स्त्री अस्मिता के नवीन आयामों को परिभाषित करता खंडकाव्य “अहिल्या “ (पुस्तक समीक्षा)

डॉ वेद व्यथित का खंड काव्य अहिल्या महर्षि वाल्मिकी की “अहिल्या “ को ले कर लिखा गया ऐसा खंड काव्य है जो ना केवल स्त्री की अस्मिता की बात करता है बल्कि स्त्री के आधुनिक गर्विता व प्रखरता पर भी चर्चा करता है। अपनी इस पुस्तक में मूल कथा को विस्तार देते हुए वर्तमान परिदृश्य में भी उस पर चर्चा करते हैं। काव्यात्मक व्यंजित इस कथा में प्रथम सर्ग में एक जगह वो लिखते हैं “ मित्र हमारा अतिशयोक्ति से
काम नहीं चलता है
अमृत के वर्णन से कोई
अमर नहीं बनता है “।
यह कवि का अपना चिंतन है जो चित्रित पात्र के माध्यम से परिलक्षित हो रहा है। सटीक स्पष्ट शैली में कवि हर प्रसंग को विस्तार देता है। प्रवाह के साथ पूर्व कथा अपने नवीन कथ्य व परिदृश्य से आगे बढ़ती चली जाती है।
अहिल्या को नवीन मूल्यों में समाहित करते हुए इस कथानक में पूर्व में छिपे हुए अर्थों को भी बड़ी सहजता से समेटता है।
रचना की इसी प्रक्रिया में नारी स्वातंत्र्य की नई परिभाषा भी लिखी गई है और पुराने संदर्भों में भी उसे कसा गया है। एक जगह पात्र पितृसत्तात्मक समाज पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहता है “उसको भी अधिकार
पुरुष के जैसे होने चाहिए
वह क्यों दासी रहे पुरुष की
पुरुष रहें क्यों स्वामी”
द्वितीय सर्ग तक आते -आते मूल कथा सुंदरता के नवीन उदाहरण गढ़ती हुई सी प्रतीत होती है। प्रकृति के अनुपम सौंदर्य पर चर्चा करते हुए कवि ने लिखा है” “शोभित कैसा है आम्र -कुंज
कोकिला कूँजती है ऐसे।
तरुणाई में बाला कोई
चम्पे सी हँसती है जैसे “ ये पंक्तियाँ प्रतीकात्मक रूप से स्त्री सौंदर्य को भी परिभाषित करती हैं।
खंड काव्य पाँच सर्गों में समेटा गया है और छोटा होते हुए भी यह पूर्ण लगता है।
तुलसीदास रामायण में जो स्त्री शिला के रूप में चित्रित की गई, वहीं वाल्मिकी रामायण में उसे सजीवता में वर्णित किया गया है जो स्वयं के भीतर एक पश्चाताप लेकर जीती है। इस खंड काव्य में इस स्त्री को समकालीन युग में स्थापित करते हुए उदात्त रूप से प्रस्तुत किया गया है। भावों की स्पष्टता, काव्य सौंदर्य व भाषा अभिव्यक्ति के साथ साथ निरंतर चलती है कहीं भी पाठक को रोकती या बाधित नहीं करती। शब्द सौंदर्य, नए परिदृश्य में पौराणिक पात्र अहिल्या की नवीन परिभाषा हर सर्ग में परिलक्षित तो होती ही है, प्रभावित भी करती है।
निकष प्रकाशन से प्रकाशित ये खंड काव्य नए आयामों में उन पाठकों को निस्संदेह अच्छा लगेगा जो पौराणिक कथाओं में रूचि रखते हैं।
पुस्तक का मूल्य भी उचित है । पृष्ठों की संख्या 71 व मूल्य 150/- रुपये है। पुस्तक एमेजॉन पर उपलब्ध है।
-अनीता वर्मा

One thought on “स्त्री अस्मिता के नवीन आयामों को परिभाषित करता खंडकाव्य “अहिल्या “ (पुस्तक समीक्षा)”
  1. अनिता जी आप का हृदय से आभार।
    रचना की गहनता से समीक्षा कर के रचना को अपना स्नेह प्रदान किया ।

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