योग – एक जीवन-प्रणाली : डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना

मानव जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि इसकी सार्थकता शारीरिक, मानसिक, आत्मिक संतुलन और चैतन्य की प्राप्ति है। भारतीय दर्शन में “योग” को इसी संतुलन और आत्मबोध का मार्ग कहा गया है। “योग” शब्द संस्कृत धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका अर्थ है – संयोजन या एकत्व। अर्थात् योग वह साधना है, जो व्यक्ति को उसके इंद्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के साथ समरस करती है।

योग का उल्लेख वैदिक साहित्य में अत्यंत प्राचीन काल से मिलता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, उपनिषद तथा गीता में योग को आत्म-साधना का सर्वोच्च साधन बताया गया है। प्राचीन काल से योग जीवन का अटूट अंग माना गया है।

ऋग्वेद में कहा गया है –
“युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य ब्रह्मणो वाचमस्य।”
अर्थात् — ज्ञानी पुरुष अपने मन और बुद्धि दोनों को ब्रह्म के साथ संयोजित करते हैं। यही योग का आरंभ है।

कठोपनिषद् में योग की परिभाषा दी गई है —“तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियमना:। अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययोः॥”
अर्थात् — जब इंद्रियाँ और मन शांत होकर आत्मा में स्थित हो जाते हैं, तभी उसे योग कहा जाता है।

भगवद्गीता योग को कर्म और ज्ञान दोनों का समन्वय कहती है —“योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता 2.50)
अर्थात् — प्रत्येक कर्म को कुशलता और समभाव से करना ही योग है। गीता का यह सन्देश आज भी जीवन का आधार है — जब कर्म रुचिपूर्ण और समर्पणयुक्त होता है, वही योगमय जीवन कहलाता है।

वेदांत के अनुसार योग केवल आसन या प्राणायाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, विचारशुद्धि और कर्मयोग का समन्वित मार्ग है। पतंजलि योगसूत्र ने योग को अष्टांग रूप में व्यवस्थित किया — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि। यह क्रम न केवल साधना का वैज्ञानिक अनुशासन है, बल्कि जीवन के हर पक्ष को शुद्ध एवं संतुलित करने का सूत्र भी है।
पतंजलि का प्रसिद्ध सूत्र है —“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
अर्थ — मन की वृत्तियों का निरोध ही योग है। जब मन शांत होता है, तब आत्मा का सत्य प्रकट होता है।

पहले योग मुक्ति के साधन के रूप में माना गया था, परंतु आज यह जीवनशैली का आधार बन चुका है: तनाव, रोग और असंतुलन से मुक्ति का आधुनिक उपाय।

आधुनिक जीवन आपाधापी, अत्यधिक गति, प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव से ग्रस्त है। ऐसी स्थिति में योग से व्यक्ति को संतुलन, धैर्य और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को स्थिर करके यह एकाग्रता और सकारात्मक सोच को बढ़ाता है। चिकित्सकीय दृष्टि से भी योग हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मानसिक अवसाद जैसे रोगों से निवारण का प्राकृतिक उपाय है।

वैज्ञानिक एवं चिकित्सा पद्धति भी आज जीवन में योग के महत्व को स्वीकार करते है नियमित योग तनाव प्रबंधन और हार्मोन संतुलन पर विशेष प्रभाव डालता है। योग प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम किया जा सकता है, जिससे पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र सक्रिय होता है। अध्ययनों से सिद्ध होता है कि नियमित योग चिंता, अवसाद और पी.टी.एस.डी. के लक्षणों को 30-40% तक घटाता है।

यह माइंडफुलनेस के वैज्ञानिक सिद्धांत पर कार्य करता है। अमेरिकन हार्ट असोसिएशन ने 2017 में इसे हृदय स्वास्थ्य के लिए अनुशंसित किया है साथ ही नीदरलैंड-अमेरिका के संयुक्त शोध में पाया गया कि हृदय स्वास्थ्य और रक्तचाप नियंत्रण में योग हृदय रोग जोखिम को एरोबिक्स जितना ही कम करता है। योग पुरानी सूजन (क्रोनिक इन्फ्लेमेशन) को कम करता है, जो मधुमेह, गठिया और कैंसर जैसी बीमारियों का मूल कारण है। यह इम्यून कोशिकाओं को मजबूत कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के अनुसार, योग कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करता है। न्यूरोसाइंस के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य लाभ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग मस्तिष्क के ग्रे मैटर को बढ़ाता है (हिप्पोकैंपस, प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स) जो स्मृति, निर्णय और भावनात्मक नियंत्रण सुधारता है।

भारत सरकार के सत्यम कार्यक्रम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डी.एस.टी.) के सत्यम ने 100+ परियोजनाओं से योग के तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव को सिद्ध किया है। यह लंबी आयु, मानसिक स्थिरता और रोग निवारण को भी प्रमाणित करता है।

जर्मनी में योग : सांस्कृतिक आयाम और सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से जर्मनी में योग ने बीते तीन दशकों में उल्लेखनीय लोकप्रियता प्राप्त की है। यहाँ के लोग इसे “माइंड-बॉडी बैलेंस” की अवधारणा से जोड़ते हैं। बर्लिन, म्यूनिख और कोलोन जैसे शहरों में सैकड़ों योगा स्टूडियोज़ संचालित हैं, जहाँ भारतीय प्रशिक्षक और जर्मन योग शिक्षक मिलकर पाठ्यक्रम चलाते हैं। जर्मन समाज में योग अब केवल व्यायाम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बन चुका है। जर्मन नागरिक योग को कार्यस्थल पर तनाव-नियंत्रण के उपाय, स्वास्थ्य संरक्षण तथा आत्म-विकास की विधि के रूप में अपनाते हैं।

विशेष रूप से जर्मनी में सभी भारतीय दूतावास एवं कॉन्सुलेट द्वारा वृहद स्तर पर आयोजित “इंटरनेशनल योगा डे” (21 जून) को यहाँ बड़े समुदाय खुले पार्कों में योगाभ्यास कर भारतीय संस्कृति के साथ एकात्मता का अनुभव करते किया जाता है।

जर्मनी के विश्वविद्यालयों में भी अब योग दर्शन और भारतीय मनोविज्ञान पर शोध हो रहा है। कई जर्मन विद्वान पतंजलि योगसूत्र का जर्मन अनुवाद कर चुके हैं। यह इस तथ्य का प्रमाण है कि योग अब केवल भारत का नहीं, बल्कि विश्व-मानव के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है।

योग : समग्र जीवन का मार्गयोग का सार यह है कि जब मनुष्य संतुलित चेतना में जीता है, तभी उसका जीवन पूर्ण होता है। वेदों का संदेश है —
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” — अर्थात सब मिलकर चलो, एक मन से विचार करो। यही योग का सामाजिक रूप है — मनुष्यता का मेल। आज के तनाव पूर्ण, अवसाद ग्रस्त, मशीनी और तकनीकी जीवन में योग हमारे जीवन को शरीर, मन और आत्मा की समरसता सिखाता है। आज योग मात्र एक विषय नहीं जीवन प्रणाली के रूप में काम कर रहा है। अपने वैज्ञानिक प्रक्रियाओं, औषधीय गुणों एवं सकारात्मक उपादेयता के कारण आज योग आम जन जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग बन चुका है।

योग “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” को वैज्ञानिक रूप से जीवनशैली बनाता है — प्रकृति के साथ संनाद। आज भारत से लेकर जर्मनी तक, यह विचार एक सार्वभौमिक भाषा बन चुका है — “अन्तःशान्ति ही बाह्यशान्ति का मूल स्रोत है।” जब व्यक्ति स्वयं में संतुलित होता है, तभी समाज संतुलन की ओर बढ़ता है। यही योग का शाश्वत संदेश है — जीवन को कर्म, ध्यान, भावना का समन्वय बनाना और जीवन प्रणाली बन जाना।

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