दिन विशेष व्यंग्य : आँख का पानी ढला! – मनीषा सहाय ‘सुमन’

धरती ने एक दिन आईना देखा और वह डर गई ।
तुरंत बिना देर किये वह परमपूज्य प्रकृति के पास जा पहुँची।
उसकी लंबी चौड़ी शिकायती फेहरिस्त नें जग जीवनदायनी प्रकृति को चक्कर में डाल दिया। वह कह उठी —
“इतनी बड़ी लिस्ट धरती! आरोप – प्रत्यारोप की इस फेहरिस्त को आँकना होगा और इसपर कमेटी बैठाकर गंभीरता से जाँचना होगा।”

प्रकृति का कमेटी गठन का आश्वासन सुन धरती वहीं निढाल हो गयी। धरती के निढाल होते ही पहाड़ दरकने लगे , समुद्र के अंदर सुनामी-सी आने लगी। समतल पर बसे बड़े – बड़े महानगरों में भूकंप के झटके आने लगे।

आनन फानन में सूरज ,चाँद से लेकर ॠतु परिवर्तन के सभी उत्तरदायी कारकों व ग्रहों की बैठक बुलायी गई । आखिर मानव व जीव जंतु से सुशोभित धरती की समस्या क्या है?

यह जानने के लिये सूरज ने अपने गुप्तचरों को काम पर लगाया! परंतु वह शीघ्र ही असहाय हो लौट आए और कारण बताया कि, “धरती के जीव ‘मानव’ द्वारा निर्मित कृत्रिम उपग्रहों के जाल के कारण, वह धरती तक पहुँचने में असफल रहे हैं।
सूरज की चिंता बढ़ गयी और उसने चंद्रमा को कहा कि..” तुम तो धरती के नजदीक हो तुम ही संकट का पता लगाओ, धरती तक पहुँच कर सही कारण का पता लगाओ!
चंद्रमा ने अपने लश्करों को आदेश दिया कि जल्द से जल्द रात का अँधेरा होते ही धरती पर पहुँचकर बीमारी का मुआयना करके आओ ! जिससे धरती बहन को सही सहायता पहुँचाई जा सके। सभी धरती की अवचेतना से परेशान थे, तभी प्रकृति और अन्य ग्रहों के कानों में बारंबार करूण क्रंदन की धीमी- धीमी परंतु लगातार आवृति गूँजने लगी।
यह आवाज इतनी मर्माहत थी कि पूरा ब्रह्मांड इससे विचलित हो उठा। सभी ने चंद्रमा से पूछा कि,
“बताओ क्या कुछ पता लगाया तुमने?”
चंद्रमा ने कहा कि, “मेरी किरणें तो पृथ्वी तक शायद जा रहीं हैं परंतु मैं वहाँ नही जा सका, वहाँ तो रात में दिन से भी कहीं ज्यादा रोशनी जगमगा रही है। मैने बहुत कोशिश की वहाँ तक पहुँचने की पर धरती पर प्रकाश से जगमग- जगमग स्वचलित छोटे – छोटे उपकरण, इतनी गरमी और प्रकाश फैला रहे हैं कि मेरी शीतल किरणें झुलसने लगीं, अत: मैं वहाँ जा पाने में असमर्थ हूँ ।”
चंद्रमा को मुँह लटकाये देख मंगल ग्रह ने भी लगे हाथ अपनी शिकायत दर्ज करा दी —
“धरती से अक्सर मानव संचालित यान चंद्रमा की धरती पर बिना इजाजत आते जाते हैं। अब तो यह मेरी धरती तक पहुँचने में भी सफल रहे हैं, आखिर इनकी मंशा क्या है? यह पता लगाना जरूरी है।”
तभी सूरज से मुखातिब होकर बृहस्पति, जो सभी में सबसे बड़ा ग्रह है। उसने अपने दोनो कान को हाथों से दबाते हुए कहा– “दादा ! सबसे पहले यह मर्माहत ध्वनि आवृति को रोकें, नही तो इसके कंपन से पूरा ब्रह्मांड काँपने लगेगा।”
अब सूरज ने धरती पर जीवन के प्रमुख कारक जल से संपर्क साधा– “अरे! जल धरती की मूर्छा को मिटाओ, थोड़ा जल बरसाकर उसे होश में तो लाओ!”

सूरज के इस तरह सीधे संवाद से प्रसन्न होकर जल कारक अपना सर्वस्व अर्पण करते हुए
झूमते-झामते बरसने लगा, साथ ही वह यह पंक्तियाँ दोहराता रहा कि…
“आँख से पानी ढला!
आँख का पानी ढला!”

उसके इस तरह के हास्य व्यंग्य विनोद से प्रकृति ने उसे फटकारा और कहा —
“अरे यह क्या? पूरा संसार परेशान है, तुम्हें हँसी सूझ रही है।”
सूरज ने उसकी पंक्तियों पर गहराई से विचार करके पूछा — “पहेलियाँ मत बुझाओ! तुम्हे जो ज्ञात है उसे स्पष्ट बताओ!”
जल की आँखें झर-झर बहने लगीं तो प्रकृति ने उसे सँभाला और ध्यान से मूर्छित धरती को निहारा! ….
तो देखा मानव नाम के जीव ने धरती के वक्ष को खोखला कर डाला है। धरती पर बह रही नदियाँ, खामोश खड़े जंगल जो जीवन के स्रोत है, मानव ने अपनी बुद्धि के अहंकार में उसका दोहन कर, उस पर अतिक्रमण कर धरती के सीने पर कंक्रीट,अयस्क की बड़ी – बड़ी अट्टालिकाएँ खड़ी कर दी हैं। चिमनियों, फेक्टरियों से विषाक्त तत्वों ने वायु के घनत्व और संतुलन को चुनौती दे डाली है। इससे आहत धरती अधमरी होकर कराह रही है। जब आपके आदेश से मैने उसपर जल की शीतलता की बौछार डाली तो धरती की रक्षा के लिये पहाड़ों ने अपनी उँचाई के अहम का त्याग करते हुए, धरती के वक्ष को भरने के लिये नीचे आने की ठानी, नदियाँ अपनी वेगमयी धारा के साथ लकड़ी, जंगल शिलाखंड, मानव निर्मित स्वाचलित वाहन व निर्माण को बहा कर पुन: धरती के वक्ष को भरने, मिट्टी के निर्माण और उपजाऊ मैदान के निर्माण को सक्रिय हो उठे है। धरती के कष्ट को हरने के लिये सभी ग्रह व प्रकृति अब पुनर्निर्माण में अपना सर्वस्व देने में जुट गये हैं। अब पुन: धरती पर समतल मैदान होंगे,नदियों में जल भरे होंगे, जंगल में हरियाली छायी होगी, शुद्ध शीतल हवा से धरती मुस्कुरा उठेगी। तभी छोटे छुद्र ग्रहों ने प्रश्न किया … “पर मानव के खेत- खलिहान , गली -मुहल्ले, शहर और महानगर सभी पानी – पानी हो चुके हैं, उसका क्या?”
प्रकृति ने अपने ॠतु चक्र पर गर्व करते हुए कहा–

आँख से पानी ढला!
आँख का पानी ढला!”
बादल फटा!
पहाड़ धँसा!
नदियाँ खतरे के निशान के उपर!
कहीं आँख से पानी गया
कहीं आँख का पानी ढला !

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