अपने अपने ठीया (कविता)
युद्ध कभी अकेले नहीं लड़े जाते
दूसरे का होना बहुत जरूरी है ।
अकेले तो स्वयं से भी नहीं लड़ा जाता
वहाँ भी एक मन के दो टुकड़े होते हैं
दोनों वाद विवाद करते हैं ।
असत्य पर सत्य हावी होता है
जीतता तो कोई एक ही है
अक्सर बलशाली ही जीतता है
या वह जो अन्याय पर चले
अपने झूठ को जोर जोर से बोलकर
सत्य ही सिद्ध कर दे
क्रिया की प्रतिक्रिया जरूरी है
अपने बचाव का अधिकार सबको है
बस अन्तर इतना है कि
पहल कौन करता है
कौन आपा खो देता है
कौन शालीनता के दायरे में
अपनी बात रखता है।
आवेश में चिल्ला चिल्ला
कर बोलने वाला
या
अगले के इगो पर
मर्मांतक प्रहार करने वाला ।
दोषी तो दोनों ही ठहरते हैं
पर अपराध की मात्रा का ।
अन्तर हमेशा बना रहता है
सही गलत का फैसला
दृष्टा के हाथ है
अक्सर बात बात पर उखड़ने वाला
और तीखी प्रतिक्रिया देने वाला
दोषी ठहरता है
दांव खेलने के मूड में दोनों हैं ।
किसी का दांव भारी पड़ जाता है
तो दूसरे का नम्बर ही नहीं आता
एक पीट लेता है
तो किसी को पिटना पड़ता है ।
लडना ही व्यर्थ है
शांति से अपना मार्ग बदल लेना
ज्यादा बेहतर है ।
जरूरी नहीं कि
सब आपके साथ रहने में
व्यवहार रखने में खुश ही होंगे।
ऐसों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए
आप आगे बढ़ जाइए
यही एक विकल्प शेष बचता है
कि अपनी शांति नष्ट न करें
और दूसरों को बदलने को भी बाध्य न करें
वे रहें अपने ठीया और हम अपने ठीया ।
– बीना शर्मा
