आश्वासन को विश्वास में बदलती फ़िल्म
फ़िल्मों के बारे में कहा जाता है कि वे वहाँ से शुरू होती हैं, जहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ख़त्म हो जाती है। पर इन दिनों बनती फ़िल्मों के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। नेटफ़्लिक्स पर हाल ही में आई ‘नुक्कड़ नाटक’ फ़िल्म न केवल नुक्कड़ नाटकों के करीब है बल्कि वास्तविकता के भी। इसे दावे के साथ इसलिए कह सकती हूँ कि इंदौर कलैक्टरेट द्वारा आयोजित साक्षरता अभियान, सन् 1991 में जत्था कलाकार के रूप में मैंने भागीदारी की थी। तब बस्तियों में नुक्कड़ नाटक किए थे और वहाँ के बच्चों से जुड़ने का अवसर मिला था। उनके लिए कोई कुछ कर रहा है इसकी ख़ुशी उनकी आँखों में समाती नहीं थी। वे अभिव्यक्ति की कला में माहिर नहीं होते। वे ठीक से कह नहीं पाते कि उनके यहाँ उनके लिए किए जाने वाले नाटकों, उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करने से वे कितने ख़ुश होते हैं पर उनके हाव-भाव उनकी ख़ुशी को दिखाते हैं। सबसे पहले ख़ुशी उनकी आँखों में दिखती है, फिर चेहरे पर, फिर वे आपके गले लगना चाहते हैं, आपका हाथ अपने हाथ में लेना चाहते हैं। वे आश्वासन को विश्वास में बदलना चाहते हैं। इस फ़िल्म में छोटी का किरदार निभा रही निर्मला हजारा की आँखों में दिखा भाव सालों पहले की उन अनगिनत आँखों की याद दिला गया, जिनमें शुक्राना साफ़ झलकता था। धनबाद के आईआईटी- आईएसएम के साथ ही वहाँ की मलिन बस्ती बगुला, कुसुमदाहा आदि में भी फिल्म की शूटिंग की गई है। उत्क्रमित मध्य विद्यालय कुसुमदाहा में भी बच्चों पर कई सीन फिल्माए गए हैं। फ़िल्म की वास्तविकता को बरकरार रखने के लिए आर्टिफिशियल सेट न बनाकर वास्तविक लोकेशन पर शूटिंग की गई है। युवाओं की कहानी होने से यह ताज़गी से भरी है। इसमें काम करने वाले भी एकदम नए हैं। दो मुख्य पात्र मौलश्री और शिवांग अपने असली नामों के साथ हैं। अपने ही नामों के साथ किरदार निभाने में वे और अधिक ईमानदार हो गए हैं। मौलश्री का किरदार नेतृत्व के गुणों से भरा है तो शिवांग थोड़ा दब्बू लेकिन मौलश्री का साथ देने वाला और मौलश्री भी उसका साथ देने वाली। इन दोनों में दोस्ती का ही रिश्ता है। लगभग चालीस साल पहले आई फ़िल्म ‘मैंने प्यार किया’ का वह संवाद बहुत प्रसिद्ध हुआ था कि ‘लड़का-लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते’। फ़िल्में कैसे नरेटिव सेट करती हैं। तब सबके दिमाग में घर कर गया था कि लड़का-लड़की यदि बात कर रहे हैं तो ज़रूर वह प्यार ही होगा। अब समाज बदल गया है। आज के युवा आपस में बहुत अच्छे मित्र हैं। उनके बीच उनका लड़का या लड़की होना बाधा नहीं बनता। लड़का लड़की भी महज़ मित्र हो सकते हैं और लड़के या लड़कियाँ आपस में रिश्ते में भी हो सकते हैं। फ़िल्म में एक नाटक का समूह है, जिसका नेतृत्व मौलश्री करती है और वह समूह भी मौलश्री की तरह यथा नाम तथा गुण है, समूह का नाम है अभय। दूसरा अस्तित्व समूह बनता है जो एलजीबीक्यूटी रिश्तों को साफ़ चश्मे से देखने की राह दिखाता है। कहानी बीटेक के कॉलेज कैंपस से शुरू होती है जहाँ देश के सबसे होनहार-बुद्धिमान छात्र पढ़ते हैं। शिवांग की रैगिंग होती है और मौलश्री उसे बचाती है, यहाँ से उन दोनों में दोस्ती होती है। मौलश्री हर उस व्यक्ति की मदद करना चाहती है, जो खुद अपनी मदद नहीं कर सकता। वह होटल में काम कर रहे छोटू की मदद करने के लिए शिवांग को साथ लेकर चोरी करती है। चोरी सामने आने पर उन दोनों को कॉलेज प्रबंधन निलंबित कर देता है। मौलश्री हर वो कोशिश करती है कि उन्हें एक मौका दिया जाए। डूबते को तिनके का सहारा की तरह वह कॉलेज के निदेशक से अंतिम गुहार लगती है। उसके पिछले अच्छे रिकॉर्ड को देखते हुए वे मान जाते हैं लेकिन उसे और शिवांग को झुग्गी बस्ती बगुला में ले जाते हैं कि यदि वे यहाँ के बच्चों का दाखिला स्कूल में करवा देंगे तो उन्हें दूसरा मौका दिया जाएगा। झुग्गी बस्ती के बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलवाने की नई कवायद शुरू होती है। पहले तो उनके माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने के लिए राजी नहीं होते कि डॉक्टर बनने में 17 साल लगने वाले हों, तो ऐसी डॉक्टरी किस काम की? उन्हें तो अपने आज की चिंता है। फिर स्कूल के प्राचार्य उन बच्चों को भर्ती कराना नहीं चाहते। सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति भी यहाँ दिखाई गई है कि जितने होने चाहिए उससे चौगुने बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं और पढ़ाने वाले केवल दो ही लोग हैं, एक प्राचार्य और दूसरे एक और शिक्षक। किसी तरह वे तैयार हो जाते हैं तो उन बच्चों का आधार कार्ड, पहचान पत्र, राशन कार्ड न होने से फिर कागज़ी दिक्कत आती है। वह भी हल हो जाती है, बच्चे स्कूल में पढ़ने लगते हैं। पर माता- पिता फिर भी रोकते हैं। शिवांग के मन में विचार आता है कि बच्चों के माता-पिता को यदि पैसे दिए जाएँ तो वे पढ़ाने भेज सकते हैं। पर पैसा आए कहाँ से। शिवांग के बैंक खाते में पैसे नहीं होते। कॉलेज से निकाले जाने पर घर-परिवार, यार-दोस्तों से भी मदद नहीं मिलती तो वह पोर्न साइट पर अपनी नुमाइश कर पैसा कमाता है। आज के युवाओं के लिए ऐसी साइट से आसानी से बड़ा पैसा कमाना भी कितना आसान हो गया है यह भी फ़िल्म में बिना लाउड हुए दिखाया गया है। क्या सही है, क्या ग़लत इस पचड़े में फ़िल्म नहीं पड़ती। वह जैसा चल सब जगह चल रहा है, उसे वैसा का वैसा रख देती है। शिवांग का गे होना भी इस फ़िल्म में सामान्य तरीके से बताया गया है। शिवांग के मन में जरूर इसे लेकर उथल-पुथल चलती रहती है। तब वह अस्तित्व समूह का हिस्सा बनता है जहाँ कोई उसे सवालिया निगाहों से नहीं देखता क्योंकि वहाँ सब एक ही नाव पर सवार होते हैं। खैर मौलश्री और शिवांग को भी कॉलेज में फिर ले लिया जाता है। मौलश्री को लगता है सब ठीक हो गया। एक दिन वह वैसे ही स्कूल में उन बच्चों से मिलने जाती है तो बच्चे स्कूल में नहीं होते। वह छोटी की खोज में निकलती है तो उसे एक जगह बीड़ी पीते दिखती है। बाल श्रमिकों की समस्या, बाल मजदूरी के मुद्दे भी यहाँ सामने आते हैं। वह उसे अपने तरीके से पढ़ाने की कोशिश करती है और एक दिन छोटी की माँ को पता चल जाता है तो वह किताबें जला देती है। तंग बस्तियों में रहने वाले बच्चों को कैसे पढ़ाई का माहौल नहीं मिलता और उन्हें पहला अक्षर तक सीखने के लिए कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है यह फ़िल्म दिखाती है। मौलश्री उन बच्चों को पढ़ाने का लक्ष्य तय कर लेती है और शिवांग अपनी पढ़ाई में जुट जाता है। शिवांग जब इस कॉलेज में पढ़ने आता है तब उसका सपना होता है कि वह पढ़- लिखकर अच्छा कमाने यूएस चला जाएगा, पिता के कारोबार में उनकी शरण में काम नहीं करेगा। मौलश्री को भी अच्छा पढ़कर कमाना और अपने प्रियकर के साथ शहर में रहना होता है। कॉलेज के अंतिम दिन वे दोनों तय करते हैं कि वे अपने लक्ष्य को हासिल करने से पहले अपने सत्य को समझेंगे। मौलश्री गरीब बस्ती में स्कूल खोलती है और शिवांग अपने घर जाकर अपने परिवार को गे होने के सत्य को बताने का निर्णय लेता है। दोनों एक मोड़ तक साथ आकर शांति से विदा लेते हैं। फ़िल्म का अंत मौन है, जो देखने वालों को भी बहुत सुकून और एक तरह की तसल्ली दे जाता है।
बॉक्स
निर्देशक : तन्मय शेखर
निर्माता : राम प्रवेश कुमार
कलाकार : मौलश्री सिंह, शिवांग राजपाल, निर्मला हजारा, बिपिन कुमार
स्वरांगी साने
