हिंदी के दर्शक कहाँ हैं? (समीक्षा)

पद्मश्री शेखर सेन का नाम आते ही वह व्यक्तित्व आँखों के सामने आ जाता है जिसने सुर-तुलसी-कबीर-विवेकानंद की एकल प्रस्तुतियाँ दी हैं। एक मुलाकात में सेन ने कहा था कि वे कलाकार हैं और खुद को माँजते रहते हैं। रविवार को गोस्वामी तुलसीदास पर आधारित हुई ‘तुलसी’ की 176वीं प्रस्तुति को उसी परिष्कार की तरह देख सकते हैं। पुणे के महाराष्ट्र एजुकेशन सोसाइटी के एमईएस सभागार कोथरूड में दर्शकों की न्यून उपस्थिति निराश करने वाली थी लेकिन कलाकार का अभिनय उससे ठीक विपरीत था। वे अपनी चिर-परिचित शैली में थे। आपसी बातचीत में उन्होंने सहज बताया कि वे बीमार चल रहे थे लेकिन ‘शो मस्ट गो ऑन’ को बीमारी रोक नहीं सकती थी तो दर्शकों की कमी क्या रोक पाती।
अपने होम प्रोडक्शन ‘संस्कृति सौरभ’ के बैनर तले की इस प्रस्तुति में वे गा रहे थे, अभिनय कर रहे थे। इसका लेखन-निर्देशन और संगीत संयोजन भी उनका ही था। उनका कितना कठिन परिश्रम और घंटों रियाज़ रहा होगा कि दो घंटे की पूरी प्रस्तुति उन्हें कंठस्थ थी। तुलसीदास का पूरा जीवन चरित्र उनके मुखाग्र था। वे जिस शैली में प्रस्तुत कर रहे थे उससे कहीं भी आत्मकथा की उकताहट नहीं हो रही थी। वे रो रहे थे, तुलसीदास के मित्र बजरंग बली से बातें कर रहे थे, बीच-बीच में मंच से वे किसी अदृश्य मनसुखा को आवाज़ दे रहे थे। मनसुखा ही क्यों, उनकी इस प्रस्तुति में कितने ही पात्र आए थे, सूर, रहीम और कबीर, राजा टोडरमल भी अपरोक्ष रूप से हाजिर थे। कहा तो यह भी जाता है कि सूरदास से एक बार मथुरा में तुलसीदास की भेंट हुई थी और दोनों में मैत्री-भाव हो गया था। सूर से प्रभावित होकर ही तुलसीदास में ‘श्रीकृष्ण–गीतावली’ की रचना की थी। मंच पर अनदेखे काशी के पंडित थे, चित्रकूट के संत थे, अनाथ तुलसी को रामबोला नाम देने वाली पार्वती अम्मा थीं। जाने कितने किरदारों को वे अपनी एकल प्रस्तुति में सामने रख रहे थे। शास्त्रीय और लोक गायिकी की समझ भी उनके अभिनय का हिस्सा थी। तुलसी के जन्म से लेकर देवलोक गमन तक का वर्णन तुलसी रचित दोहों के साथ आगे बढ़ रहा था। वे किस्सा इस तरह बता रहे थे कि गोया तुलसीदास एक दिन के लिए पृथ्वी पर वापिस आ गए हों। निर्धन अनाथ की लगभग पाँच सौ साल पुरानी कहानी को दो घंटे में समाने का यह प्रयास था।
सबसे पहले आया अयोध्या कांड, जिसमें आया प्रचलित पद ठुमक चलत रामचंद्र… फिर आया उनकी पत्नी रत्नावली का वह प्रसिद्ध किस्सा जिसमें रत्नावली उनसे कहती है कि जितना प्रेम इस हाड़-मांस के शरीर के लिए है, उतना प्रेम राम के लिए हो तो मैं भी अपने आपको गौरवशाली महसूस करूँगी। तुलसीदास के जीवन का यही तो टर्निंग पॉइंट था। फिर रामचरित मानस, राम शलाका, हनुमान चालीसा का रचना-प्रसंग…घटनाओं के सिरे जुड़ते चले गए। रामलीला का प्रारंभ, बजरंग अखाड़ों की शुरुआत इतिहास की घटनाएँ भी काव्यात्मक शैली में आती गईं। इस दौरान उन्होंने 52 गीतों की बानगी दी। रामायण का अवधी संस्करण तुलसीदास ने लिखा और शेखर सेन के मुख से भी भाखा, गरियाना जैसे शब्दों को सुनना ठेठ देसीपन की छाप छोड़ गया। वैसे हिंदी नाटकों को दर्शक नहीं मिलते कहकर गरियाने वाले नाटक देखने क्यों नहीं आते? हिंदी का रोना रोने वालों को हिंदी के आयोजनों को करना-कराना चाहिए, किताबें खरीदकर पढ़ना चाहिए, टिकट लेकर नाटक देखने आना चाहिए। या आपका चुनाव है मराठी-बंगाली की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का हवाला देते रहिए, खुद कोई मिसाल कायम न कीजिए। यह नाटक भी बंगाली बाबू ने हिंदी की भक्ति परंपरा के श्रेष्ठ कवि तुलसीदास को लेकर खेला और देखने वालों में भी मराठी-बंगाली समुदाय के दर्शकों की संख्या अधिक थी, तो हिंदी के दर्शक कहाँ हैं? अब उन्हें भी हिंदी नाटक देखने और हिंदी नाट्य परंपरा को समृद्ध करने रंगमंच तक आना ही होगा।
– स्वरांगी साने
