औरत,माटी और प्रेम की कविताएं – आशमा कौल : समीक्षक – निशा चंद्रा

औरत, माटी और प्रेम…..यह तीनों शब्द अपने भीतर जीवन की सबसे गहरी संवेदनाओं को समेटे हुए हैं। इस विषय की कविताएं केवल प्रेम का वर्णन नहीं करतीं बल्कि मनुष्य और प्रकृति के उस अटूट संबंध को भी उजागर करती हैं, जहां स्त्री सृजन की शक्ति है, माटी जीवन का आधार है और प्रेम इन दोनों को जोड़ने वाला सबसे सुंदर भाव।
साठ कविताएं। भाषा सरल,सहज और भावनात्मक होने पर भी गहरे अर्थों से भरपूर प्रतीत होती है। बिंब और प्रतीक लम्बे समय तक पाठक के मन पर अपनी छाप छोड़ने में समर्थ हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगा मानो जीवन की साधारण घटनाएँ असाधारण संवेदनाओं में बदल गई हों। आशमा जी की कविताओं में औरत केवल एक पात्र नहीं बल्कि त्याग, ममता और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक बनकर सामने आती है और प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का आकर्षण नहीं, बल्कि अपनत्व और समर्पण का व्यापक भाव बनकर उभरता है,

‘प्यार तो होता है, चातक के लिए पहली बूंद
सूरजमुखी के लिए सूर्य की पहली किरण
चांद के लिए सागर की लहर
प्यार में नहीं होते कोई शब्द
यह तो आंखों से ही करता है बयां
दिल के जज्बात और
स्पंदन बन जाता है प्यार की भाषा’

यह काव्य संग्रह मनुष्य को उसकी जडों, उसकी संवेदनाओं और उसके मानवीय मूल्यों से जोड़ने वाला एक भावसमृद्ध काव्य विषय है। यह पाठक के मन में प्रेम, सम्मान और जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण जगाता है तथा पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक स्मृति में बना रहता है।
‘बहुत दूर तक यूं ही
चलना पड़ा मुझे
खुद के पास आने के लिए
बहुत कुछ सुनती रही मैं
अपनी बात सुनने के लिए’

इन कविताओं में औरत केवल प्रेमिका नहीं, अपितु सृजन की पहली धड़कन, घर की आत्मा, और करुणा का अथाह सागर बनकर निकलती है। माटी केवल धरती नहीं, बल्कि स्मृतियों, संस्कारों और अपनेपन की वह सौंधी खुशबू है, जो हर बिछड़े मन को अपनी ओर आकर्षित करती है। और प्रेम….वह किसी एक रिश्ते तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, रिश्तों और समूचे अस्तित्व के प्रति समर्पण का निर्मल उत्सव बन जाता है। इन कविताओं की भाषा इतनी सहज और आत्मीय है हर पंक्ति सीधे दिल को छूती है। कविताएं पढ़ते हुए लगता है जैसे मन पर ओस की बूंदें उतर रही हों और भीतर जैसे कोई शांत, उजला दीपक जल उठा हो।
औरत, माटी और प्रेम कविताएं संवेदनाओं का एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसकी हर कविता एक महकता हुआ फूल है जो हृदय में प्रेम, आँखों में नमी और आत्मा में जीवन के प्रति गहरा विश्वास जगाती हैं।
इन कविताओं को पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगता है जैसे अपने ही जीवन के बिखरे हुए पल शब्दों का रुप लेकर सामने आ गये हों। कहीं आँखें नम हो जाती हैं, कहीं होंठों पर हल्की मुस्कान आ जाती है और कहीं मन चुपचाप किसी पुराने एहसास को गले लगा लेता है। इतना सुन्दर संग्रह हमें देने के लिए आशमा जी बधाई की पात्र हैं। उन्हें साधुवाद।
यह संग्रह याद दिलाता है कि जीवन की सबसे सुंदर चीजें शोर में नहीं बल्कि प्रेम, स्मृतियों और संवेदनाओं की खामोशी में मिलती हैं। औरत, माटी और प्रेम की कविताएं केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु भावों का बहता एक तरंगित झरना है।
तो उन्हीं झरनों की गिरती बूंदों में आपको संग्रह की कुछ पंक्तियों में भीगने को छोड़कर जा रही हूं। पढ़िए और भीग जाइए उन बूंदों में……
……………………………………..
आओ आज चांद को
निहार लें हम मिलकर
ताकि गवाह रहे यह हमेशा
हमारे प्रेम का और इस शीतल
चांदनी को भर लें हम तन मन में
ताकि मेरे जाने के बाद ढूंढ सको
मुझे तुम इस चांद में……
…………………………………..
यह माटी है जीवनदायिनी
अपने गर्भ में पाल कर बीज को
और पल्लवित कर उसे
फैलाती है चहुंओर नवजीवन की महक, खिलखिलाने लगती हैं
नई कोपलें तब, देख कर नया संसार…….
…………………………………….
प्यार, समर्पण, संघर्ष, ममता और विश्वास की मूरत होती है औरत
समेट दिन भर के ख्वाब
अपनी आँखों के काजल में
बांध लेती हो उम्मीदें
अपनी साडी के पल्लू में
रात में भर लेती हो अपनी मांग
असंख्य सितारों से, और रात के अंधेरे को गूंथ लेती हो अपने केशों में
औरत तुम होती हो पल्लवित
हर सुबह इसी तरह……।
………………………………….
अंत में दो पंक्तियाँ आशमा जी के लिए…..

‘मैं तो किरदार में ही रहना चाहती थी….
मगर ये जमाना कमबख्त मुखौटा मांगता है’…..🍀

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »