वैश्विक हिन्दी परिवार द्वारा आयोजित “अंतरराष्ट्रीय लघुकथा संगोष्ठी” सम्पन्न

वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय लघुकथा संगोष्ठी अत्यंत सफल, गरिमामय और प्रेरणादायी रूप में संपन्न हुई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता ब्रिटेन की वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीया शैल अग्रवाल जी ने की। मुख्य अतिथि का दायित्व प्रो. सुधीर प्रताप सिंह जी भारतीय भाषा केंद्र के निदेशक (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ) ने निर्वाह किया।

भारत, स्पेन, केन्या, सिंगापुर, कनाडा, नीदरलैंड, श्रीलंका, अमेरिका और जर्मनी से जुड़े लघुकथाकारों ने अपनी उत्कृष्ट लघुकथाओं के माध्यम से हिंदी की वैश्विक शक्ति, संवेदना और सृजनात्मकता का सुंदर परिचय दिया। यह संगोष्ठी हिंदी के विश्वव्यापी प्रसार का प्रभावशाली उदाहरण बनी।

कार्यक्रम का शुभारंभ हिंदी सेवी, प्रबुद्ध लेखक श्री ऋषि कुमार शर्मा जी ने अपने प्रभावी स्वागत वक्तव्य के साथ किया। संचालन की जिम्मेदारी डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना ने कुशलता, संयम और सौम्यता के साथ निभाई, जिससे पूरे आयोजन में अनुशासन और प्रवाह बना रहा।

संगोष्ठी का सबसे सशक्त पक्ष रहा लघुकथाओं का विविधतापूर्ण और अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतीकरण। अमेरिका से निर्मल वर्मा सम्मान से सम्मानित एवं सेतु पत्रिका के संपादक श्री अनुराग शर्मा जी ने अपनी “आती क्या खंडाला” लघुकथा के माध्यम से समसामयिक प्रेम के परिदृश्य का सशक्त चित्र उकेरा। कनाडा से सृजनी की सह संस्थापक , प्रतिष्ठित लेखिका सुश्री प्राची रँधावा ने “दीपक और ज्योति” के माध्यम से सैनिकों के जीवन की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी लघुकथा से दर्शकों को जोड़ा ।वही भारत से सुश्री अंजू खरबंदा जी ने अपनी अत्यंत संवेदनशील लघुकथा “खिड़की” का पाठ किया। केन्या से सुश्री सारिका फलोर जी ने “चयन” लघुकथा के माध्यम से जीवन में सही चयन के महत्व को दर्शाया। सिंगापुर से अराधना झा श्रीवास्तव जी ने “बंटवारा” लघुकथा के द्वारा बंटवारे के दर्द को उकेरा। स्पेन से पूजा अनिल भरवानी सदवानी ने अपनी लघुकथा “एक पल का जादू” का जादू बिखेरा। नीदरलैंड से श्री मनीष पांडेय मनु जी Same as last time लघुकथा के माध्यम से बड़े ही रोचक ढंग से प्रवास की स्थितियों से परिचित कराया। श्रीलंका से डॉ नागौद वितान जी ने अपनी लघुकथा “इश्क पर कुर्बान”के माध्यम से दर्शकों को अपनी भावनाओं जोड़ा।

डॉ शिप्रा ने अल्जाइमर जैसी गंभीर समस्या को दर्शाती अपनी लघुकथा “धुंधलाती यादें” से सभी के मन को द्रवित कर दिया। सभी की लघु कथाओं ने विषय, भाव और शिल्प की विविधता से श्रोताओं को बांधे रखा।

लघु कथा शोध केंद्र की निदेशक मुख्य वक्ता सुश्री कांत राय ने अपने वक्तव्य में लघुकथा की सार्थकता और समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया। श्री अनिल जोशी जी एवं कनाडा से डॉ शैलजा सक्सेना जी के सान्निध्य ने कार्यक्रम को और अधिक प्रतिष्ठा प्रदान की। प्रो. सुधीर प्रताप सिंह मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की अकादमिक गरिमा के साथ उपस्थित रहे, लघुकथा की सार्थकता पर आपका वक्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

इस अवसर पर जापान से आदरणीय पद्मश्री तोमियो मिजोकामी जी, ब्रिटेन से आदरणीया दिव्या माथुर जी, पदमेश गुप्त जी, भारत से प्रो. किरण खन्ना जी, आशा बर्मन जी, डॉ रश्मि वार्ष्णेय , श्री हरिराम पंसारी जी एवं विश्व के अनेक देशों के गणमान्य प्रबुद्ध व्यक्तित्वों की उपस्थिति रही। जिन्होंने अपने संदेशों के माध्यम से प्रतिभागियों का उत्साह तो बढ़ाया ही साथ ही संदेशों के माध्यम से लघुकथा के संदर्भ में अपने महत्वपूर्ण विचार भी प्रस्तुत किए।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवम ने में प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया, जिससे कार्यक्रम का समापन औपचारिकता के साथ-साथ आत्मीयता के भाव में हुआ। समग्र रूप से यह संगोष्ठी न केवल लघुकथा विधा के सम्मान में आयोजित एक सफल साहित्यिक आयोजन थी, बल्कि यह हिंदी की वैश्विक एकता, रचनात्मकता और सांस्कृतिक समन्वय का उत्सव भी सिद्ध हुई।
रिपोर्ट – डॉ शिप्रा शिल्पी

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