सात और आठ ( कविता ) : डॉ. अशोक बत्रा
एक दिन झूमते हुए
सात और आठ
पहुँच गए
गणितज्ञ आर्यभट्ट के पास!
खुशी से किलक कर पूछा आर्यभट्ट ने
कहो प्यारे सात और आठ!
कैसे हैं तुम्हारे ठाठ!
सात बोला —
सात-सात फेरों की कसम!
मेरे बिना किसी की दाल नहीं गलती!
और भैया अष्टावक्र के बिना
मेरी भी नहीं चलती!
हम मिलके चलते हैं
इसलिए सात आठ नहीं
15 बनते हैं
और जब मिलकर जोर लगाते हैं
तो सात अठे छप्पन बन जाते हैं
56 इंची कहलाते हैं!
आर्यभट्ट मुस्कराए!
बोले —
हाँ, जमा और गुणा में ही रहना
कभी विभाजित
या घटा मत होना
वरना पिद्दी से एक
या शून्य रह जाओगे!
और अगर
कुछ भी न करो प्रयास
केवल मिलकर रहो आसपास
तो 15 या 56 नहीं
सत्तासी हो जाओगे
जमा गुणा की मेहनत से भी
आगे निकल जाओगे।
मित्र कालिदास कहते हैं —
जो मज़ा
बिना शिकायत
आसपास रहने में है
उसकी झोपड़ी को
अपना कहने में है
गम आ जाए
तो चुपचाप सहने में है
वह मिलकर
उद्योग चलाने में भी नहीं!
मेरा गणित भी यही कहता है
जो बरकत साथ साथ रहने में है
वह सब जुगाड़ लगाने में भी नहीं!
