दिन विशेष विमर्श में अलका सिन्हा की कहानी : ‘हरदम साथ डॉट कॉम’
अलका सिन्हा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त प्रतिष्ठित कथाकार, कवयित्री और साहित्यकार हैं। भागलपुर, बिहार में जन्मीं अलका सिन्हा एम.ए., एम.बी.ए. हैं और एयर इंडिया से सेवानिवृत्त हुईं। जी-मेल एक्सप्रेस सहित उनके अनेक उपन्यास, कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। आकाशवाणी की नेशनल कमेंटेटर और दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम पत्रिका की प्रस्तोता रहीं अलका सिन्हा को वातायन, इलासा अंतरराष्ट्रीय सम्मान, हिंदी अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। आज के व्यस्त और बदलते परिवेश में तकनीक के माध्यम से अतीत को जीवंत कर, उसमें जीने की ललक कैसे व्यक्ति को वर्तमान से दूर कर सकती है और अपनों के बीच अकेला कर सकती है, कहानी बख़ूबी इस बिंदु तक पाठक को ले जाने की कोशिश करती है । आज जो लोग भौतिक संग-साथ की अपेक्षा आभासी दुनिया को प्राथमिकता दे रहे हैं, उनको यह कहानी सोचने पर विवश करती है।

हरदम साथ डॉट कॉम
कितनी हैरानी की बात थी कि डैडी जी के गुजर जाने के बाद भी वैभव में कुछ खास फर्क दिखाई नहीं देता था। वह थोड़ा गुमसुम जरूर रहने लगा था, मगर उसमें कोई छटपटाहट या अभाव की पीड़ा वह नहीं देख रही थी। नहीं, ऐसा नहीं था कि शैली उसके तड़पने की राह देख रही थी, मगर वह यही समझती रही थी कि वैभव की जिन्दगी में शैली और डैडी जी के सिवा कोई था ही नहीं, इसलिए डैडी जी का चले जाना उसे किस कदर खोखला कर जाएगा, इसकी आशंका से ही वह सिहर जाया करती थी।शैली कितनी दुविधा में थी उस रोज कि वह किस तरह वैभव को फोन करके बताए कि डैडी जी अंतिम वक्त में उसे पुकार रहे हैं।मगर शैली ने पाया कि वैभव इन सभी स्थितियों को बहुत सरलता से झेल गया। ऐसा कैसे हो सकता था कि जिस पिता ने उसे बचपन से मां का भी प्यार दिया, बड़े होने पर दोस्त बना, राजदार बना, जिसने उसकी प्रेमिका को सहर्ष अपने घर में कुलवधू का स्थान दिया…आज उसके न रहने पर वैभव तनिक भी विचलित नहीं। क्या वह तटस्थ हो गया है? पहले-पहल तो शैली ने यही समझा कि सदमा इतना गहरा है कि वह अत्यधिक संयत हो बैठा है। उसे लगता था कि कुछ समय बाद वह फूट-फूटकर रोएगा और स्वीकार कर लेगा कि उसके डैड अब इस दुनिया में नहीं रहे। शैली की समझ में ऐसा विस्फोट जरूरी था।वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे या वह स्वयं भी खुद को किसी तरह के भ्रम में रखे। वह उसे समझाना चाहती थी कि जिन्दगी ऐसे ही चलती है, वृक्ष पर फूल खिलते हैं, फल बनते हैं, फिर पक कर टूट जाते हैं, फिर नए फूल आते हैं…यही चक्र चलता रहता है…मगर वैभव ने यह सब कहने का कोई अवसर ही नहीं दिया। उल्टे वह बेहद संतुलित था। वह अपने सभी काम नियम से कर रहा था, उसने फैक्टरी का काम बखूबी संभाल लिया था, वह पहले की बनिस्पत अधिक समझदार दिखाई दे रहा था। हां, अब वह पहले की तरह बात-बात में हंसता नहीं था। बोलता कम, सोचता अधिक, मन ही मन बातें करता जैसे उसने एकअलग ही दुनिया रच ली हो और वह धीरे-धीरे उसमें समाता जा रहा हो। अब उसे किसी की जरूरत नहीं थी, शैली की भी नहीं।शैली को लगता जैसे वैभव को शैली की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वैभव में आए इस परिवर्तन से शैली जरूर खुद को बहुत अकेला और उपेक्षित महसूस करने लगी थी।
डैडी जी के गुजरने के कोई एक महीना बाद शैली बीमार पड़ गई थी| वैभव ने डॉक्टर बुलवा दिया,घर से ही उसके ब्लड टेस्ट के सैम्पल वगैरह भिजवाने की व्यवस्था करा दी| उसने अपनी फैक्ट्री से किसी महिला को घर पर उसकी सेवा-टहल के लिए भेज दिया| काम तो सभी व्यवस्थित थे, मगर शैली खुद को आहत महसूस करती रही| वैभव ने न तो छुट्टी की, न ही फोन पर उससे कोई बात की अपनी स्टाफ से ही शैली का हालचाल पता कर फोन रख दिया|
“मुझे लगा खराब तबियत की वजह से तुम्हारा मूड आज ठीक नहीं होगा , इसलिए बात नहीं की|” शैली की शिकायत पर उसका जवाब था।
“तुम कबसे मूड ठीक होने का इंतजार करने लगे…?” शैली तड़प उठी।
“मुझे लगा, कहीं मेरी किसी बात से तुम नाराज हो गई तो कैसे मनाऊंगा।”
“तो तुमने सोचा कि इसे इसी के हाल पर छोड़ दूं, कुछ समय बाद खुद-ब-खुद अक्ल ठिकाने आ जाएगी?”
“अच्छा बाबा, कल से तुम्हीं से बात करूँगा|” वैभव ने हाथ जोड़ दिए।
अगले रोज वैभव का फोन आया था, “अब तो खुश, तुम से ही बात कर रहा हूँ…कैसी तबियत है?”
“मुझे खुश करने के लिए पूछ रहे हो, वरना तुम्हारे भीतर तो कोई बेचैनी नहीं?” शैली का मन और उदास हो गया|
“देखा, हो गई ना नाराज! मैं इसीलिए डरता हूँ तुमसे बात करने में।”
शैली समझ नहीं पा रही थी कि वैभव को क्या हो गया है, वह उसके लिए इतना अजनबी कैसे हो गया।पहले तो वह बिना पूछे उसके मन की बात जान लिया करता था, उसे पता होता था कि शैली को कैसे मनाया जा सकता है। मगर अब उसे क्या हो गया कि वह उसे समझ नहीं पाता, मना नहीं पाता। वह जब भी उसका साथ चाहती, वह उसके लिए सुविधाएं जुटा देता। उसे याद है, कि कॉलेज के दिनों में, किसी रोज अगर शैली थोड़ी गुमसुम होती तो वह उसे हंसाने के लिए कैसे-कैसे करतब करता, “अच्छा चलो, आज मैं तुम्हारा गाना भी झेल लूंगा, मगर यह मौन व्रत तोड़ो भी|” एक रोज उसने कहा तो, शैली ने गुस्से से उसके सिर पर हाथ पटका।
“मेरा सिर हाजिर है, इसे तबला बनाइए हुजूर।”
अब वह वक्त दोबारा नहीं आ सकता, वह सोचती। अपने ख्यालों में उन्हीं दिनों को दोहराती रहती और जीसस से प्रे करती कि उसे वही वैभव वापस मिल जाए जो उस पर जान छिड़कता था, उसे चिढ़ाता था, मनाता था, प्यार करता था।
लगभग आधी रात बीत चुकी थी। मगर वैभव अभी भी कंप्यूटर पर काम कर रहा था। शैली चुपचाप पीछे आकर खड़ी हो गई।अरे, यह क्या, कंप्यूटर पर किसी खूबसूरत लड़की की तस्वीर थी और वैभव उससे ‘चैट’ करने में मगन था। शैली हैरान थी, उसने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है, वह लड़खड़ाकर गिर पड़ती कि उसने वैभव की कुर्सी थाम ली। वैभव ने चौंककर देखा, ”अरे शैली, तुम सोई नहीं अब तक?”
”सो ही तो रही थी अब तक,” शैली कहना चाहती थी, मगर कह नहीं पाई। ”कौन है यह?” बड़ी मुश्किल से बस इतना पूछ पाई।
”ये?” वैभव हंसने लगा, ”पहचानने की कोशिश करो।” शैली हैरान थी कि वैभव कैसा निर्लज्ज हो चला था, रोमांटिक सवालों-जवाबों के साथ लगे चित्र को पहचानने के लिए कहते हुए उसे जरा भी हिचक नहीं थी।
”अरे, इतना परेशान होने की बात नहीं है शैली, ध्यान से देखो ये तुम हो।” वैभव ने चित्र का ‘क्लोज-अप’ बनाया। पूरे स्क्रीन पर अब सिर्फ एक चेहरा था फूल-सी ताजगी लिए, किसी एंग्लोइंडियन का चेहरा…कुछ उसकी तरह का, मगर यह ‘वह’ नहीं थी। शैली बुरी तरह कन्फ्यूज हो गई थी।
वैभव ने ‘बैक’ का कमांड दिया और चक्र पीछे को घूमने लगा।”देखो, ये तुम्हारी कॉलेज की तस्वीर है, मैंने फोटो शॉप में जाकर उसमें थोड़े से चेंजेज किए हैं, जैसे तुम्हारे बालों को कटपेस्ट के जरिए कर्ल किया और थोड़ा रेड टिंच दिया, आई बॉल्स का रंग ब्लू कर दिया, कंप्लेक्शन थोड़ा और फेयर…और स्किनटोन को क्लीयर कर दिया…देखो,” और उसने फोटो शॉप में जाकर उसकी ओरिजनल तस्वीर दिखाई।
”मगर तुम जिससे बातें कर रहे थे वो कौन थी?” शैली कुछ समझ नहीं पा रही थी!
”वह भी तुम्हीं थी। मैंने एक साइट बनाई है, देखना चाहोगी?” वह बताने लगा कि किस तरह वह डैड के गुजरने से पहले ही उनकी कमी को महसूस करने लगा था। वह उनका जाना बर्दाश्त नहीं कर सकता था और इसलिए कितनी मेहनत से उसने यह साइट तैयार की थी – हरदम साथ डॉट कॉम।
”इस पर जाकर तुम अपने किसी भी प्रिय से लिंक कर सकती हो, वह जीवित भी है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये देखो…,”वैभव ने साइट बंदकर वापस खोली और साथ-साथ बताता भी रहा कि किस तरह एक विस्तृत प्रश्नावली के जरिए किसी भी व्यक्ति की प्रोफाइल तैयार की जा सकती है, जैसे उसने शैली की भी तैयार की है, वह किस तरह नाराज होती है, वह किस बात पर खुश होती है या डैडी जी किस तरह अलग-अलग बातों पर अपनी प्रतिक्रिया दिया करते थे, इन सब के आधार पर उस किरदार का स्केच तैयार होता है।
”अब एक पूरी पर्सनैल्टी तैयार हो गई। उसका फोटो भी लगा दो और जब जी करे उससे बातें करो, वह तुम्हारे हर सवाल का उसी व्यक्तित्व की तरह जवाब देगा। बहुत मनोवैज्ञानिक ढंग से इन प्रश्नों को तैयार किया है मैंने, जिनके आधार पर किसी भी व्यक्तित्व का विकास होता है। आई डोंट वांट दिस रोती हुई शैली, सो आई हैव स्टॉप्ड हर ग्रो लाइक दैट” वैभव ने शैली के चेहरे को प्यार से थपथपाते हुए कहा, ”यह कॉलेज के जमाने की शैली है, हरबात पर हंसती, इतराती…याद है तुम कितनी बिंदास हुआ करती थी।”
वैभव के कम्प्यूटर पर…कॉलेज के समय की शैली, इतराती हुई खड़ी है, उसका चमकता हुआ चेहरा, घुंघराले बाल, नीली आंखें खुद उसे ही मात दे रही हैं। वैभव आज भी शैली को उसी तरह प्यार करता है, हंसता है, बोलता-बतियाता है, लेकिन कॉलेजवाली शैली को| शैली हैरान थी कि जिस तरह वह कॉलेज के दिनों को लौटा लाने के लिए प्रे कर रही है, वैभव भी उसी तरह कॉलेज वाली शैली को तलाश रहा है, जिस तरह वह ख्यालों में कॉलेज के दिनों को दोहराती रहती है उसी तरह वैभव भी अपनी कम्प्यूटरीकृत दुनिया में उन्हीं दिनों को जी रहा है…मगर जिस तरह वह साथ होते हुए भी शैली से दूर है, उसी तरह वैभव के साथ जो शैली है वह हकीकत नहीं है| आज की शैली के चेहरे पर खिंच आई लाफिंग लाइन्स और व्यक्तित्व का ठहराव उसे ओल्ड और आउट डेटेड बना रहा है। वैभव की निगाहों में इस शख्स के लिए कोई जगह नहीं है। उसने शैली के खूबसूरत अतीत को हमेशा के लिए जीवंत कर लिया है। वह वैभव के कंप्यूटरीकृत आकाश में लहरा रही है, इतरा रही है, सभी चिंताओें से दूर चहक रही है।
शैली महसूस कर रही है कि वैभव की दुनिया में अब कोई बीमार या बूढ़ा नहीं होगा, सदा युवा रहेगा, उदास या दुखी नहीं होगा, हरदम हंसता रहेगा, हरदम साथ रहेगा…।
जबकि हकीकत की दुनिया में दोनों का आज एक-दूसरे के लिए डैडी जी की तरह ही दिवंगत हो चुका है…उतारे हुए कपड़ों कीतरह वहां कुर्सी पर उसका शरीर पड़ा है, दिन-ब-दिन ढलता…बूढ़ा होता…
