दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

इतिहास की किताबों में लिखा है कि शाहजहाँ ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया था। पर हमारे आधुनिक रोमियो इस ऐतिहासिक भ्रम को अपनी जेब में रखे पेन की स्याही से सुधारने का ठेका ले चुके हैं। यह हमारे देश की उन दीवारों की दास्तां है जिन्हें देखकर लगता है कि यहाँ ईंटें कम और प्रेमी जोड़ों के नाम ज्यादा धंसे हुए हैं। इन दीवारों को देखकर अक्सर यह संशय होता है कि यह पुरातत्व विभाग की संपत्ति है या किसी सार्वजनिक प्रेम पत्र का रद्दीखाना। यहाँ हर पुरानी हवेली और बदबूदार शौचालय की दीवार पर किसी पिंटू और रिंकी की अमर प्रेम कहानी खुदी हुई है। मानो अगर उन्होंने खुरदुरी ईंटों पर अपना नाम एक तीर के निशान के अंदर बंद नहीं किया तो उनकी मोहब्बत को ऊपर वाला भी मंजूरी नहीं देगा। यह उस समाज का सामूहिक दर्द है जहाँ इश्क में दिल टूटने से पहले पेन की रिफिल खत्म हो जाती है।

शहर के उस वीरान किले की दीवार पर रमेश ने अपनी जेब से पांच रुपये वाला वह कटर निकाला जिससे वह कभी पेंसिल छीला करता था। वह दीवार की खाल उधेड़ने लगा जैसे वह कोई महान मूर्तिकार हो। उसने बड़े जतन से लिखा ‘रमेश संग सपना’ और नीचे एक दिल बनाया जो देखने में कम और पिचका हुआ आम ज्यादा लग रहा था। पास खड़े उसके दोस्त ने पूछा “अबे भाई अगर सपना ने मना कर दिया तो क्या करेगा?” रमेश ने ठिठकी हुई सांस ली और बोला “मना कैसे करेगी? पत्थर की लकीर है भाई। दीवार पर लिख दिया है अब तो खुदा को भी इसे मंजूर करना पड़ेगा।” रमेश की आँखों में वह चमक थी जो शायद कोलंबस की आँखों में अमेरिका खोजते समय भी नहीं रही होगी। उसे लग रहा था कि उसने अपनी वसीयत सीधे यमराज के दफ्तर में जमा करा दी है। उसे नहीं पता था कि यह पत्थर नहीं बल्कि उसकी अपनी बेरोजगारी का विज्ञापन है।

हवाओं में एक अजीब सी गंध थी जो मिट्टी और चूने के मिलन से पैदा हो रही थी। रमेश ने अपने खून से नहीं बल्कि उस लाल रंग के स्केच पेन से दिल को रंगना शुरू किया जो उसने अपनी छोटी बहन के बस्ते से चुराया था। उसने सोचा कि यह दीवार ही तो है जो उसकी गवाह बनेगी जब दुनिया उसके खिलाफ खड़ी होगी। “रमेश भाई यह दीवार ढह गई तो?” दोस्त ने फिर एक कड़वा सवाल दागा। रमेश ने दीवार को ऐसे सहलाया जैसे वह सपना का हाथ हो और बोला “इतिहास गवाह है भाई दीवारें टूट जाती हैं पर नाम रह जाते हैं।” उसकी आवाज़ में वह रुआंसापन था जैसे कोई शहीद होने से पहले अंतिम इच्छा बता रहा हो। जिस किले की दीवार पर वह अपनी मोहब्बत की इबारत लिख रहा था वहीं पास में एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था ‘यहाँ लिखना मना है’। रमेश ने उस बोर्ड के ऊपर भी अपना नाम लिख दिया ताकि कानून को पता चले कि इश्क अंधा ही नहीं बल्कि जाहिल भी होता है।

बरसों बाद जब रमेश उसी किले के पास से गुजरा तो उसकी चाल में वह पहले वाली अकड़ नहीं थी। अब उसके हाथों में कटर की जगह सब्जी का थैला था और चेहरे पर वैवाहिक जीवन की थकान। उसने देखा कि उसी दीवार पर जहाँ उसने ‘रमेश संग सपना’ लिखा था वहां अब किसी ने काला पेंट फेर दिया है। उस काले धब्बे के ऊपर अब किसी नए कलाकार ने लिखा था ‘पवन संग पूजा’। रमेश को अपनी छाती में एक अजीब सी चुभन महसूस हुई जैसे किसी ने ईंट का एक कोना उसके दिल में चुभो दिया हो। “देखो जी लोग कितने बदतमीज होते हैं सरकारी दीवारों को कैसे खराब कर रहे हैं” उसकी बगल में चल रही उसकी पत्नी ने कहा। रमेश ने अपनी पत्नी की तरफ देखा और फिर उस दीवार की तरफ जहाँ उसका वजूद किसी काले रंग के नीचे सिसक रहा था। उसकी पत्नी का नाम सपना नहीं था बल्कि सुमित्रा था।

यह उस प्रेम का मार्मिक अंत था जो पत्थरों पर तो खुदा था पर तकदीर के पन्नों से गायब हो गया। दीवारों पर लिखे वे नाम दरअसल उन लोगों के चीत्कार हैं जो असल जिंदगी में अपनी पहचान नहीं बना पाए और पत्थरों को जख्मी करके अमर होना चाहते थे। सूरज ढल रहा था और किले की वे दीवारें उन हजारों नामों को निगलने के लिए तैयार खड़ी थीं जो हर साल नए आते थे। “चलो जी घर पर बच्चे इंतजार कर रहे होंगे” सुमित्रा ने उसे टोकते हुए कहा। रमेश ने एक आखिरी बार उस जगह को देखा जहाँ उसकी जवानी का एक हिस्सा दफन था। उसे लगा कि वह दीवार नहीं बल्कि एक कब्रिस्तान है जहाँ रोज हजारों बेनाम मोहब्बतें दम तोड़ती हैं। उसने एक ठंडी आह भरी और चुपचाप आगे बढ़ गया क्योंकि अब वह प्रेमी नहीं बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बन चुका था जिसे पता था कि घर में दाल कम पड़ गई है।

सबसे बड़ा तमाचा तो तब पड़ा जब रमेश ने मुड़कर देखा कि एक कुत्ता उसी दीवार के कोने पर अपनी टाँग उठाकर उस ‘अमर प्रेम’ का अभिषेक कर रहा था। इतिहास और वर्तमान का ऐसा मिलन देखकर रमेश की आँखों में आंसू आ गए जो पता नहीं दुःख के थे या उस तीखी गंध के। जिसे वह अपनी जान समझता था वह शहर का सबसे बड़ा कूड़ाघर बन चुका था। मोहब्बत जब दीवारों पर उतर आती है तो वह कला नहीं बल्कि गन्दगी बन जाती है। रमेश ने सुमित्रा का हाथ पकड़ा और तेजी से चलने लगा जैसे वह अपने बीते हुए कल से भाग रहा हो। दीवारें खामोश थीं पर वे हंस रही थीं उन प्रेमियों पर जो कागज़ की जगह पत्थर पर अपना भविष्य ढूंढ रहे थे। सच तो यही है कि जो नाम दिलों में नहीं लिखे जाते वे अक्सर चूने की बोरियों और सरकारी पेंट के नीचे गुमनाम मौत मर जाते हैं।

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