न्याय की भाषा हिंदी – इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की ऐतिहासिक पहल : विजय प्रभाकर नगरकर

भारत में न्याय की भाषा को लेकर लंबे समय से विमर्श चलता रहा है। संविधान और विधि व्यवस्था में अंग्रेज़ी का प्रभाव आज भी इतना गहरा है कि अधिकांश नागरिक न्यायालयों के निर्णय पढ़कर भी उन्हें समझ नहीं पाते। ऐसे समय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने हिंदी में बड़ी संख्या में निर्णय देकर न्याय को जनभाषा से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

उपलब्ध न्यायिक आँकड़ों के अनुसार न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने अपने कार्यकाल में हजारों मामलों का निस्तारण हिंदी तथा हिंदी-अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा में किया। वर्ष 2025 तक उन्होंने लगभग 79,500 से अधिक मामलों का निर्णय किया, जिनमें 27,800 से अधिक आदेश पूर्णतः हिंदी में तथा 51,000 से अधिक आदेश हिंदी-अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा में लिखे गए। यह उपलब्धि उन्हें हिंदी में सर्वाधिक न्यायिक आदेश देने वाले न्यायाधीशों में अग्रणी बनाती है।

न्याय और भाषा का संबंध:

न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वह नागरिकों की समझ में भी आना चाहिए। यदि निर्णय की भाषा ऐसी हो जिसे सामान्य व्यक्ति पढ़ ही न सके, तो न्याय की पारदर्शिता सीमित हो जाती है। भारत के अधिकांश वादकारी हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से अपनी बात रखते हैं, किंतु अंतिम निर्णय अंग्रेज़ी में होने के कारण उन्हें अधिवक्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है।

न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की पहल इस दूरी को कम करने का प्रयास है। हिंदी में निर्णय लिखने से न्यायालय की कार्यवाही आम नागरिक के अधिक निकट आती है तथा न्यायिक प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक बनती है।

संवैधानिक आधार:

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 348 उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में अंग्रेज़ी के प्रयोग का प्रावधान करता है, परंतु राष्ट्रपति की अनुमति से उच्च न्यायालयों में हिंदी अथवा राज्य की राजभाषा के प्रयोग की व्यवस्था भी की जा सकती है। उत्तर प्रदेश में हिंदी के प्रयोग को लेकर समय-समय पर विशेष प्रावधान किए गए हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी हिंदी में निर्णयों के अनुवाद तथा डिजिटल उपलब्धता की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। न्यायालय के ई-पोर्टल पर हजारों हिंदी अनूदित निर्णय उपलब्ध हैं, जिससे शोधकर्ताओं, अधिवक्ताओं तथा विद्यार्थियों को बड़ी सुविधा मिल रही है।

न्यायिक हिंदी का नया अध्याय:

न्यायमूर्ति चौधरी ने केवल हिंदी का प्रयोग ही नहीं किया, बल्कि यह सिद्ध किया कि जटिल विधिक अवधारणाओं को भी सशक्त और स्पष्ट हिंदी में व्यक्त किया जा सकता है। उनके अनेक निर्णयों में विधिक शब्दावली का संतुलित और व्यावहारिक प्रयोग दिखाई देता है। इससे यह धारणा भी कमजोर होती है कि न्यायिक लेखन केवल अंग्रेज़ी में ही संभव है।

तकनीकी युग में नई संभावनाएँ:

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन अनुवाद, डिजिटल न्यायालय तथा ई-कोर्ट परियोजनाओं के कारण भारतीय भाषाओं में न्यायिक सामग्री तैयार करना पहले की अपेक्षा अधिक सरल हो गया है। यदि न्यायालयों में मूल निर्णय भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होंगे तो—

  • न्याय तक आम नागरिक की पहुँच बढ़ेगी।
  • विधि शिक्षा अधिक समावेशी बनेगी।
  • भारतीय भाषाओं की विधिक शब्दावली समृद्ध होगी।
  • डिजिटल न्याय प्रणाली को नई गति मिलेगी।

चुनौतियाँ:

फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं—

  • पूरे देश में एकरूप न्यायिक पारिभाषिक शब्दावली का अभाव।
  • विभिन्न उच्च न्यायालयों की अलग-अलग भाषायी परिस्थितियाँ।
  • अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों का अंग्रेज़ी-केंद्रित प्रशिक्षण।
  • उच्चतम न्यायालय में अंग्रेज़ी की प्रमुख भूमिका।

इन चुनौतियों का समाधान प्रशिक्षण, मानकीकरण तथा प्रौद्योगिकी के बेहतर उपयोग से किया जा सकता है।

निष्कर्ष

न्यायमूर्ति गौतम चौधरी का कार्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में भाषायी लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने यह प्रमाणित किया है कि न्याय की भाषा वही होनी चाहिए जिसे जनता समझ सके। हिंदी में उनके हजारों निर्णय भविष्य के लिए प्रेरणास्रोत हैं और यह संदेश देते हैं कि भारतीय भाषाएँ केवल साहित्य की नहीं, बल्कि न्याय, प्रशासन और ज्ञान-विज्ञान की भी समर्थ भाषाएँ हैं।

यदि न्याय जनता के लिए है, तो उसकी भाषा भी जनता की भाषा होनी चाहिए। न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की पहल इसी विचार को व्यवहार में परिणत करने वाला एक ऐतिहासिक अध्याय है।

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