गया बादळा ( राजस्थानी कविता ) : कल्याणसिंह शेखावत
आज बादळा, नया बादळा,
चढ्या सबैरे घणा बादळा।
जबरा-जबरा काळा-काळा,
म्हानै लाग्या भला बादळा।
म्हारो तन अर मन हरसायो,
नभ मे दीख्या बड़ा बादळा।।
मॉक डिरिल कर सगळा भाग्या,
आकाशां सैं भर् या बादळा।
नेम, धरम नैं पाणी देकर,
मुरधर सैं छळ कर्या बादळा।।
घटाटोप बरसण हाळा सा,
बिन बरस्या ई गया बादळा।
झलक दिखाय’र गायब हूगा,
नेतां जैड़ा हुया बादळा।।
