स्मार्ट-गोबर (व्यंग्य)
रामपुरिया गांव के स्वयंभू वैज्ञानिक ‘गबड़ू लाल’ ने जब प्रधानी के चुनाव में कदम रखा, तो उन्होंने पारंपरिक विकास की बलि चढ़ा दी। उनका चुनावी मुद्दा था—’गोबर का डिजिटलाइजेशन’। गबड़ू लाल का तर्क था कि जिस गांव का पशुधन केवल सड़क पर कीचड़ फैला रहा है, वह गांव कभी आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। उन्होंने घोषणा की कि जीतते ही वे गांव में ‘गोबर-माइनिंग सेंटर’ खोलेंगे, जहाँ हर गाय और भैंस के गोबर को ‘ऑर्गेनिक बिटकॉयन्स’ में बदला जाएगा। उनका दावा था कि इस गोबर से ऐसी गैस बनाई जाएगी जो न केवल चूल्हा जलाएगी, बल्कि ग्रामीणों के दिमाग की जंग लगी बत्तियां भी रोशन कर देगी। गांव के लोग, जो अब तक गोबर को सिर्फ उपले बनाने के काम लाते थे, अचानक उसे ‘काला सोना’ समझकर अपनी तिजोरियों में रखने का सपना देखने लगे। गबड़ू लाल ने एक पुराने जेनरेटर पर पेंट करके उसे ‘गोबर-प्रोसेसर’ घोषित कर दिया था, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग अपनी नाक दबाकर आने लगे थे।
प्रचार के अंतिम चरण में गबड़ू लाल ने गांव के अखाड़े के पास एक ‘नेचर-स्कैनर’ लगाया। यह वास्तव में एक टूटा हुआ सीसीटीवी कैमरा था जिसे उन्होंने एक नीम के पेड़ पर रस्सी से बांध दिया था। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि यह कैमरा गांव के हर पशु की मानसिक स्थिति और उसके ‘आउटपुट’ की क्वालिटी पर नज़र रख रहा है। जो भी ग्रामीण गबड़ू लाल को वोट देने की प्रतिज्ञा करेगा, उसकी भैंस का गोबर सीधे ‘प्रीमियम ग्रेड’ में रजिस्टर होगा और उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के भाव बेचा जाएगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘बुधु राम’ नाली-खड़ंजे की पुरानी रट लगा रहे थे, लेकिन जनता को तो गोबर में डॉलर छपते दिख रहे थे। गबड़ू लाल ने एक लाउडस्पीकर पर गायों की डकार की आवाज़ें रिकॉर्ड करके चला दीं, जिसे उन्होंने ‘प्रकृति का अप्रूवल’ बताया। लोग अपने जानवरों को वीआईपी ट्रीटमेंट देने लगे ताकि गबड़ू लाल की मशीन में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो सके।
जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और गबड़ू लाल भारी बहुमत से जीत गए, पूरा गांव अपनी ‘गोबर-रसीद’ और डॉलर का हिस्सा मांगने उनके घर पहुंचा। गबड़ू लाल ने बड़े इत्मीनान से एक बड़ा सा कड़ाहा खोला जिसमें ताज़ा गोबर भरा था और सबको एक-एक फावड़ा थमा दिया। जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, हमारे डॉलर और बिटकॉयन्स कहाँ हैं?” गबड़ू लाल ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए गंभीर आवाज़ में कहा— “मूर्खों! असली बिटकॉयन्स तो यही गोबर है। मैंने तो सिर्फ तुम्हें यह एहसास कराया कि तुम लोग पांच साल तक इसी में सने रहने के लायक हो! डॉलर तो वे थे जो मैंने तुम्हारे चंदे से बटोर कर अपनी नई एसयूवी की किस्त भर दी। अब इस गोबर को उठाओ और अपने खेतों में डालो, क्योंकि लोकतंत्र का असली स्वाद तो इसी की सड़ांध में छिपा है।” जनता सन्न खड़ी अपने हाथों में फावड़ा पकड़े एक-दूसरे का मुंह ताक रही थी, जबकि गबड़ू लाल अपनी नई गाड़ी का सायरन बजाते हुए ‘वेस्ट मैनेजमेंट’ का सरकारी फंड डकारने शहर की ओर निकल पड़े।
– डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
