वियतनाम साहित्य अधिवेशन की सफलता पर सजा वैश्विक काव्य उत्सव

सोमवार, 29 जून, 2026 “प्रज्ञान विश्वम्'( बहुराष्ट्रीय एवं बहुभाषिक पत्रिका) एवं वैश्विक ख्याति प्राप्त संस्था “अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति (एबीएस 4)” के संयुक्त तत्वावधान में वियतनाम साहित्य अधिवेशन की भव्य सफलता के अवसर पर संस्था के सदस्यों द्वारा एक भव्य काव्य उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वैज्ञानिक संचेतना के प्रखर कवि एवं पत्रकार , प्रज्ञान विश्वम पत्रिका के प्रधान संपादक पंडित सुरेश नीरव जी ने की। वही कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन एवं संयोजन जर्मनी की सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार,संपादक, मीडिया प्रोफेशनल प्रज्ञान विश्वम् पत्रिका की संपादक डॉ. शिप्रा शिल्पी ने किया। कार्यक्रम के संदर्भ में डॉ. शिप्रा एवं सभी सम्मानित अतिथियों की प्रशंसा करते हुए अध्यक्ष पंडित सुरेश नीरव ने कहा : टुडेज़ प्रोग्राम वज़ अ फिनॉमिनल सक्सेस। इट वज़ ट्रूली स्टार-स्टडेड, फीचरिंग सुपर्ब कॉन्टेंट ऐंड अमेज़िंग परफॉर्मेंसेज़ फ्रॉम एवरीवन। अ स्पेशल मेंशन गोज़ टू डॉक्टर शिप्रा शिल्पी फॉर हर एक्सेप्शनल एंकरिंग। माई हाईएस्ट रिगार्ड्स ऐंड सल्यूट टू ऑल द पार्टिसिपेंट्स। इस अवसर पर देश विदेश के ख्याति प्राप्त कवि एवं साहित्यकार कुवैत से संगीता चौबे पंखुड़ी ने अपने गीत
“नेह का मंत्र लिख श्वाँस के दीप पर,
वर्तिका सम हृदय को पुरोहित करें”
से ऐसा समां बांधा कि दर्शक झूम उठे।
आस्ट्रेलिया से डॉ. भावना कुंअर जी ने अपनी मधुर आवाज में अपनी ग़ज़ल :
“मेरी जब भी उनसे मुलाक़ात होगी,
नई ज़िंदगी की शुरूआत होगी।
इशारे पे उनके लुटा देंगे जाँ हम,
तो जन्नत से फूलों की बरसात होगी।
पेश करके दर्शकों का मन मोह लिया।
वही प्रगीत कुंअर जी ने अपनी ग़ज़ल:
आँखों में अपनी नींद को कोना भी चाहिए ,
उसमें सजाई ख़्वाब की दुनिया भी चाहिए ।
दोनों सिरों से पाएँगे पनपेंगे तब ही वो,
रिश्तों में थोड़ी प्यार की भाषा भी चाहिए ।
से खूब वाह वाही लूटी।
लन्दन के प्रतिष्ठित गजलकार आशुतोष कुमार जी ने अपनी ग़ज़ल :
ये तरक़्क़ी का नशा क़हर हुआ जाता है।
दिन-ब-दिन गाँव मेरा शहर हुआ जाता है ।
के हर शेर पर भूरि भूरि प्रशंसा पाई।
वही अमेरिका से वरिष्ठ साहित्यकार अन्नदा पाटनी जी ने अपनी कविता :
यह धरा है गर्वित,गर्वित है भारत जननी,
माँ शारदे भी हैं गर्वित, पाकर ऐसा मेधावी लाल,
गर्वित हैं हर्षित हैं हम सब भी सान्निध्य पा हुए निहाल।
सुनाकर पंडित सुरेश नीरव जी को एवं पटल पर उपस्थित सभी को मन भर स्नेह एवं आशीष दिया।
बैंगलोर के सुप्रसिद्ध गीत शिल्पी ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी ने अपनी मधुरिम वाणी में अपने मुक्तक:
स्वप्न में भी कोई ग़म दिखे न कभी, शौर्य का ये पताका झुके न कभी।
जब तलक व्योम में चांद-तारे रहें, सिलसिला जन्मदिन का रूके न कभी।
सुनाकर जहां एक ओर दर्शकों को सम्मोहित किया वही गागर में सागर भरते हुए उन्होंने वियतनाम महोत्सव की स्वर्णिम स्मृतियों को अपने संस्मरण के माध्यम से सभी के समक्ष साझा भी किया।
सोने पर सुहागा रहा पंडित सुरेश नीरव जी द्वारा प्रस्तुत ग़ज़ल
जब भी दिल से तुझे याद करता हूँ मैं,
खुशबुओं के नगर से गुजरता हूँ मैं।
नर्म एहसास का खुशनुमा अक़्स बन
लफ्ज़ के आईने में संवरता हूं मै।
सुनाकर दर्शकों को मोह लिया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. शिप्रा शिल्पी ने अपने मधुर स्वर में जीवन की आस जगाते अपने स्वरचित गीत:
आना जाना सच है माना , फिर भी चलते जाना है।
जीवन है एक कठिन पहेली,बस इसको समझाना है।
को सुनाकर सबकी आँखों को नम कर दिया।
कार्यक्रम में वियतनाम अधिवेशन, हो ची मिन्ह सम्मान एवं जन्मोत्सव की झलकियों,को वीडियो के माध्यम से दिखाया गया जिसे देश विदेश से जुड़े सैकड़ों दर्शकों ने खूब सराहा। इस कार्यक्रम को भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कतर, कुवैत, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, सिंगापुर, मस्कट, नार्वे आदि देशों के दर्शकों ने कमेंट्स एवं लाइक्स के माध्यम से भरपूर सराहा।
रिपोर्ट:— डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना
