महान फ़िल्म द ग्रेट डिक्टेटर के अंत में चार्ली चैप्लिन का भाषण : शैलेन्द्र चौहान

मुझे खेद है लेकिन मैं शासक नहीं बनना चाहता। ये मेरा काम नहीं है। किसी पर भी राज करना या किसी को भी जीतना नहीं चाहता। मैं तो किसी की मदद करना चाहूंगा – अगर हो सके तो – यहूदियों की, गैर यहूदियों की – काले लोगों की – गोरे लोगों की।

हम सब लोग एक दूसरे लोगों की मदद करना चाहते हैं। मानव होते ही ऎसे हैं। हम एक दूसरे की खुशी के साथ जीना चाहते हैं। एक दूसरे की तकलीफों के साथ नहीं। हम एक दूसरे से नफ़रत और घृणा नहीं करना चाहते। इस संसार में सभी के लिये स्थान है और हमारी यह समृद्ध धरती सभी के लिये अन्न-जल जुटा सकती है।

जीवन का रास्ता मुक्त और सुन्दर हो सकता है, लेकिन हम रास्ता भटक गये हैं। लालच ने आदमी की आत्मा को विषाक्त कर दिया है। दुनिया में नफ़रत की दीवारें खड़ी कर दी हैं। लालच ने हमे ज़हालत में, खून खराबे के फंदे में फसा दिया है। हमने गति का विकास कर लिया लेकिन अपने आपको गति में ही बंद कर दिया है। हमने मशीनें बनायी, मशीनों ने हमे बहुत कुछ दिया लेकिन हमारी माँगें और बढ़ती चली गयीं। हमारे ज्ञान ने हमें सनकी बना छोड़ा है। हमारी चतुराई ने हमे कठोर और बेरहम बना दिया। हम बहुत ज्यादा सोचते हैं और बहुत कम महसूस करते हैं। हमें बहुत अधिक मशीनरी की तुलना में मानवीयता की ज्यादा जरूरत है, इन गुणों के बिना जीवन हिंसक हो जायेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »