ऊधो मन न भए दस-बीस…(स्वरांगी साने)
इंदौर से उज्जैन कितनी दूरी पर है?
-56
-अरे 56 तो दुकानें हैं, उज्जैन 53 किमी की दूरी पर है।
यह एक आम संवाद हुआ करता था और मानो इंदौर-उज्जैन इन दो शहरों के बीच की भौगोलिक दूरी बच्चा-बच्चा को जानता था। तब उज्जैन वास्तव में प्राचीन शहरों की तरह लगता था और इंदौर भी उतना चकाचक नहीं था। इंदौर में सराफे के बाद नई-नई 56 दुकानें बनी थीं और वहाँ भी केवल शहर के लोग ही जाते थे। कभी-कभार कोई मेहमान आ गए तो उन्हें ले जाया जाता। बीते दिनों की बात जब भी करते हैं तो तब पर्यटन जैसा कोई मुद्दा नहीं था, रील और वीडियो बनाने का ज़माना नहीं
था। लोग मेहमानों की तरह ही नाते-रिश्तेदारों के यहाँ जाया करते थे, वही छुट्टियाँ बिताने का तरीका होता था। बड़े से बड़े देव और उनके मंदिर भी स्थानीय देवता की तरह अधिक प्रतिष्ठित थे। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भी ऐसा ही था कि किसी
रिश्तेदार के यहाँ गए तो महाकाल के मंदिर भी चले गए। हमारे रिश्तेदार मंदिर के ठीक सामने रहते थे। मंदिर के भीतर प्रवेश करना तब इतना आसान था कि जब भी हम कजिन्स मतलब रिश्ते के भाई-बहनों का मन होता, हम उठकर उछलते-कूदते
सड़क पार कर मंदिर हो आते। तब मंदिर में जाने की एक ही शर्त होती थी कि हम स्नान-ध्यान किए हों। सुबह जल्दी नहा लिए तो मंदिर चले गए, शाम की आरती का समय हुआ तो मंदिर चले गए। ऐसे ही खेलते-खेलते मंदिर पहुँच गए। सावन
सोमवार या महाशिवरात्रि पर भीड़ होती थी। बाबा की पालकी निकलने वाली हो तो उन मेहमान के घर से ही देख ली। तब पास के किसी कस्बों जैसे नलखेड़ा-शाजापुर को जाते या लौटते समय उज्जैन होकर जाना होता तो बड़े-बूढ़े कहते सावन है न
इसलिए इतनी भीड़ है। सिंहस्थ का कुंभ जब लगता तो दूर-दराज़ के मेहमान भी हमारे घर इंदौर आते और मेहमानों की रेलमपेल से पता लगता कि अच्छा कुंभ इतना बड़ा पर्व होता है।
उज्जैन हर बार नए अर्थों में मिलता रहा। जब प्राथमिक विद्यालय में थे तो इंदौर से स्कूल की ट्रीप उज्जैन जाती थी। विद्यार्थियों को विशेषकर सांदीपनी आश्रम और वेधशाला दिखाई जाती। प्राचीन उज्जैन से कर्क रेखा जाती है और हम वहाँ खड़े हैं यह
बोध बड़ा हर्षित करता था। तब स्कूली ट्रिप भी शैक्षणिक भ्रमण हुआ करती थी। सांदीपनी आश्रम तब तक भी यही बोध कराता था कि कृष्ण-सुदामा के समय आश्रम कैसा रहा होगा और कैसे कृष्ण ने अपनी पट्टी (स्लेट) वहाँ के कुंड में धोई होगी।
आश्रम के पास के क्षेत्र को अंकपात के नाम से जाना जाता है, माना जाता है कि यह स्थान भगवान कृष्ण द्वारा अपनी लेखनी को धोने के लिए इस्तेमाल किया गया था। माना जाता है कि एक पत्थर पर पाए गए अंक 1 से 100 तक गुरु सांदीपनि द्वारा उकेरे गए थे। तब यह मानने वाले बात नहीं, विश्वास करने वाली बात लगती थी। वह परिसर भी वृक्षों से घिरा, बड़ी ठंडक और सुकून देने वाला था। तब विद्यालयों में एक विषय सामाजिक अध्ययन होता था जिसमें कहानियाँ होती थीं। विक्रम-बेताल की कहानी, सिंहासन बत्तीसी की कहानी, भर्तृहरि की कहानी और महाकवि कालिदास की कहानी। मेघदूत के
रचयिता की नगरी उज्जैन जाने पर लगता कि हम उसी युग को जी रहे हैं। अभी सामने भर्तृहरि आ जाएँगे और उस गुफा को अपने हाथ से थाम लेंगे, जिसमें बैठ वे समाधि लगाया करते थे।
सिंधिया अपने साथ वहाँ मराठी परिवारों को लेकर आए थे और इंदौर में होलकरों का राज था। हम बच्चे सदियों बाद भी सिंधिया-होलकर की बातों पर विवाद करते थे और सिंधिया ने वो जो महल बनाया था, वो भी शहर से कितनी दूर लगता था।
उज्जैन को बाबा महाकाल की नगरी कहा जाता है और वहाँ कोई और शासन नहीं कर सकता इस मान्यता से यह कोठी शहर से दूर बनाई गई थी। जब मेहमान बनकर किसी के यहाँ गर्मी की छुट्टियों में जाते तो एक दिन सुबह से बाहर घूमने जाने की
योजना बनती। उस दिन फिर चिंतामण गणेश, हरसिद्धि, और कालभैरव जाने की योजना बनती। महाकाल को भांग का और भैरवनाथ को मदिरा का प्रसाद चढ़ता है ये बातें बाल्यकाल में बड़ी रोमांचक लगती थीं। सिंधिया कोठी उस भ्रमण का अंतिम
बिंदु होता था, जहाँ दोपहर तक पहुँचते और फिर घर से लाए भोजन को खाते थे। घर से बिछाने के लिए दरी, खाना खाने के लिए पत्तल-दोने, पानी सब लाया जाता था। वैसे उज्जैन के साँईं पैलेस के दाल-बाफले और रेलवे स्टेशन के आसपास के ढाबों
पर भोजन भी बहुत अच्छा मिलता था लेकिन बाहर से खाने का रिवाज़ तब न के बराबर था। किसी दिन घर-परिवार के किसी पुरुष सदस्य का बहुत ही मन हुआ तो सब वहाँ जाकर सूतते थे। सूतना मालवी का शब्द है और मराठी परिवारों में भी कई
बार हिंदी बोलते हुए इस शब्द का प्रयोग होता रहा है। लौटने पर महाकालेश्वर के प्रसाद के साथ उज्जैन की प्रसिद्ध सेंव, महावर (आलता) और मेहंदी ख़ासकर लाई जाती|
वहाँ के रिश्तेदारों के बच्चे अधिकतर लोकमान्य तिलक हायर सैकेंडरी स्कूल में पढ़ते तब उस स्कूल की शान ही निराली थी, सब उस विद्यालय को ‘लोटी’ कहा करते थे। फ्री गंज तब नया-नया बना था। उस इलाके में जाने पर कुछ-कुछ बड़े शहर में होने
जैसे लगता लेकिन तब भी उज्जैन, कस्बा ही लगता था पर बहुत प्यारा और अच्छा- सा। उज्जैन को लेकर थोड़ा रहस्य दादीजी और फिर कुछ ही महीनों में दादाजी के मृत्यु के बाद जगा क्योंकि वहाँ उनका श्राद्ध किया गया। क्षिप्रा नदी ने पहली बार
थोड़ा शांत बना दिया। पितरों की शांति के लिए सिद्धनाथ घाट और वहाँ रुकने-रहने की सुविधा ने तब और विचलित किया जब पिता की मृत्यु के बाद जाना हुआ। बालपन से किशोरावस्था का वह संधिकाल था लेकिन कालिदास की मल्लिका जैसे आषाढ़ के
किसी दिन डूबने-उतरने लगी थी। उदयन-वासवदत्ता की प्रणय गाथा पीछे छूट रही थी। कालिदास उसी शाखा को काट रहा था, जिस पर बैठा था, वह उसके बचपन की बात थी। बचपन में ही कालिदास ने देवी मंदिर में विद्या व ऐश्वर्य दोनों की प्राप्ति की
खीर भरी दोनों कटोरियों को ग्रहण कर लिया था, काश ऐसा कुछ चमत्कार हो जाए, वैसा लगता था। चमत्कार किस्सों-कहानियों में होते हैं, जीवन में नहीं। यह कठोर सत्य सामने खड़ा था। उसके बाद उज्जैन से अज्ञात डर लगने लगा। आश्वासक से वहाँ कविवर शिवमंगल सिंह सुमन थे और हमारे समय के बड़े कवि चंद्रकांत देवताले भी रहा करते थे। देवताले जी के यहाँ जाने, उनके घर के बगीचे में बैठने पर भूल ही जाते कि उज्जैन आए हैं, लगता था उनके इंदौर के संवाद नगर के घर में ही बैठे हो।
पत्रकारिता का दौर आया तब तक किशोर वय का भय पीछे छूट गया था। कुंभ का मेला उस साल भी लगा था, तब कितने सालों बाद फिर उज्जैन जाना हुआ। अवंतिका, उज्जयिनी जैसे नगरी अब उज्जैन ही लग रही थी। मंदिर से नदी घाट की
दूरी पैदल चलकर जानी थी और वह दूरी सबके साथ होते हुए भी बड़ी दूर लग रही थी। उज्जैन से जुड़ी यादें मन-मस्तिष्क में घूम रही थीं। पाप-पुण्य का गणित चल रहा था और हम एक दिन में साथी पत्रकार लौट आए थे।
अगली बार जाना हुआ तब तक कालों के काल महाकाल का ज्ञान हो गया था। परिपक्वता की उम्र से समय गुजर रहा था। महाकाल की शरण में जाने के लिए पहुँची तो मंदिर में इस बार बैरिकेट्स लग गए थे। अब दर्शन करना इतना आसान
नहीं रहा, समझ आने लगा था। पर तब भी एक ही दिन में चिंतामण गणेश, महाकाल और हरसिद्धि मंदिर के दर्शन हो गए थे। तब वाहन से जाने पर सब कितना पास-पास लग रहा था। बचपन में चिंतामण गणेश से महाकाल तक टेम्पो से
आते थे। तब उज्जैन जाना बहुत सरल लगता था, मन भी बचपन का सरल-सा था। न मंदिर में कोई तामझाम होते थे, न जीवन में। अब उज्जैन-इंदौर सब पर्यटक स्थल अधिक लगने लगे हैं। लौटने पर ऐसा नहीं लगता कि अपने शहर लौटे हैं। इन शहरों
में दूसरे शहरों से आए लोग भी कितने बस गए हैं। अमूमन सारे शहरों में यही हो रहा है कि कोई किसी शहर में उस शहर का नहीं है और हर शहर पराया-सा लगने लगा है। सात प्राचीन शहरों में से एक उज्जैन जाना अब कम होता है। विकास-
समृद्धि और प्रगति किसी का विरोध नहीं, बस वह शहर अब वैसा प्राचीन नहीं लगता जैसा छोड़ आए थे। न उज्जैन, न देवास, न इंदौर कोई शहर परिचित नहीं लगता। हम आगे बढ़ गए, शहर भी आगे बढ़ गए और दूरी भी बढ़ गई शायद। अब
वहाँ जाने पर एलियन की तरह महसूस होता है कि किसी और ही ग्रह पर पहुँच गए हों। पहले इंदौर से किसी भी दिन उठकर उज्जैन चले जाओ, बारिश का मौसम हो तो आते समय साँवेर के पास सिके भुट्टे खा लो…वैसा नहीं रहा, इंदौर भी दूर हुआ
और उज्जैन तो मानो और भी बहुत दूर। कृष्ण के प्रिय सखा सुदामा और उनके बचपन का उज्जैन, कृष्ण के दूसरे प्रिय सखा उद्धव-सा लगने लगा है, जो मन के नहीं, बुद्धि के पास है। राधा की तरह सूरदास के शब्दों में उस उद्धव से यही कहने को मन करता है- ऊधो मन न भए दस-बीस, मानो कृष्ण के जाने के बाद मन भी वहाँ से उनके साथ चला गया है।
