दिन विशेष (कविता, ग़ज़ल) : डॉ. श्वेता सिंह ‘उमा’ की रचना

मॉस्को, रूस से आज पढ़िए डॉ. श्वेता सिंह उमा की रचनाएँ। उनकी लेखनी संवेदनशीलता, आध्यात्मिकता और मानवीय भावनाओं की गहराइयों को व्यक्त करती है। उनका बहुआयामी रचनात्मक व्यक्तित्व है। कला, साहित्य, सिनेमा और फैशन की दुनिया में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। आज तक साहित्य अड्डा, दूरदर्शन, आकाशवाणी और साहित्य और अदब से जुड़े देश विदेश के कई मंचों (यूरोप, दुबई , ओमान, भूटान, रुस, अमेरिका) पर वे काव्य पाठ कर चुकी हैं। – स्वरांगी साने

Sweta singh umaa

ऐसी नारी बेहद खतरनाक होती है

ऐसी नारी बेहद ख़तरनाक होती है,
शक्ति से लबरेज़, रूह से पाक होती है।
जो तन्हाई को अपनी ताक़त बनाने लगे,
ख़ुद को हुनर के गहनों से सजाने लगे।
आत्मविश्वास से अपना दामन भरने लगे,
फ़लसफ़ों की गहराइयों में उतरने लगे।
ख़ुद को वक्त देने के लिए ख़ुद से लड़ने लगे,
आहिस्ता-आहिस्ता अपना वजूद गढ़ने लगे।
आँखों में उम्मीद का काजल उतारने लगे,
डर की आँखों में आँखें डाल दहाड़ने लगे।
तो जान लो…
वो अबला अब बात-बात पे नहीं रोती है,
ऐसी नारी बेहद ख़तरनाक होती है,
हाँ, बेहद ख़तरनाक होती है।
किसी का अब वो बेवजह इंतज़ार नहीं करती,

अपने हक के लिए कभी गुहार नहीं करती।
झूठे वादों पर अब उसे ऐतबार नहीं होता,
तिरस्कार सहना अब स्वीकार नहीं होता।
छोड़ दिया कंटीले रिश्तों को गुलज़ार करना,
बंद किया अपनी गरिमा का व्यापार करना।
बल्कि वो तो…
अपनी नियति की शिल्पकार बन गई है,
तप कर ख़ुद वो मलय का हार बन गई है।
शक्ति को सृजन का आधार बना लिया है,
ख़ुद को ख़ुद के मोक्ष का द्वार बना लिया है।
अब वो अबला बात-बात पे नहीं रोती है,
ऐसी नारी वाक़ई बेहद ख़तरनाक होती है,
हाँ, बेहद ख़तरनाक होती है।

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ग़ज़ल

चाहतों में डूब जाने का इरादा कर लिया
तुमको कान्हा कहके हमने ख़ुद को राधा कर लिया
इश्क़ में तेरे अजब सा ये करिश्मा कर लिया
सारी दुनिया की मोहब्बत से किनारा कर लिया
बंद आँखों से जो हमने ख़ुद में ढूँढा आपको
हद-ए-इमकाँ से भी आगे का नज़ारा कर लिया
आँसुओं में चाशनी जब इश्क़ की घोली गई
बहते अश्कों का नमक हमने भी आधा कर लिया

हम ख़िज़ाँ वाले हमारी बात ही कुछ और है
तुमने क्यों अपने चमन को ख़ुश्क सहरा कर लिया
चीख़ती रोती रही इन्सानियत बाज़ार में
सबने लब ख़ामोश और कानों को बहरा कर लिया
दोस्तों की महफ़िलों में इसका चर्चा है बहुत
दुश्मन-ए-जानी को हमने कैसे अपना कर लिया
हद से ज़्यादा रंजिशें हों या मोहब्बत बेपनाह
हमको जो कुछ भी मिला उसको गवारा कर लिया
पैरहन ये रूह की भक्ति में रंग जाए ‘उमा’
इसलिए किरदार अपना हमने सादा कर लिया

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नज़्म – एकाकार हो जाए तो अच्छा है

कोलाहल खुद का समेट कर,
एकाकार हो जाए तो अच्छा है।
नूर-ए-इलाही के इश्क़ में….
निराकार हो जाए तो अच्छा है।
उसके होने की गवाही भला
मुल्ला और पंडित क्यों दें?
पाकीज़ा रूहों में ईश्वर का
दीदार हो जाए तो अच्छा है।
दरिया हूँ, बरसने दो मुझ पर
संदली ख़्वाबों के बादल।
महकती बूंदों से लबरेज़
आबशार हो जाए तो अच्छा है।
उस जुर्म की सज़ा पायी,

जो कभी की ही नहीं मैंने।
सज़ा-ए-मौत से पहले वो ख़ता…
एक बार हो जाए तो अच्छा है।
शिकस्ता दिल की कहानी
तो अब पुरानी हो चली है।
नौखेज़ ख़्वाहिशों से ज़िंदगी
गुलज़ार हो जाए तो अच्छा है।
ज़िंदगी की रक़ीबी सोच को…
जड़ों से साफ़ करना है।
बुलंद इरादों के हर तीर में…
जो धार हो जाए तो अच्छा है।
ज़िंदगी के कुरुक्षेत्र में
समर खुद से ही तो करना है।
हर जागृत रूह जो कृष्ण का
अवतार हो जाए तो अच्छा है।
अंतस के मंदिर में जलाया है
मौन का एक दीपक मैंने।
अब जो साँसों में ‘सोऽहम्’ का
उच्चार हो जाए तो अच्छा है।
न मैं रहूँ, न मेरा कुछ शेष बचे,
बचे तो बस वो परम सत्य।
‘मैं’ से ‘हम’ का यह सफ़र
जो पार हो जाए तो अच्छा है।

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