‘मेरे जीवन में मातृभाषा – स्थिति और चुनौतियाँ’ विषय पर वैश्विक हिंदी परिवार की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

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केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन (यूके) तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में विश्व के 70 से अधिक देशों के हिंदी व भारतीय भाषा प्रेमियों को जोड़ने वाली संस्था ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ द्वारा 06 सितंबर 2026 (रविवार) को एक विशेष अंतरराष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस विमर्श का केंद्रीय विषय ‘मेरे जीवन में मातृभाषा – स्थिति और चुनौतियाँ’ रहा। आभासी मंच पर देश-विदेश से जुड़े मूर्धन्य विद्वानों, भाषाविदों, शिक्षकों एवं युवा शोधार्थियों ने वैश्वीकरण, तकनीकी प्रसार और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के दौर में मातृभाषाओं के अस्तित्व, उनके संरक्षण तथा सृजनशीलता पर गहन मंथन किया।

आत्मीय स्वागत एवं पृष्ठभूमि
कार्यक्रम की शुरुआत सुश्री स्वरांगी साने के स्वागत वक्तव्य से हुई। उन्होंने भारतीय भाषाई विविधता के सौंदर्य को रेखांकित करते हुए कहा कि दक्षिण की भाषाएँ हों, मराठी हो या बांग्ला—सभी भाषाएँ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हैं। उन्होंने आज के दौर में मातृभाषाओं के प्रति घटते आत्मविश्वास पर चिंता व्यक्त की और कहा कि घर-परिवार तथा दैनिक व्यवहार में अपनी मातृभाषा बोलने में कोई झिझक या हीनता का भाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने आगामी भाषा प्रतियोगिता की संक्षिप्त रूपरेखा रखते हुए युवा पीढ़ी को भारतीय भाषाओं से जुड़ने का आह्वान किया।

इसके उपरांत कार्यक्रम की कुशल संचालिका सुश्री विशाखा (शोधार्थी, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने मंच संभाला। उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध पंक्तियों ‘जिसमें न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है…’ का स्मरण कराते हुए मातृभाषा को केवल संवाद का माध्यम न मानकर बचपन की पहली किलकारी, दादी-नानी की कहानियाँ, लोकसंस्कृति और अस्मिता की मूल पहचान बताया।

बीज वक्तव्य: सामाजिक संपदा और आधुनिक संसाधन के रूप में मातृभाषा
कार्यक्रम की बीज वक्ता सुश्री नर्मदा कुमारी (वरिष्ठ अनुवादक एवं भाषाकर्मी) ने भाषाविद् फर्दिनांद द सोस्यूर के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि भाषा समाज की वह साझी संपत्ति है जिसे हमें आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित सौंपना है। उन्होंने अंडमान-निकोबार की विलुप्त होती बोलियों का उदाहरण देते हुए आगाह किया कि एक भाषा के समाप्त होने से पूरी जीवन-शैली समाप्त हो जाती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आज मातृभाषा को केवल भावुकता तक सीमित न रखकर इसे रोजगार, सूचना तकनीक, एआई अनुवाद, साहित्य और पत्रकारिता से जोड़ना होगा। मातृभाषा के टिकाऊ विकास हेतु युवाओं द्वारा उच्च स्तरीय शोध की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने सभी से वैश्विक हिंदी परिवार की वेबसाइट पर बहुभाषी प्रतियोगिता में पंजीकरण करने का आग्रह किया और चैट बॉक्स में गर्व से भारतीय भाषाओं के प्रति निष्ठा प्रकट करने की पहल की।

विमर्श सत्र: युवा दृष्टि और व्यावहारिक अनुभव
कार्यक्रम के विमर्श सत्र में विभिन्न राज्यों के युवा विद्वानों और शोधार्थियों ने अपने शोधपरक विचार प्रस्तुत किए:

डॉ. नवदीप जोशी (पंजाब):

कवि हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियों से शुरुआत करते हुए डॉ. जोशी ने मातृभाषा को बच्चे के मानसिक और चारित्रिक विकास की पहली सीढ़ी बताया। उन्होंने मातृभाषा के ह्रास के पाँच मुख्य कारक गिनाए—अंग्रेजी का बढ़ता प्रभुत्व, नई पीढ़ी की उदासीनता, लोकसाहित्य व परंपराओं का लोप, अंधाधुंध शहरीकरण तथा इंटरनेट का असंतुलित प्रभाव। उन्होंने पंजाब के स्कूलों का अनुभव साझा करते हुए कहा कि अपनी बोली को हीन समझना सबसे बड़ी विडंबना है। उन्होंने पंजाबी भाषा में रचित भावपूर्ण काव्य पंक्तियों के माध्यम से मां बोली के सत्कार का संदेश दिया।

सुश्री आरुषी ठाकुर (दिल्ली):

चतुर्थ वर्ष की शोध छात्रा आरुषी ठाकुर ने यूनेस्को तथा पीपल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (PLSI) के आँकड़े रखते हुए बताया कि विगत दशकों में भारत की सैकड़ों भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं। उन्होंने पर्यावरण परिवर्तन और भाषा के अंतर्संबंध का अनूठा उदाहरण देते हुए बताया कि मौसम चक्र बदलने से निकोबारी जैसी भाषाओं के कई पारंपरिक शब्द (जैसे शांत समुद्र का सूचक शब्द ‘ताम्राज’) लुप्त हो रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया और सिनेमा (जैसे वैश्विक मंचों पर भारतीय गीतों की लोकप्रियता) के सकारात्मक भाषाई प्रभाव को रेखांकित किया।

सुश्री किरण सिंह (पश्चिम बंगाल):

उपन्यास एवं सिनेमा पर शोध कर रहीं किरण सिंह ने कहा कि व्यक्ति का मौलिक चिंतन और रचनात्मक लेखन सदैव उसकी मातृभाषा में ही स्वाभाविक होता है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने के प्रावधान का समर्थन किया। उन्होंने देश की कई विलुप्तप्राय बोलियों (बघाती, हंदूरी, पंगवाली, मंडा, परजी, कोरागा आदि) का उल्लेख करते हुए कहा कि जब तक मातृभाषा को आजीविका और रोजगार के अवसरों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक यह संकट बना रहेगा।

विशिष्ट वक्ताओं के विचारोत्तेजक दृष्टिकोण
डॉ. विवेक शर्मा (असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय):

डॉ. विवेक शर्मा ने नेल्सन मंडेला के प्रसिद्ध कथन को उद्धृत किया कि यदि आप किसी व्यक्ति से उसकी समझ वाली भाषा में बात करते हैं तो वह उसके मस्तिष्क तक जाती है, परंतु यदि उसकी मातृभाषा में बात करते हैं तो वह उसके हृदय को छूती है। उन्होंने कोठारी आयोग से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति तक का विश्लेषण किया। उन्होंने चिंता जताई कि दिल्ली सहित कई प्रमुख विश्वविद्यालयों और महानगरों के स्कूलों में विद्यार्थी हिंदी व मातृभाषा के प्रति उपेक्षा बरतते हैं। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि अपनी भाषा की उपेक्षा एक प्रकार से भाषिक आत्महत्या है। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र की उक्ति ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ के माध्यम से मातृभाषा के संवर्धन पर बल दिया।

डॉ. मुदस्सिर अहमद भट्ट (सहायक आचार्य, कश्मीर विश्वविद्यालय):

शारदा पीठ और कश्मीरी भाषा के ऐतिहासिक संदर्भ को रखते हुए डॉ. मुदस्सिर अहमद ने भाषा के चार प्रमुख स्तंभों—श्रवण, वाचन, पठन और लेखन की महत्ता बताई। उन्होंने व्यावहारिक सच्चाई स्वीकार करते हुए कहा कि कश्मीरी में लोग सुनते और बोलते तो धाराप्रवाह हैं, परंतु पढ़ने और लिखने वालों की संख्या चिंताजनक रूप से कम है। उन्होंने कहा कि जब तक पठन और लेखन पर काम नहीं होगा, भाषा का संवर्धन अधूरा रहेगा। उन्होंने कश्मीरी शब्दावली की सूक्ष्म अर्थ-छवियों का उदाहरण देते हुए स्थानीय भाषाई संपन्नता पर गर्व करने का संदेश दिया।

डॉ. किरण खन्ना (विभागाध्यक्ष, डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर):

डॉ. किरण खन्ना ने प्रो. पूरण सिंह के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा कि यदि भाषा विचारों की पोशाक है, तो मातृभाषा आत्मा की आवाज है। उन्होंने रेखांकित किया कि सुख, दुख, प्रेम और क्रोध जैसी नैसर्गिक मानवीय संवेदनाओं की सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 350(क) तथा त्रि-भाषा सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा बच्चे की बौद्धिक नींव मजबूत करती है, जिससे अन्य भाषाओं को सीखना और भी सरल हो जाता है। उन्होंने महानगरों की बहुभाषी कक्षाओं में शिक्षण सामग्री तथा शिक्षक प्रशिक्षण की चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान सुझाए।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: प्रो. तोमियो मिज़ोकामी (जापान)
कार्यक्रम में ओसाका विश्वविद्यालय (जापान) के प्रो. तोमियो मिज़ोकामी ने विशेष रूप से शिरकत की। उन्होंने जापान का प्रेरक उदाहरण देते हुए बताया कि जापानी वैज्ञानिक और विद्वान अपनी मातृभाषा में ही चिंतन, शोध और अध्यापन करते हैं। वर्ष 2007 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले जापानी भौतिक विज्ञानी ने स्वीडन के राजमहल में अंग्रेजी के स्थान पर पूरी दृढ़ता से अपनी मातृभाषा जापानी में वक्तव्य दिया था। प्रो. मिज़ोकामी ने प्रश्न किया कि क्या भारत में ऐसा आत्मविश्वास नहीं दिखना चाहिए? उन्होंने कहा कि भाषाई विविधता भारत की अमूल्य शक्ति है और अपनी भाषा बोलने में कोई हीनता नहीं, बल्कि स्वाभिमान होना चाहिए।

मुख्य वक्ता का उद्बोधन: आंदोलन नहीं, सृजन की आवश्यकता
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने अपने मुख्य वक्तव्य में कई गंभीर और यथार्थवादी प्रश्न उठाए। अपनी मातृभाषा अवधी का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषा को बचाने के लिए किसी बाह्य आंदोलन या दूसरी भाषाओं से कृत्रिम प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता केवल अपनी भाषा में निरंतर सृजन करने की है।

प्रो. सिंह ने कहा कि आज जब ज्ञान-विज्ञान, डिजिटल क्रांति और वैश्विक बाजार अंग्रेजी को केंद्र में रखकर संचालित हो रहे हैं, तब हमें ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और समाजशास्त्र की उच्च स्तरीय पुस्तकें अपनी भाषाओं में रचनी होंगी। यदि हम अपने बच्चों से अपनी मातृभाषा में बात नहीं करेंगे और उसमें मौलिक ज्ञान का सृजन नहीं करेंगे, तो हम एक नए प्रकार के भाषाई व सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का शिकार हो जाएँगे।

सानिध्य एवं अध्यक्षीय उद्बोधन
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं बाबा साहेब आंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी (कोलकाता) की पूर्व कुलपति एवं प्रख्यात विदुषी डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय ने बांग्ला भाषा की अमर पंक्ति ‘मोदेर गॉरोब, मोदेर आशा, आमरी बांग्ला भाषा’ से अपने वक्तव्य का शुभारंभ किया।

डॉ. बंद्योपाध्याय ने चीन यात्रा का संस्मरण सुनाते हुए बताया कि चीनी लेखक संघ के अध्यक्ष ने भारतीय लेखकों के अंग्रेजी में बोलने पर आश्चर्य जताया था और अपनी भाषाओं में संवाद करने की सीख दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाएँ आपस में प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक और सहोदरा हैं। यदि हिंदी को सशक्त बनाना है, तो सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलना होगा। उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बांग्ला भाषा को प्रशासनिक व शैक्षिक कार्यों में प्राथमिकता दिए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि मातृभाषा हमारे स्वप्न देखने और स्वप्न टूटने की पीड़ा व्यक्त करने की भाषा है। उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार के संरक्षक श्री अनिल जोशी की मां के हाथ के भोजन और मातृभाषा पर रचित कविता का वाचन कर सभी को भावविभोर कर दिया।

समाहार एवं औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन
समाहार वक्तव्य में अंतरराष्ट्रीय संस्कृति अध्येता श्री नारायण कुमार ने कहा कि भाषा के साथ-साथ हमारी संस्कृति और संस्कार भी जुड़े हैं। उन्होंने अपनी प्रांतीय भाषाओं और बोलियों को ‘विस्तारित मातृभाषा’ मानकर संरक्षित करने तथा महात्मा गांधी के भाषाई दृष्टिकोण को अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के अंत में दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी श्री प्रखर शर्मा ने समस्त मंच का औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने अध्यक्ष डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय, बीज वक्ता सुश्री नर्मदा कुमारी, मुख्य वक्ता प्रो. सुधीर प्रताप सिंह, विशिष्ट वक्ताओं, युवा विमर्शकर्ताओं, संरक्षक श्री अनिल जोशी तथा संयोजक मंडल—श्री ऋषि कुमार शर्मा, श्री विनयशील चतुर्वेदी, डॉ. शिवम शर्मा, डॉ. जयशंकर यादव, डॉ. सुरेश मिश्र एवं तकनीकी टीम के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।

लगभग दो घंटे से अधिक चले इस ऑनलाइन आयोजन ने यह दृढ़ संकल्प स्थापित किया कि मातृभाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्र निर्माण का मूल आधार है।

रिपोर्ट प्रस्तुति – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

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