विषय : डिजिटल युग में भाषा, समाज और पठन

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स्थान : फ्रैंकफर्ट, जर्मनी | दिनांक : 8 अक्टूबर 2026 | समय : दोपहर 1:30 से 2:30 बजे तक

केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 8 अक्टूबर 2026 को फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला 2026 के इंडिया स्टेज पर ‘डिजिटल युग में भाषा, समाज और पठन’ विषय पर एक महत्त्वपूर्ण परिचर्चा का आयोजन किया गया। दोपहर 1:30 बजे से 2:30 बजे तक आयोजित इस परिचर्चा में भाषा, साहित्य, पठन-संस्कृति और प्रौद्योगिकी के बदलते संबंधों तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव पर सार्थक विचार-विमर्श हुआ।

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परिचर्चा की मेजबानी केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के निदेशक प्रो. हितेंद्र मिश्र ने की। परिचर्चा के विशिष्ट वक्ताओं में जर्मनी में भारतीय भाषाओं एवं सामुदायिक संवाद के प्रतिनिधि श्री रुद्रदेव देवुलपल्ली, साहित्य अकादेमी के सचिव प्रो. वरुण गुलाटी तथा डार्मश्टाट इंडियन एसोसिएशन एवं बिहार फ्रेटरनिटी, फ्रैंकफर्ट के संस्थापक सदस्य श्री राहुल नारायण शामिल रहे।

  1. भाषा का बदलता स्वरूप : क्षरण नहीं, जीवंतता का प्रमाण

परिचर्चा में श्री रुद्रदेव देवुलपल्ली ने भाषा के बदलते स्वरूप और संचार के नए माध्यमों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भाषा एक जीवंत तथा निरंतर विकसित होने वाली मानवीय अभिव्यक्ति है। इमोजी, संक्षिप्त शब्दों तथा हिंग्लिश जैसी मिश्रित भाषायी शैलियों को भाषा के पतन या क्षरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये भाषा की जीवंतता, अनुकूलनशीलता और स्वाभाविक विकास के प्रमाण हैं।

उन्होंने रेखांकित किया कि संचार के ये नए रूप विचारों, भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करने के नए तरीके विकसित कर रहे हैं। आज अभिव्यक्ति केवल पारंपरिक वाक्य-रचना तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि दृश्य संकेतों, संक्षिप्त रूपों और भाषायी मिश्रण के माध्यम से संवाद के नए आयाम भी सामने आ रहे हैं।

  1. मुद्रित पुस्तक का भविष्य और पठन की नई संस्कृति

श्री देवुलपल्ली ने मुद्रित पुस्तकों के भविष्य पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों के विस्तार का अर्थ यह नहीं है कि मुद्रित पुस्तकें विलुप्त हो जाएँगी। इसके विपरीत, मुद्रित पुस्तक का महत्त्व एक विशिष्ट और अधिक मूल्यवान पठन-अनुभव के रूप में उभर सकता है।

डिजिटल स्क्रीन समाचार, त्वरित जानकारी और डिजिटल कथा-साहित्य जैसी दैनिक एवं तात्कालिक पठन-आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं, जबकि मुद्रित पुस्तकें अपने स्पर्श-सुख, सौंदर्य, स्थायित्व और अपेक्षाकृत व्यवधान-मुक्त पठन-अनुभव के कारण अपना विशिष्ट महत्त्व बनाए रखती हैं।

उन्होंने कहा कि भविष्य में एक ऐसा बहुआयामी पठन-परिवेश विकसित होगा, जिसमें संवादात्मक डिजिटल ऐप, रोचक एवं अनुभवानुभूति से युक्त ऑडियोबुक तथा उत्कृष्ट मुद्रित संस्करण एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। प्रत्येक माध्यम पाठकों की अलग-अलग रुचियों, आवश्यकताओं और मनोवैज्ञानिक अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी भूमिका निभाएगा।

  1. मौखिक परंपराओं से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक : ज्ञान-यात्रा का नया अध्याय

भारत की समृद्ध ज्ञान-परंपरा का उल्लेख करते हुए श्री देवुलपल्ली ने कहा कि भारतीय पुराणों, इतिहासों और साहित्यिक परंपराओं का संरक्षण सदियों से विभिन्न माध्यमों द्वारा होता आया है। प्राचीन काल में ताड़पत्रों सहित विभिन्न प्रकार की पांडुलिपियों पर ज्ञान का लेखन किया जाता था। इसके साथ ही मौखिक परंपरा ने भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान, कथाओं, जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक स्मृतियों को पहुँचाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों में पांडुलिपियों और अन्य भौतिक अभिलेखों के नष्ट होने अथवा लुप्त हो जाने के बावजूद मौखिक परंपराओं ने ज्ञान के संरक्षण और हस्तांतरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अठारहवीं शताब्दी में मुद्रण तकनीक के विकास के बाद ज्ञान का प्रसार मुद्रित पृष्ठों और पुस्तकों के माध्यम से व्यापक होने लगा। इसके बाद रेडियो और टेलीविजन ने सूचना तथा विचारों के प्रसार के नए माध्यम उपलब्ध कराए।

अब मानव समाज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ChatGPT जैसे उपकरणों के माध्यम से ज्ञान तक पहुँचने, उसे समझने और उससे जुड़ने के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।

श्री देवुलपल्ली ने इस बदलाव को पठन की विस्तारित अवधारणा ‘रीडिंग प्लस’ (Reading Plus) के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, आने वाले समय में पारंपरिक पठन के साथ संवादात्मक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से ज्ञान-अन्वेषण, बहुभाषिक पहुँच और साहित्य से जुड़ने के नए तरीके विकसित होंगे। वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियाँ भी ज्ञानार्जन, पठन और अनुभव की इस परिवर्तनकारी यात्रा की साक्षी बनेंगी।

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रौद्योगिकी में होने वाली प्रगति के साथ भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और विकास के प्रति हमारी प्रतिबद्धता भी निरंतर बनी रहनी चाहिए, क्योंकि भाषाएँ ही संस्कृति, सामूहिक स्मृति, पहचान और सभ्यतागत ज्ञान की प्रमुख संवाहक हैं।

  1. प्रौद्योगिकी : भाषाओं और संस्कृतियों के बीच सेतु

परिचर्चा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि डिजिटल मंच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ज्ञान तक पहुँच का विस्तार करने, भाषाओं को भौगोलिक सीमाओं के पार पहुँचाने, नवोदित लेखकों को वैश्विक मंच प्रदान करने तथा भारतीय भाषाओं के साहित्य को अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

वक्ताओं ने कहा कि प्रौद्योगिकी को भाषाओं और संस्कृतियों के बीच बाधा नहीं, बल्कि सेतु के रूप में कार्य करना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय सृजनशीलता, स्वतंत्र चिंतन और सांस्कृतिक समझ को सहयोग प्रदान करे, न कि साहित्य एवं बौद्धिक गतिविधियों में मानवीय योगदान का स्थान ले।

भारत की असाधारण भाषायी एवं सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में यह भी रेखांकित किया गया कि बदलते समय के साथ भाषाओं को नए माध्यमों में अभिव्यक्त होने के अवसर देना आवश्यक है। साथ ही, उनकी विशिष्ट पहचान, सांस्कृतिक जड़ों और साहित्यिक परंपराओं को अक्षुण्ण रखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।

  1. पठन का भविष्य : प्रौद्योगिकी और मानवीय संवेदना का संतुलन

परिचर्चा का केंद्रीय निष्कर्ष यह रहा कि पठन का भविष्य मुद्रित पुस्तक और डिजिटल स्क्रीन में से किसी एक को चुनने में नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी और मानवीय संवेदना के बीच सार्थक संतुलन स्थापित करने में निहित है।

प्रौद्योगिकी पुस्तकों की पहुँच का विस्तार करे, लेकिन पठन की गहराई कम न हो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय सृजनशीलता को सहयोग दे, उसका स्थान न ले। डिजिटल संचार भाषाओं एवं संस्कृतियों को निकट लाए, लेकिन उनकी विशिष्ट पहचान और परंपराओं को अक्षुण्ण रखे।

केंद्रीय हिंदी निदेशालय हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा भारतीय भाषाओं, साहित्य और ज्ञान-परंपराओं के संरक्षण, संवर्धन एवं व्यापक प्रसार के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निरंतर कार्य कर रहा है।

फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में आयोजित इस परिचर्चा ने यह संदेश दिया कि भविष्य की ओर बढ़ते हुए हमें तकनीकी नवाचार को अपनाने के साथ अपनी भाषायी विविधता और सांस्कृतिक विरासत के प्रति भी सजग रहना होगा। ऐसा भविष्य निर्मित करना आवश्यक है, जहाँ प्रौद्योगिकी पाठकों को जोड़े, भाषाएँ अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखें और पठन मानवीय संवेदना, विचारशीलता तथा परस्पर समझ को और अधिक गहरा बनाए।

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