दिन विशेष युवा लेखन में डॉ. ‘राम प्रवेश राजक’ की कविताएँ

डॉ. राम प्रवेश राजक
पदनाम: सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय
संपर्क : हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, स्टाफ रूम-87/1, आशुतोष बिल्डिंग, कॉलेज स्ट्रीट, कोलकाता-700073
ईमेल: rajak.ram2010@gmail.com
पुल
एक खौफ और बेइज़्ज़ती
की ज़िंदगी हमेशा
नफ़रत पैदा करती है
जब हम मिलकर जीना
सीख जाएँगे
टुकड़ों में नहीं जिएँगे
समाज में सबका हक़
बराबर का होगा
चारों ओर चैन
और अमन होगा
उस दिन हम जंजीरें
नहीं बनाएँगे
दीवारें नहीं बनाएँगे
पुल बनाएँगे
वह तो मैं था
किसी ने ऊपर वाले
से कहा
मैं आपको देखना
चाहता हूँ
आपको महसूस करना
चाहता हूँ
ऊपर वाले ने
जवाब दिया
जब तुम अपने गर्म
बिस्तर में चैन की
नींद सो रहे थे और
सर्दियों की उस रात में
एक भीगते हुए शख्स ने
तुम्हारे दरवाजे पर
दस्तक दी थी
वह तो मैं था
जब तक तुम सड़क पर
से गुजरते थे
और एक शख्स से चला
नहीं जा रहा था
तुम तेजी से गुजर गए
तुम दफ्तर के लिए
देर हो रहे थे
वह तो मैं ही था
सड़क पार नहीं कर पा रहा था
तुमने उसको कभी
देखने की कोशिश नहीं की।
यकीन
मैंने नैनीताल की
प्राकृतिक छटा को देखा
बहुत खुश हुआ, ऊपर वाले की कुवत पर।
दूसरी बार ताजमहल
देखा तो और खुश हुआ
लोगों के हुनर पर।
तीसरी बार तब खुश हुआ जब एक बच्ची
को देखा सड़क पर फेंके
फूल से एक गुलदस्ता बनाकर
बेचते हुए।
जो बोल रही थी
इसे मैंने बनाया है
खरीद लीजिए साहब
भगवान आपका भला करेगा।
जिस मुल्क का बच्चा
मेहनत करना जानता है
वह सब कुछ कर सकता है
जिंदगी का यकीन पुख्ता
हो गया।
