश है, जहां पहुंचकर शब्द बिना किसी शोरगुल के मंत्र के प्रतिरूप का आवरण धारण करने में सक्षम दिखाई देते हैं। यह संग्रह शब्द से मौन तक पहुंचने का सार्थक अभियान है और मेरा मानना है कि शब्द की उच्चतम पराकाष्ठा ही मौन है। यह शब्दों की वह यात्रा है, जहां शब्द सृजन करते-करते अनहद में विश्राम करते हैं। शब्दों से निकलकर अनहद में विश्राम करने की चेतना का नाम है डॉ अंजू क्वात्रा। सुश्री प्रनिका क्वात्रा पर अभिव्यक्ति करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि अतीत से वर्तमान तक केवल दो कन्याएं ही कवयित्री हुई हैं। एक तो तोरूदत्ता, जिन्होंने बारह वर्ष की आयु में पहली कविता लिखी थी। अंग्रेज़ी और स्पेनिश में कविताएं लिखती थी और अठारह वर्ष की आयु में दिवंगत हो गई थी। उनकी कविताओं को विश्व के श्रेष्ठतम कवियों जोन कीट्स, वर्ड्सवर्थ, के बराबर का दर्जा दिया गया था। और दूसरी कवयित्री थीं सरोजनी नायडू, जिन्होंने सत्रह वर्ष की आयु में अपनी पहली कविता सृजित की थी और वह केवल अंग्रेज़ी में लिखती थी। आज उस रिक्त स्थान पर प्रनिका ने अपना आसन स्थापित कर दिया है, इसके लिए वह और उसकी प्रेरणास्रोत डॉ अंजू क्वात्रा बधाई की पात्र हैं। उन्होंने आगे कहा कि मैं अपने आपको भाग्यशाली मानता हूं कि इस अवसर पर मंच के दोनों ओर उपस्थित गणमान्य विभूतियों एवं विद्वतजनों के समक्ष अपने शब्दों का सफर आप सभी के साथ कुछ समय तक जी पाया, यह मेरे लिए भी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। इसी के साथ उन्होंने अपनी वाणी को विराम दिया।
श्री लक्ष्मीशंकर वाजपेई ने अपने वक्तव्य को प्रारंभ करते हुए कहा कि इस सभागार में स्थापित सभी चित्रों के साथ समय-समय पर अपने जीवन में उपस्थित रहा हूं। वर्तमान में यह पहला अनुभव है कि हिन्दी में इतनी सुंदर पुस्तकें आ रही हैं, जो अभिनंदनीय है। ‘शब्दों का सफर’ की संरचना मुक्तक विधा को आधार बनाकर रचा है। उसी में से एक मुक्तक उदाहरण स्वरूप सुनाया। फिर स्पष्टीकरण दिया कि मोबाइल के इस दौर में आपस में मिलना और बातचीत करना मुश्किल हो गया है। इस पुस्तक में प्रेम, करूणा, जीवन, संबंधों के परिलक्षित भावों का समावेशी जिक्र किया गया है। अपने वेनेजुएला भ्रमण को उदृधत करते हुए कहा कि वहां दुभाषिए के नाते अनुभव बहुत ही अनूठा रहा था। हम हैलो बोलते थे। वो हाथ जोड़ते थे। इंडिया ग्रेट है। हमने जीवन मूल्य दिए हैं। बुद्ध, वसुधैव कुटुंबकम्, नालंदा, तक्षशिला तथा गांधी इत्यादि इसके स्वयंसिद्ध प्रकल्प हैं, जिन्होंने जानवर से बदतर जिंदगी जी रहे लोगों को उभारा था। आज से पहले कभी बलात्कारी, अपराधियों के संबंध में जुलूस निकालते नहीं देखा था। जात-पात कुछ नहीं थी। सभी धर्मों का सम्मान और साथ था। मेरा मत तो हिंसा और नफरत से दूर रहने की चाह में है। हमें अच्छा इंसान बनना चाहिए। अनेकों प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों इत्यादि के साथ मिलना रहा और उनके साथ काम भी किया। मेरा विचार है कि व्यक्ति बना रहे। गांधी संत थे। उन्हें लेखक, समाजसेवी, वायसराय से मिलने जाने के समय एक वृद्धा ने रोक लिया था। उससे मिलने के बाद ही वह अपनी निर्धारित मीटिंग के लिए आगे बढ़े। यही मनुष्य बना रहना चाहिए। विडंबना है कि अधिकांशतः बच्चों के लिए हिन्दी में नहीं लिखा गया है। आपने लिखा है, आप बधाई की पात्र हैं। आप यूंही जीवन मूल्य बांटती रहें, इन्हीं शुभकामनाओं सहित अपनी वाणी को विराम देता हूं।
डॉ सविता चडढा ने अपने उदबोधन को मंचासीन विभूतियों एवं मंच के समक्ष उपस्थित विद्वतजनों को नमन करते हुए कहा कि कविताओं का सृजन करना वैसा ही है, जैसे गन्ने से उसका रस निकाला जाता है। जब उसके अंतर्मन में वैसे विचार नहीं पनपेंगे, वह ऐसी रचनाओं का सृजन नहीं कर सकता। उन्होंने अवगत कराया कि जब वह वित्त मंत्रालय में सेवारत थी। वहां के एक साथी, जो स्वयं एक अच्छे कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार थे, एक दिन मेरे पास आकर पूछ रहे थे कि हम कविता नहीं लिख पाते हैं? तब तीस-पैंतीस वर्ष की आयु में मुझे भी इतनी समझ नहीं थी। उस समय मैं उनको कोई प्रत्युत्तर नहीं दे सकी थी। वर्षों बाद आज मैं कह सकती हूं कि जब तक ईश्वर की कृपा नहीं होती, तब तक आप कविताओं का सृजन नहीं कर पाते। सामाजिक परिवेश से जुड़े कुछ लेखकों से संदर्भित एक प्रकरण के द्वारा उदृधत किया कि लेखक ने 600 पृष्ठों की पुस्तक तो लिख दी थी, लेकिन उनके व्यक्तित्व पर चार शब्द नहीं बोल सकते थे। ऐसी पुस्तकें लिखने का कोई लाभ नहीं है। डॉ अंजू क्वात्रा परिवार से समृद्ध हैं, फिर भी वह उपेक्षित लोगों के प्रति इतना सोचती हैं, प्रशंसनीय है। समाजसेवी के नाते भी उनके व्यक्तित्व की सशक्त और दृढ़संकल्पित परिभाषित पहचान अनुकरणीय है। इनसे मेरा परिचय बहुत पुराना नहीं है, फिर भी, मैं मानती हूं कि कई ऐसे आत्मीयता परिपूर्ण रिश्तों के समक्ष कभी-कभी पुराने रिश्ते भी पीछे छूट जाते हैं। जैसे कुछ लोगों की आदत होती है, चुगली करने की और उसे किसी से नहीं कहने के अनुरोध के साथ। मेरा आपसे अनुरोध है कि ऐसी आदत पर रचित डॉ अंजू क्वात्रा की इन पंक्तियों को आप सभी से अपने साथ लेकर जाएं –
“कान का कच्चा मत बनिए यार,
समय की होती है बड़ी तेज़ धार।
रिश्तों को भी काट देती है चुगली की धार,
सामने यार पीठ पीछे वार दुनिया का कारोबार।”
पुनः डॉ अंजू क्वात्रा एवं सुश्री प्रनिका क्वात्रा को उनकी नवीनतम सृजित कृतियों हेतु पुनः अनेकानेक हार्दिक बधाईयां एवं अनंत मंगल शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया।
श्रीमती ममता किरण ने अपने उदबोधन में अवगत कराया कि परिवार के साथ और सहयोग से आज का यह आयोजन अभूतपूर्व है। बधाई देती हूं। सभी का स्वागत है। डॉ अंजू क्वात्रा के व्यक्तित्व के ख़ास गुण हैं। फेसबुक पर परिचय हुआ था और घर आने पर संबंधों का विस्तार हुआ था। यह मल्टी टैलेंटेड पर्सनेलिटी हैं। चार-चार पंक्तियों की संरचना सूत्र रूप में काम आती हैं। इनकी पोती में भी बीजारोपण किया है। परिवार की उपस्थिति एक बड़ी उपलब्धि है। यही भावनात्मक एकता जोड़कर रखती हैं। ईश्वर आपको समृद्ध रखें। इसी प्रकार साहित्य और समाजसेवा करती रहें। डॉ अंजू क्वात्रा के अनुरोध पर उन्होंने अपनी एक स्वरचित ग़ज़ल ‘जिसे समझ गमसार अपना……..’ सुनाने के पश्चात् मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया।
श्रीमती मधु मिश्रा ने अपने अतिसंक्षिप्त वक्तव्य में कहा कि अंजू जी जितनी अच्छी ख़ुद हैं, उतनी अच्छी इनकी कविताएं हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए कि ‘मोहब्बत को लफ़्ज़ों की दरकार नहीं होती…..।’ ‘इश्क करना है, तो खुलकर करो…..।’ ‘खिलते फूलों सी महकती रहें……।’ अपने वक्तव्य को विराम देने से पूर्व उन्होंने होली पर अपना एक सुरम्य गीत सुनाया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते हुए भाव-विभोर कर दिया।
श्रोता-दीर्घा में दिल्ली एनसीआर के विभिन्न शहरों शहरों और क्षेत्रों से विराजित विभूतियों में डॉ कविता सिंह ‘प्रभा’, डॉ कविता मल्होत्रा, डॉ रेखा सिंगला मित्तल, श्रीमती सुरक्षा खुराना, श्रीमती शिखा खुराना, डॉ रंजना मजूमदार, डॉ अंजू अग्रवाल ‘उत्साही’, श्रीमती सौम्या दुआ, श्री मुकेश भटनागर, सुनीता बंसल, श्री राजेन्द्र राज निगम, श्रीमती इंदु राज निगम, डॉ सैयद अली नकवी, श्रीमती वीणा अग्रवाल, श्री राजपाल यादव, डॉ लोकेश तिवारी, पूनम तिवारी, रेणु रत्न मिश्रा, श्रीमती कुलदीप कौर, श्रीमती वंदना क्वात्रा, नीरज त्यागी, श्रीमती सुनीला नारंग, डॉ उर्वी उदल, पूनम मल्होत्रा, मनीषा मणि, श्रीमती नीरू खुराना, श्रीमती शशि खन्ना, श्री राजीव त्रिपाठी, श्रीमती ममता त्रिपाठी, श्री गगन साहनी, श्री अरविंद बंसल, श्री रंजीत क्वात्रा, श्री पीयूष साहनी, श्री साहिल क्वात्रा, श्रीमती गुंजन साहनी, सुश्री चेतना, श्री कुमार सुबोध इत्यादि प्रमुख रहे।
कार्यक्रम के विभिन्न चरणों के दौरान जहां एक ओर, नवीनतम कृतियों के प्रकाशक मैसर्स काव्य कुमुद पब्लिशिंग मीडिया के सर्वेसर्वा श्री राजीव त्रिपाठी एवं ममता त्रिपाठी द्वारा डॉ अंजू क्वात्रा को “ब्रह्मवादिनी साहित्य सम्मान” से सम्मानित किया गया। वहीं दूसरी ओर, श्रोता-दीर्घा में विराजित साहित्य जगत की विभिन्न विधाओं के प्रमुख हस्ताक्षरों एवं सामाजिक क्षेत्र की विभिन्न विभूतियों को भी व्यक्तिगत रूप से अंगवस्त्र ओढ़ाकर मंचासीन गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा सम्मानित किया गया।
अंतिम पड़ाव पर वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती वीणा अग्रवाल द्वारा कार्यक्रम में देश-विदेश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से संबंधित पधारे विद्वतजनों एवं आगंतुकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के पश्चात् यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर मेरे द्वारा लिए गए कुछ चित्र एवं वीडियो आप सभी के अवलोकनार्थ यहां प्रस्तुत हैं।
रिपोर्ट प्रस्तुति — कुमार सुबोध

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