दिव्या माथुर का ‘मायाजाल’ प्रवासी जीवन, मानवीय संबंधों और आत्मसंघर्षों का बहुरंगी आख्यान : पूर्णिमा वर्मन

शुभ संकल्प समूह-इंदौर का हार्दिक धन्यवाद, जिन्होंने मुझे दिव्या माथुर के कहानी-संग्रह ‘माया जाल’ के विषय में अपनी बात रखने का अवसर प्रदान किया। दिव्या माथुर से मेरी पुरानी पहचान हैं। मित्रता कई बार लेखन पर कुछ कहना कठिन बना देती है, क्योंकि तब रचनाकार के पीछे का मनुष्य भी हमारे सामने उपस्थित रहता है। हम सभी जानते हैं कि उनका लेखन ही नहीं व्यक्तित्व भी कितना प्रेरक और मार्गदर्शक है। हँसकर हर मुसीबत से पार उतर जाना उनके स्वभाव का प्रमुख अंग है। हालाँकि वे स्वयं को आलसी कहती हैं लेकिन हम सब जानते हैं कि जीवन भर उन्होंने हिंदी के विकास, संस्कृति के संरक्षण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े ऐसे कार्य किये हैं जो निरंतर परिश्रम और अनुशासन के बिना संभव नहीं होते। आप सभी उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान से परिचित हैं, इसलिए मैं सीधे मायाजाल की कहानियों की दुनिया में चलती हूँ। ये कहानियाँ अपने पात्रों, संवेदनाओं और प्रश्नों के बल पर पाठक को अपने साथ ले चलती हैं।
‘मायाजाल’ केवल सत्रह कहानियों का संकलन नहीं, बल्कि समकालीन मनुष्य की जटिल मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों का संवेदनशील दस्तावेज़ है। दिव्या माथुर हिंदी की उन महत्वपूर्ण प्रवासी रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने विदेश में रहते हुए हिंदी कथा-साहित्य को समृद्ध किया है। उनकी कहानियों में प्रवासी जीवन का अनुभव अवश्य है, किंतु उनका सरोकार केवल प्रवास तक सीमित नहीं है। वे मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों, रिश्तों की उलझनों, अकेलेपन, स्मृतियों, पूर्वग्रहों, प्रेम, करुणा और आत्मसम्मान की कथा कहती हैं।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी अधिकांश कहानियाँ ब्रिटेन अथवा पश्चिमी समाज की पृष्ठभूमि में घटित होती हैं, किंतु उनके पात्रों की पीड़ा, आकांक्षाएँ और संघर्ष सार्वभौमिक हैं। पाठक शीघ्र ही अनुभव करता है कि भौगोलिक दूरी बदल सकती है, मनुष्य की मूल संवेदनाएँ नहीं। यही कारण है कि इन कहानियों को पढ़ते हुए हमें बार-बार अपने समाज, अपने परिवार और अपने जीवन की प्रतिध्वनियाँ सुनाई देती हैं।
संग्रह की पहली कहानी ‘करारनामा’ आधुनिक वैवाहिक संबंधों पर एक रोचक और विचारोत्तेजक दृष्टि प्रस्तुत करती है। कहानी का आधार विश्वास और संदेह के बीच झूलता हुआ संबंध है। पति-पत्नी आधुनिकता के नाम पर एक तरह का ‘समझौता’ करते हैं, पर अंततः कहानी यह सिद्ध करती है कि रिश्ते केवल अनुबंधों से नहीं चलते; उनके केंद्र में भावनाएँ और परस्पर विश्वास होता है। लेखिका यहाँ बिना उपदेश दिए यह दिखाती हैं कि कभी-कभी संदेह का जन्म जानकारी के अभाव से होता है और उसका समाधान संवाद में निहित होता है।
‘इ-रिश्ता’ डिजिटल युग में बदलते मानवीय संबंधों की कहानी है। इंटरनेट, वीडियो कॉल और लंबी दूरी के संपर्कों के बीच मनुष्य की भावनात्मक जरूरतें किस तरह आकार ग्रहण करती हैं, यह कहानी बहुत सूक्ष्मता से सामने लाती है। यहाँ तकनीक केवल माध्यम है; वास्तविक प्रश्न मनुष्य के अकेलेपन और उसके संबंधों की तलाश का है। कहानी आधुनिक जीवन की उस विडंबना को उजागर करती है जहाँ संचार के साधन बढ़े हैं, पर आत्मीयता की खोज अभी भी जारी है।
‘हिमखंड’ संग्रह की अत्यंत प्रभावशाली कहानियों में से एक है। यह घरेलू हिंसा, आत्ममुग्ध व्यक्तित्व (नार्सिसिस्टिक व्यवहार) और स्त्री के आत्मसम्मान की कहानी है। शॉन जैसा पात्र केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिनिधि है जो शक्ति और प्रतिष्ठा के बल पर दूसरों को नियंत्रित करना चाहती है। पद्मा का संघर्ष केवल अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की पुनर्प्राप्ति के लिए भी है। ‘हिमखंड’ शीर्षक अत्यंत सार्थक है—मनुष्य के व्यक्तित्व का जो भाग दिखाई देता है, वह केवल एक छोटा हिस्सा है; उसके भीतर छिपे अंधेरे कहीं अधिक भयावह हो सकते हैं।
‘कैपीचीनो रोमांस’ प्रवासी भारतीय जीवन की एक अलग परत खोलती है। इसमें सांस्कृतिक संक्रमण, वैवाहिक एकरसता और भावनात्मक रिक्तता का चित्रण है। कहानी बहुत हल्के और सहज ढंग से आगे बढ़ती है, किंतु उसके भीतर संबंधों की जटिलता और मानवीय मन की दुविधाएँ निरंतर सक्रिय रहती हैं।
‘नामर्द’ जैसी कहानी इसी दृष्टि का उदाहरण है। शीर्षक चौंकाता है, पर कहानी का केंद्र जैविक पुरुषत्व नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक असुरक्षाएँ हैं। लेखिका यहाँ उन मानसिक दबावों को रेखांकित करती हैं जिनके कारण संबंधों में कटुता और अविश्वास जन्म लेते हैं। इसी प्रकार ‘राधा-राधा’ बीमारी, मनोवैज्ञानिक तनाव और मानवीय भ्रम की कथा है। बीमारी केवल शारीरिक नहीं होती; वह संबंधों और विश्वासों को भी प्रभावित करती है। कहानी इस बात की ओर संकेत करती है कि कई बार गलतफहमियाँ परिस्थितियों से जन्म लेती हैं, न कि दुर्भावना से।
संग्रह में वृद्धावस्था से संबंधित कहानियाँ विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती हैं। ‘बेक्ड बीन्स’ और ‘ढिंढोरा’ वृद्ध लोगों की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक असुरक्षाओं को सामने लाती हैं। पश्चिमी समाज की चमक-दमक के पीछे छिपी वृद्धावस्था की त्रासदी इन कहानियों में मार्मिक रूप से व्यक्त हुई है। वृद्ध माता-पिता, उनकी निर्भरता, अकेलापन और सम्मान की आकांक्षा—ये प्रश्न केवल पश्चिम के नहीं, हमारे समाज के भी हैं। यही इन कहानियों की सार्वभौमिकता है।
‘इ-सुलह’ संग्रह की सबसे आशावादी कहानियों में से एक कही जा सकती है। तलाकशुदा माता-पिता के बीच पुल बनाने का प्रयास करती दो बच्चियों की मासूम संवेदना कहानी को विशेष ऊँचाई प्रदान करती है। यहाँ लेखिका यह विश्वास व्यक्त करती हैं कि जहाँ वयस्क अहंकार में उलझ जाते हैं, वहाँ बच्चों की सरल दृष्टि कभी-कभी समाधान खोज लेती है। ‘हबशन’ कहानी पूर्वाग्रहों के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। समाज किसी व्यक्ति को उसके रंग, नस्ल, वर्ग या पृष्ठभूमि के आधार पर परिभाषित करने का प्रयास करता है, किंतु कहानी का पात्र रोज़मैरी इन सभी धारणाओं को तोड़ देता है। जिस स्त्री के बारे में नकारात्मक बातें कही जाती हैं, वही सबसे अधिक मानवीय और सहृदय सिद्ध होती है। ‘स्पेयर ए थॉट प्लीज’ कहानी में लेखिका का एक अलग कौशल दिखाई देता है। गंभीर परिस्थितियों के बीच वे हास्य और व्यंग्य की महीन रेखा खींचती हैं। यह गुण उनकी अनेक कहानियों में दिखाई देता है। पाठक पर भावनात्मक दबाव बढ़ने लगता है, तभी कोई छोटा-सा प्रसंग वातावरण को हल्का कर देता है। यही संतुलन उनके कथा-लेखन को प्रभावशाली बनाता है।
संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मायाजाल’ विशेष उल्लेख की अपेक्षा रखती है। यह कहानी चिकित्सा जगत, अस्पतालों की कार्यप्रणाली, रोगी की मनःस्थिति और जीवन-मृत्यु के बीच के अनुभवों को लेकर लिखी गई है। कहानी में यथार्थ और रहस्य का ऐसा ताना-बाना है कि पाठक अंत तक बँधा रहता है। ‘मायाजाल’ केवल बाहरी व्यवस्था का नहीं, मनुष्य की चेतना का भी है। हम जो देखते हैं, क्या वही सत्य है? और जो सत्य है, क्या वह हमेशा दिखाई देता है? कहानी इन्हीं प्रश्नों से जूझती है।
संग्रह की अंतिम रचना ‘बाबा-अम्मा और मैं’ संस्मरणात्मक स्वर लिए हुए है। इसमें लेखिका के बचपन, पारिवारिक परिवेश और स्मृतियों की गरमाहट उपस्थित है। पूरे संग्रह में जहाँ आधुनिक जीवन की जटिलताएँ हैं, वहीं यह रचना पाठक को स्मृति और आत्मीयता की दुनिया में ले जाती है। बाबा और अम्मा के साथ जुड़ी यादें केवल व्यक्तिगत नहीं रह जातीं; वे भारतीय पारिवारिक संस्कृति की सामूहिक स्मृति बन जाती हैं।
इस संग्रह में दिव्या माथुर की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी है। वे अनावश्यक अलंकरण से बचती हैं। उनकी भाषा का सबसे बड़ा गुण उसकी संप्रेषणीयता है। पात्र जिस सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं, उनकी भाषा भी उसी के अनुरूप बदलती है। कहीं भारतीयता है, कहीं ब्रिटिश परिवेश, कहीं प्रवासी जीवन की मिश्रित संस्कृति—पर भाषा कृत्रिम नहीं लगती। शिल्प की दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है। अधिकांश कहानियाँ मनोवैज्ञानिक आधार पर विकसित होती हैं। बाहरी घटनाएँ अपेक्षाकृत कम हैं; लेखिका पात्रों के भीतर उतरकर उनके विचारों, आशंकाओं और स्मृतियों को कथा का हिस्सा बनाती हैं। यही कारण है कि पाठक केवल घटनाओं को नहीं, पात्रों की मनःस्थितियों को भी अनुभव करता है।
एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि दिव्या माथुर स्त्री-विमर्श को किसी नारे के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं। उनकी स्त्रियाँ पीड़ित अवश्य हैं, पर निष्क्रिय नहीं। वे संघर्ष करती हैं, निर्णय लेती हैं, प्रश्न उठाती हैं और अंततः अपने आत्मसम्मान की रक्षा का प्रयास करती हैं। पद्मा हो, ‘करारनामा’ की नायिका हो या अन्य कथाओं की स्त्रियाँ—वे जीवन की जटिलताओं का सामना करती दिखाई देती हैं।
समापन में मैं कहना चाहूँगी कि ‘मायाजाल’ उन कहानी-संग्रहों में है जो पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देते, बल्कि उसे सोचने के लिए विवश करते हैं। यह संग्रह बताता है कि आधुनिक जीवन की चमक के पीछे कितनी परतें हैं – अकेलापन, असुरक्षा, स्मृतियाँ, पूर्वाग्रह, प्रेम, करुणा और आशा की परतें। दिव्या माथुर इन परतों को धैर्य और संवेदनशीलता के साथ खोलती हैं।
आज जब मनुष्य तकनीक से घिरा हुआ है, संबंध लगातार बदल रहे हैं और समाज नए प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब ‘मायाजाल’ जैसी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि अंततः मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाली शक्ति उसकी संवेदना ही है। दिव्या माथुर को इस महत्वपूर्ण कहानी-संग्रह के लिए हार्दिक बधाई।

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