आकांक्षाओ और आत्म संघर्ष के बीच का द्वंद्व ( अपने अपने बुर्ज खलीफा )

समकालीन हिंदी साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं जो केवल कहानी कहने के दायरे में नहीं ठहरतीं, बल्कि अपने समय के भीतर चल रहे सूक्ष्म परिवर्तनों को दर्ज करते हुए पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजती रहती हैं। जयंती रंगनाथन का उपन्यास “अपने अपने बुर्ज खलीफा” ऐसी ही एक कृति है, जो आधुनिक जीवन की चमकदार सतह के नीचे छिपी हुई बेचैनियों, आकांक्षाओं और आत्मसंघर्षों को एक संवेदनशील और विचारशील भाषा में सामने लाती है। जयंती रंगनाथन एक लंबे समय से कथा कहन के क्षेत्र में सक्रिय है और”धर्मयुग”,”दैनिक हिन्दुस्तान”,”अमर उजाला “और “वनिता” जैसी पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों से जुड़ी रही हैं।”अपने अपने बुर्ज खलीफा” एक ऐसे कथानक पर आधारित है जहाँ सपनों की उड़ान पहले से कहीं अधिक विस्तृत है, लेकिन उन सपनों की कीमत भी उतनी ही जटिल और कभी-कभी असहज करने वाली हो गई है।उपन्यास का शीर्षक ही अपने भीतर एक व्यापक प्रतीकात्मकता समेटे हुए है। “बुर्ज खलीफा” केवल एक स्थापत्य चमत्कार नहीं, बल्कि उस मानसिक संरचना का रूपक बन जाता है जिसे हर व्यक्ति अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और उपलब्धियों के रूप में निर्मित करता है। यह रूपक हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हर व्यक्ति का अपना एक “बुर्ज खलीफा” होता है, और यदि होता है, तो क्या उसे हासिल कर लेना ही जीवन की अंतिम सफलता है, या फिर वह केवल एक नई तरह की रिक्तता की शुरुआत है।इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसका वह संतुलन है, जो यह बाहरी सफलता और आंतरिक जीवन के बीच स्थापित करता है। कहानी की केंद्रीय स्त्री पात्र “जगती” एक ऐसी यात्रा पर निकलती है, जो केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि गहराई से मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक भी है। वह अपने सपनों को साकार करने के लिए सीमाओं को पार करती है, परंतु इस यात्रा में उसे बार बार अपने भीतर के उन सवालों से सामना करना पड़ता है, जिनका कोई आसान उत्तर नहीं होता। यही द्वंद्व इस कृति को एक साधारण प्रेरक कथा से अलग करके एक गंभीर साहित्यिक अनुभव में बदल देता है। जयंती रंगनाथन की लेखनी का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि वे अपने पात्रों को किसी एक आयाम में सीमित नहीं करतीं। उनकी नायिका न तो केवल संघर्षशील है और न ही केवल सफल बल्कि वह इन दोनों अवस्थाओं के बीच निरंतर झूलती हुई एक जीवंत मनुष्य है। वह निर्णय लेती है, उन निर्णयों के परिणामों को भुगतती है, और फिर उन अनुभवों से सीखते हुए आगे बढ़ती है। इस प्रक्रिया में वह पाठक के लिए उस पीढ़ी का प्रतीक बन जाती है जो अपने जीवन को अपने तरीके से जीना चाहती है, लेकिन उस स्वतंत्रता के साथ आने वाली जटिलताओं से भी जूझती है। इस उपन्यास के कई सह पात्र हैं मसलन जगती की माँ, उसके पिता, उसका चचेरा भाई, उसकी मेंटोर, और उसको चाहने वाला जिससे वह बाद में शादी भी कर लेती है ये सब मिल कर “अपने अपने बुर्ज खलीफा” में स्त्री-विमर्श को केंद्र में बनाए रखते हैं जो इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है, परंतु यह विमर्श किसी आक्रामक या घोषणात्मक शैली में नहीं आता। यह जीवन के अनुभवों के भीतर से धीरे-धीरे उभरता है जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता केवल सामाजिक बंधनों से मुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने भीतर के भय, असुरक्षा और संकोच से मुक्त होने की प्रक्रिया भी है। यह दृष्टिकोण इस कृति को अधिक प्रामाणिक और प्रभावशाली बनाता है, क्योंकि यह वास्तविक जीवन के अनुभवों के अधिक निकट है।इस कृति का एक और उल्लेखनीय पक्ष इसका मनोवैज्ञानिक गहराई है। यह उपन्यास केवल यह नहीं बताता कि पात्र क्या कर रहे हैं, बल्कि यह भी दिखाता है कि वे क्यों कर रहे हैं और उन निर्णयों का उनके भीतर क्या प्रभाव पड़ रहा है। नायिका के भीतर चलने वाला संवाद ,उसकी आशंकाएँ, उसकी इच्छाएँ, उसका अकेलापन ,यह सब इतनी सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया गया है कि पाठक उसके साथ एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है और यही जुड़ाव इस कृति को एक स्थायी प्रभाव प्रदान करता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यहाँ प्रेम का चित्रण भी पूरी तरह से यथार्थपरक है। यहाँ प्रेम किसी आदर्श या कल्पना की दुनिया में नहीं रहता, बल्कि वह जीवन की जटिलताओं के बीच आकार लेता है। यह प्रेम कई बार व्यक्ति की स्वतंत्रता से टकराता है, तो कई बार उसे एक नई दिशा भी देता है। इस कृति को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यहाँ एक प्रश्न सहज ही उठ जाता है कि क्या प्रेम का अर्थ अपने अस्तित्व को खो देना है, या क्या वह एक ऐसा संबंध हो सकता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को और अधिक सशक्त बनाए। यह प्रश्न आज के समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, जब संबंधों की प्रकृति तेजी से बदल रही है।महानगरीय जीवन का चित्रण इस उपन्यास का एक और महत्वपूर्ण पहलू है।
ग्लोबल शहरों की चमक दमक, अवसरों की भरमार और जीवन की तेज रफ्तार ,ये सब इस कृति में जीवंत रूप में उपस्थित हैं। लेकिन लेखिका केवल इस चमक को नहीं दिखातीं; वे उसके भीतर छिपे हुए अकेलेपन और असुरक्षा को भी उतनी ही तीव्रता से उजागर करती हैं। यहाँ एक तरह के विरोधाभास का सहज ही अहसास होता अर्थात बाहरी सफलता और आंतरिक रिक्तता का साथ-साथ चलना जो इस उपन्यास की केंद्रीय संवेदना बन जाता है। “बुर्ज खलीफा” का प्रतीक यहाँ एक और अर्थ ग्रहण करता है। यह केवल ऊँचाई का नहीं, बल्कि दूरी का भी प्रतीक बन जाता है ,वह दूरी जो व्यक्ति को उसकी जड़ों, उसके संबंधों और कभी-कभी स्वयं से भी दूर कर देती है। जब कोई व्यक्ति बहुत ऊँचाई पर पहुँचता है, तो वह नीचे की दुनिया को अलग नजर से देखने लगता है, और यही दृष्टि कई बार उसे अकेला कर देती है। यह अकेलापन इस उपन्यास में एक स्थायी उपस्थिति की तरह महसूस होता है। इस कृति की सामाजिक प्रासंगिकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समीक्षक :– राजेश सिन्हा
