“आधुनिकता का संत्रास और संबंधों का साधनीकरण” (आलेख) : मनोज श्रीवास्तव
सन् १९८० में जब सुभाष घई की फ़िल्म ‘क़र्ज़’ भारतीय सिनेमाघरों में आई, तो दर्शकों ने उसे एक रोमांचक पुनर्जन्म-कथा के रूप में स्वीकार किया। फ़िल्म की कहानी सरल थी — एक स्त्री अपने पति को उसकी सम्पत्ति के लिए मार देती है, और वह पति एक नए शरीर में जन्म लेकर अपनी हत्या का प्रतिशोध लेता है। ऋषि कपूर का अभिनय, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत, और ‘ओम शान्ति ओम’ जैसे गीत — सब मिलकर इसे एक स्वर्णिम मनोरंजन में बदल देते थे। किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह कहानी केवल पर्दे तक सीमित नहीं रहेगी।

परन्तु इतिहास की विडम्बना यह है कि वह कभी-कभी कल्पना की नकल उतार देता है — और तब जो दृश्य उभरता है, वह न केवल मर्मभेदी होता है, अपितु किसी गहरी सामाजिक व्याधि का लक्षण भी बन जाता है। मेघालय के सोहरा की उन पहाड़ियों में, जहाँ वेई सॉडॉन्ग जलप्रपात अपनी निर्मल धाराओं से पत्थरों को सींचता है, राजा रघुवंशी की हत्या हुई — अपनी नवविवाहित पत्नी सोनम और उसके प्रेमी राज कुशवाहा के षड्यंत्र से। इन्दौर का वह युवक, जो विवाह के कुछ दिनों बाद ही अपने जीवन के सबसे सुंदर अध्याय के आरम्भ में था, खाई में फेंक दिया गया।

और उसके ठीक एक वर्ष बाद, पुणे के पास लोहागढ़ दुर्ग में केतन अग्रवाल — जो केतन चौधरी के नाम से सम्पन्न परिवार का युवा पुत्र था — अपनी मंगेतर सिया गोयल और उसके प्रेमी चेतन चौधरी के हाथों चार सौ फुट की खाई में धकेल दिया गया। उदयपुर में सत्रह करोड़ का महल बुक था, निजी विमान आने वाले थे — और नवम्बर की शादी के स्वप्न देखने वाले केतन का शव तीन घंटे की खोज के बाद मिला।
‘क़र्ज़’ ने जिसे अपराध-कथा या पुनर्जन्म-कथा कहा — वह वास्तव में आधुनिकता का एक संत्रास है : एक ऐसा संत्रास जिसमें विवाह नामक संस्था अपना आत्मिक स्वरूप खोकर केवल एक आर्थिक अनुबंध बन जाती है, जिसमें प्रेम नहीं, केवल गणना होती है, और जिसमें उस गणना में बाधक व्यक्ति को मिटा देना एक तार्किक समाधान के रूप में स्वीकार किया जाता है।
क़र्ज़’ का आधार लेखक कामिन्स कार्टर की अंग्रेज़ी उपन्यास ‘द रीइन्कार्नेशन ऑफ पीटर प्राउड’ (१९७३) से लिया गया था, जिसे १९७५ में हॉलीवुड में भी फ़िल्माया गया था। परन्तु सुभाष घई ने उसे जो भारतीय परिधान पहनाया, वह केवल कथानक का रूपांतरण नहीं था — वह एक सांस्कृतिक रूपक था।
फ़िल्म में राज किरन को उसकी पत्नी कामिनी (सिमी गरेवाल) मार देती है — सम्पत्ति की लालसा से। रवि वर्मा पुनर्जन्म लेता है और मोंटी (ऋषि कपूर) बनता है। वह संगीत के माध्यम से अपने पूर्वजन्म की स्मृतियों को पहचानता है और अन्ततः सत्य को उजागर करता है। फ़िल्म का संदेश स्पष्ट था : सत्य का दमन असम्भव है, न्याय अंततः मिलता है, और आत्मा अजर-अमर है।
परन्तु वास्तविक जीवन में? राजा रघुवंशी के परिवार ने भी उसी ‘क़र्ज़’ की भाषा में अपनी संवेदना व्यक्त की। जब राजा की एकादशी को मृत्यु हुई और ठीक उसी एकादशी को उसके बड़े भाई सचिन के घर एक शिशु का जन्म हुआ, तो परिवार ने कहा : ‘राजा वापस आ गया।’ घर पर ‘राजा इज बैक ‘ का बैनर लगाया गया। यह केवल सांत्वना की भाषा नहीं थी — यह उस पुरातन आस्था का आर्त्तनाद था जो आधुनिकता के क्रूर आघात के समक्ष पुनर्जन्म के स्वप्न में आश्रय ढूँढ रही थी।
‘क़र्ज़’ की रवि वर्मा-कामिनी जोड़ी और राजा-सोनम की जोड़ी में एक गहरी समानता है : दोनों में स्त्री की क्रूरता है, दोनों में सम्पत्ति या स्वार्थ का तर्क है, और दोनों में पीड़ित पुरुष की असहायता है। परन्तु एक महत्त्वपूर्ण अंतर भी है : फ़िल्म में पुनर्जन्म सम्भव था, न्याय सम्भव था। वास्तविक जीवन में? राजा रघुवंशी का न्याय अभी भी न्यायालयों में लम्बित है।
जापान में भी यही कहानी दुहराई गई — एक भिन्न परिधान में। कोसुके नोज़ाकी — एक ७७ वर्षीय धनकुबेर जिसने अपनी आत्मकथा में स्वयं को ‘किशू का डॉन जुआन’ कहा और दावा किया कि उसने ४,००० स्त्रियों पर ३ अरब येन खर्च किए — ने फरवरी २०१८ में साकी सुडो नामक २२ वर्षीय युवती से विवाह किया। साकी ने न्यायालय में स्वयं स्वीकार किया : ‘मैंने धन के लिए विवाह किया था।’
मई २०१८ में, विवाह के केवल कुछ महीनों बाद, नोज़ाकी अपने घर में मृत पाए गए — उत्तेजक नशीले पदार्थों की अति मात्रा से। साकी अकेली उपस्थित थी। उसके फोन में ‘वृद्धों की मृत्यु’ और ‘परफेक्ट क्राइम’ जैसे शब्द खोजे गए थे। नोज़ाकी के अंतिम संस्कार में एक उपस्थित व्यक्ति ने साकी से कहा : ‘पति की मृत्यु बड़ा कष्ट है।’ साकी का उत्तर था : ‘नहीं, कोई कष्ट नहीं।’
दिसम्बर २०२४ में जापान के न्यायालय ने साकी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया — क्योंकि भौतिक साक्ष्य अपर्याप्त थे। परन्तु यह घटना जापान की ‘शुगर बेबी ‘ संस्कृति और विवाह में स्नेह के ह्रास की एक चिन्ताजनक झलक है। पर इसमें तो वह बुढ्ढा स्वयं बराबर का दोषी था।
ऑस्ट्रेलिया में मार्च २००५ में एक एम्बुलेंस चालक डेज़ कैम्पबेल की पत्नी जैनेट ‘गिरकर’ मर गई रॉयल नेशनल पार्क की चट्टानों से। जैनेट धनवान थी, उसने अपनी वसीयत डेज़ के नाम की थी और उनके घर पर दोनों का नाम था। जाँच में पाया गया कि डेज़ पत्नी से नहीं, उसकी सम्पत्ति से प्रेम करता था। यहाँ लिंग उलटा है — पति ने पत्नी को मारा — परन्तु षड्यंत्र की संरचना वही है : विवाह एक साधन, हत्या एक समाधान।
१९८९ में बोस्टन में चार्ल्स स्टुअर्ट ने अपनी सात महीने की गर्भवती पत्नी कैरल को गोली मारी — और पुलिस को बताया कि एक अश्वेत व्यक्ति ने हमला किया। कैरल की मृत्यु हो गई, उसका शिशु सत्रह दिन बाद। चार्ल्स का उद्देश्य था बीमा की राशि पाना और नई प्रेमिका के साथ जीवन जीना। सत्य उजागर होने पर चार्ल्स ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने न केवल एक हत्या को उजागर किया, बल्कि नस्लीय पूर्वाग्रह के शोषण को भी — क्योंकि चार्ल्स के झूठे बयान पर अनेक निर्दोष अश्वेत नागरिकों को गिरफ्तार किया गया था।
“व्हाइ डू दे किल“?’ के लेखक डेविड एडम्स का अनुमान है कि अमेरिका में लगभग बीस प्रतिशत पति-पत्नी हत्याएँ ‘आर्थिक रूप से प्रेरित’ होती हैं। एफ.बी.आई के आँकड़ों के अनुसार, अमेरिका में हर वर्ष अंतरंग साथी के हाथों होने वाली हत्याओं में स्त्रियों का अनुपात ७०% है — अर्थात् ज़्यादातर पत्नियाँ मारी जाती हैं। परन्तु एक चिन्ताजनक सत्य यह भी है : शिकागो, डेट्रॉइट, ह्यूस्टन, और सेंट लुई जैसे महानगरों में पत्नियों द्वारा पतियों की हत्या का अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
यह आँकड़ा केवल सांख्यिकी नहीं है — यह एक सामाजिक रूपांतरण का संकेत है जिसमें विवाह की संस्था अपना पवित्र स्वरूप खोकर एक कॉन्ट्रैक्ट बन गई है जिसे ‘टर्मिनेट’ किया जा सकता है। और यह टर्मिनेट शब्द अब शब्दश: खतरनाक हो चला है।
यह सब क्यों हो रहा है? क्या यह केवल व्यक्तिगत नैतिक पतन है, या किसी बड़े सामाजिक रोग का लक्षण?
आधुनिकता — अपने सर्वोत्तम रूप में — स्वतंत्रता, समता, और न्याय का आदर्श है। परन्तु अपने विकृत रूप में वह एक ऐसी संस्कृति उत्पन्न करती है जहाँ ‘अहं’ (सेल्फ) सर्वोपरि है, जहाँ सम्बन्ध केवल उपयोगिता से परिभाषित होते हैं, और जहाँ ‘दूसरा’ (द अदर) केवल तब तक मूल्यवान है जब तक वह मेरे लक्ष्यों में सहायक है।
एक पहलू प्रेम की रोमानी अवधारणा का है। आधुनिक संस्कृति ने प्रेम को लगभग जादुई समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है। फिल्मों और लोकप्रिय साहित्य ने यह विश्वास पैदा किया कि सही व्यक्ति मिल जाए तो जीवन की सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। वास्तविकता इसके विपरीत है। विवाह दो अपूर्ण मनुष्यों का मिलन है। उसमें धैर्य, समझौता, क्षमा और आत्मानुशासन की आवश्यकता होती है। जब लोग प्रेम को केवल तीव्र भावना समझते हैं और उसके नैतिक आयामों को भूल जाते हैं, तब संबंध पहली बड़ी कठिनाई में टूटने लगते हैं। पहले प्रेम बलिदान करता है, अब बलि चढ़ाता है।
मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि कुछ लोग एक साथ अनेक भावनात्मक वास्तविकताएँ जीने का प्रयास करते हैं—एक सार्वजनिक, एक निजी। जब दोनों टकराने लगती हैं, तो वे सत्य का सामना करने के बजाय उसे नष्ट करने का प्रयास कर सकते हैं।
आधुनिक समाज ने व्यक्तियों को विकल्प तो बहुत दिए हैं, लेकिन कठिन भावनात्मक निर्णय लेने का प्रशिक्षण कम दिया है। “ना” कहना, संबंध समाप्त करना, अपराधबोध सहना, दूसरों को निराश करना—ये सब परिपक्वता की माँग करते हैं। कुछ लोग इस परिपक्वता तक पहुँच ही नहीं पाते।
फ्रैंकफर्ट स्कूल के दार्शनिक थियोडोर एडोर्नो और मैक्स होर्खाइमर ने ‘डायअलेक्टिक ऑफ एनलाइटनमेंट’ में चेताया था कि ज्ञानोदय (एनलाइटनमेंट) की तर्क-बुद्धि अंततः एक ‘इंस्ट्रुमेंटल रीज़न’ में परिवर्तित हो जाती है — एक ऐसी बुद्धि जो सब कुछ को साधन के रूप में देखती है, साध्य के रूप में नहीं। जब यही ‘इंस्ट्रुमेंटल रीज़न’ सम्बन्धों पर लागू होती है, तो पति-पत्नी एक-दूसरे को साधन मानने लगते हैं।
इम्मानुएल कांट ने कहा था : ‘मनुष्य को सदैव साध्य के रूप में देखो, साधन के रूप में कभी नहीं।’ परन्तु आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में यही ‘साधनीकरण’ (इंस्ट्रुमेंटलाइज़ेशन) सम्बन्धों का मूल आधार बन गया है। सोनम के लिए राजा एक साधन था — विवाह के आर्थिक लाभों का। सिया के लिए केतन एक बाधा था — उसके प्रेमी से मिलन की राह में। साकी के लिए नोज़ाकी एक साधन था — धन-प्राप्ति का।
किसी भी सभ्यता की वास्तविक परीक्षा उसके स्मारकों से नहीं, उसके निकटतम संबंधों से होती है। यदि पति-पत्नी, माता-पिता और संतान, मित्र और प्रेमी—इन मूल संबंधों में विश्वास समाप्त होने लगे, तो आर्थिक प्रगति भी अंततः खोखली सिद्ध होती है। इसलिए इन घटनाओं को केवल सनसनीखेज अपराध समाचार की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। वे आधुनिक मनुष्य के भीतर बढ़ते अकेलेपन, आत्मकेन्द्रिकता और नैतिक विघटन के चेतावनी-संकेत हैं।
परिणामस्वरूप व्यक्ति स्वतंत्र तो हो गया है, किंतु उस स्वतंत्रता को संभालने के लिए आवश्यक नैतिक परिपक्वता हमेशा विकसित नहीं हो पाई। यह वही स्थिति है जिसे समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम “ऐनोमी” अर्थात मानदंडहीनता कहते थे। पुराने नियम टूट चुके हैं, नए नियम अभी स्थिर नहीं हुए।
सबसे करुण पक्ष यह है कि ऐसी घटनाओं में मरने वाला केवल एक व्यक्ति नहीं होता। उसके साथ असंख्य स्वप्न मरते हैं। माता-पिता का विश्वास मरता है। बचपन की स्मृतियाँ मरती हैं। विवाह के समय लिए गए वचन मरते हैं। जिन तस्वीरों में दो लोग भविष्य की ओर मुस्कुरा रहे थे, वे अचानक शोक के दस्तावेज़ बन जाती हैं। अपराध के आँकड़े इस पीड़ा को दर्ज नहीं कर सकते।
सम्बन्धों का यह ‘साधनीकरण’ कहाँ से आता है? इसके अनेक स्रोत हैं :
प्रथम, उपभोक्तावादी संस्कृति जो यह सिखाती है कि प्रत्येक वस्तु — और व्यक्ति — का एक ‘उपयोग-मूल्य’ है, और जब वह उपयोग-मूल्य समाप्त हो जाए, तो उसे ‘डिस्पोज़’ किया जा सकता है।
द्वितीय, सामाजिक माध्यमों (सोशल मीडिया) द्वारा निर्मित वह मिथ्या संसार जहाँ व्यक्ति सदैव ‘बेहतर विकल्प’ की तलाश में रहता है — चाहे वह उत्पाद हो, नौकरी हो, या जीवन-साथी।
तृतीय, विवाह संस्था का वह क्षरण जो तब होता है जब उसे केवल एक कानूनी अनुबंध के रूप में समझा जाता है — न एक आत्मिक प्रतिज्ञा के रूप में।
चतुर्थ, वह ‘नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी’ जिसका विकास आधुनिक समाज करता है — जहाँ ‘मेरी इच्छा’ और ‘मेरा सुख’ सर्वोच्च हैं, और जहाँ दूसरे के दुःख का कोई नैतिक भार नहीं।
क़र्ज़’ में पुरातन ने आधुनिकता के अत्याचार का उत्तर पुनर्जन्म से दिया। रवि वर्मा नए शरीर में जन्मा और न्याय मिला। परन्तु क्या यह वास्तविक प्रतिरोध है?
राजा रघुवंशी के परिवार ने भी यही सांत्वना ली। जब उसके भाई के घर एकादशी को पुत्र हुआ, तो परिवार ने कहा ‘राजा वापस आ गया।’ यह आस्था हृदयस्पर्शी है — परन्तु यह न्याय नहीं है। न्याय के लिए तो न्यायालय हैं, कानून है, समाज है।
भारतीय दार्शनिक परम्परा में पुनर्जन्म की अवधारणा केवल एक ‘कॉनसोलेशन’ नहीं है। वह एक कर्म-सिद्धांत से जुड़ी है — इस जन्म के कर्म अगले जन्म को प्रभावित करते हैं। परन्तु इस सिद्धांत की व्यावहारिक सीमा यह है कि यह वर्तमान पीड़ित को तत्काल न्याय नहीं दिलाता। यह धैर्य की माँग करता है — एक ऐसे धैर्य की जो माँ-बाप के लिए असह्य है जिन्होंने अपने पुत्र को खो दिया।
पुरातन का वास्तविक प्रतिरोध पुनर्जन्म की आस्था नहीं, उन मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा है जो विवाह को एक पवित्र प्रतिज्ञा मानते थे, जो ‘परिणय’ को केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो कुलों का, दो आत्माओं का संयोग मानते थे। वह प्रतिरोध तब सार्थक होगा जब समाज फिर से विवाह को उपभोग की वस्तु नहीं, एक नैतिक प्रतिबद्धता के रूप में स्वीकार करे।
इन घटनाओं में जो प्रश्न उभरता है वह लिंग का नहीं, मूल्यों का है। चाहे हत्यारा पुरुष हो या स्त्री — जब विवाह में ‘दूसरे’ को केवल साधन के रूप में देखा जाता है, जब सम्बन्ध में गणना होती है न स्नेह, जब ‘मेरा सुख’ इतना विराट हो जाता है कि दूसरे के जीवन का मूल्य शून्य हो जाता है — तब यह व्यक्ति की नहीं, संस्कृति की विफलता है।
इन मामलों में एक और पहलू है : इनमें से अधिकांश में हत्यारे के पास पहले से एक अन्य प्रेमी/प्रेमिका है। यह ‘ट्रायएंग्युलर ड्रामा’ बताता है कि विवाह उस व्यक्ति के लिए केवल एक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था थी, न एक भावनात्मक चुनाव। जब हृदय कहीं और था और शरीर कहीं और बाँधा जाना था — तो यह त्रिकोण के दो लोगों की हृदयहीनता इतने रसातल तक पहुँच गई।
‘क़र्ज़’ ने जिसे अपराध-कथा या पुनर्जन्म-कथा कहा, वह वास्तव में आधुनिकता का एक ऐसा संत्रास है जिसके विरुद्ध पुरातन का कोई प्रतिरोध पुनर्जन्म के माध्यम से भी नहीं।यह वाक्य एक गहरी पीड़ा से उपजा है। पुनर्जन्म की आस्था — जो हिन्दू चिन्तन का आधारस्तम्भ है — यहाँ एक सांत्वना के रूप में प्रकट होती है, न एक समाधान के रूप में।’राजा वापस आ गया’ कहना हृदय की करुण पुकार है — एक ऐसी पुकार जो आधुनिकता की क्रूरता के समक्ष असहाय खड़ी है।
भारतीय परम्परा में ‘क़र्ज़’ की अवधारणा गहरी है। ऋणानुबन्ध — आत्माओं के बीच का ऋण — यह बताता है कि सम्बन्ध केवल इस जन्म के नहीं, अनेक जन्मों के होते हैं। परन्तु यह आस्था तब तक जीवित रह सकती है जब तक समाज में एक न्यूनतम नैतिक संहिता जीवित हो — जब तक ‘दूसरा’ केवल एक वस्तु नहीं बना हो।
आधुनिकता का भँवर यही करता है : वह ‘दूसरे’ की आत्मा को नकारता है। वह कहता है : तुम केवल वही हो जो तुम मुझे दे सकते हो। जब देना बंद हो जाए — या जब देना बाधित हो जाए — तो तुम्हारा अस्तित्व अनावश्यक है।
यह ‘डिसएनचैंटमेंट ऑफ द वर्ल्ड’ है — मैक्स वेबर का वह प्रसिद्ध पद जो कहता है कि आधुनिकता ने संसार से जादू को, पवित्रता को, आत्मिकता को छीन लिया है। जब विवाह ‘डिसएनचैंटिड’ हो जाता है — जब उसमें से वह पवित्रता निकल जाती है जो इसे केवल एक अनुबंध से परे बनाती थी — तो शेष रहता है केवल एक ‘ट्रांज़ैक्शन’। और जब ट्रांज़ैक्शन में एक पक्ष ‘लॉस-मेकिंग’ हो, तो उसे ‘एग्ज़िट’ करने का तर्क स्वतः उत्पन्न होता है।
‘क़र्ज़’ की कामिनी ने यही किया। सोनम ने यही किया। सिया ने यही किया। और साकी ने — यदि वह वास्तव में दोषी थी — तो यही किया। हर बार एक ही तर्क : ‘यह व्यक्ति मेरे लक्ष्य की राह में है। इसे हटाना है।’
पुरातन का प्रतिरोध — चाहे पुनर्जन्म की आस्था के रूप में हो, चाहे कर्म-सिद्धांत के रूप में, चाहे विवाह की पवित्रता की अवधारणा के रूप में — इस तर्क को तोड़ने में असमर्थ है। क्योंकि यह प्रतिरोध आत्मिक स्तर पर होता है, और आधुनिकता का संत्रास व्यावहारिक स्तर पर है।
कौन सनातन यह समझाए कि ‘सुख’ केवल ‘मेरा सुख’ नहीं हो सकता — क्योंकि जिस सुख के लिए दूसरे का जीवन लिया जाए, वह सुख नहीं, पाप है। केतन अग्रवाल के पिता ने कहा : ‘उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।’ वह ‘कोई भाव नहीं’ — वह अनुपस्थित करुणा — ही इस सारे संकट का सार है। जब हृदय में दूसरे के लिए कोई भाव नहीं, जब उसके दुःख का कोई प्रतिबिम्ब अपने भीतर नहीं — तब हत्या सम्भव हो जाती है।नोज़ाकी के अंतिम संस्कार में ‘कोई कष्ट नहीं’ का उत्तर देने वाली साकी भी उसी ‘भावशून्यता’ की प्रतिनिधि है।
आधुनिकता का संत्रास गहरा है। पुरातन का प्रतिरोध कमज़ोर है। परन्तु सनातन का आग्रह — कि ‘दूसरा’ भी उतना ही मनुष्य है जितना ‘मैं’ हूँ — यह आग्रह न पुरातन है, न आधुनिक। यह शाश्वत है।
