स्वरांगी साने : न्यूटन के बहाने से….

यदि किसी क्षण आप असुरक्षित महसूस करते हैं, तो ऐसा महसूस कर पाने के लिए भी बड़े साहस की ज़रूरत होती है। दुर्बलता के क्षणों में ही सवालों का जन्म होता है। यदि हम खुद को पूरी तरह सुरक्षित मानकर चलते हैं तो हमारे सामने न कोई सवाल होता है, न हम उसका जवाब ढूँढने की फ़िराक में होते हैं। कभी-कभी खुद के सामने ऐसी चुनौतियाँ भी खड़ी करनी होती है, जिसका भले ही वैसे आपके लिए कोई अर्थ न हो, जैसा आपको लगता हो कि होना चाहिए। कुछ समय एकांत में बिताने पर आप प्रकृति के सौंदर्य को अधिक गहराई से महसूस करते हैं और हर बात की मीमांसा करते रहने की बजाय उसे क्रियान्वित करने के लिए प्रेरित होते हैं। ग़लतियाँ करने से ही आप सीखते हैं, न कि कंफ़र्ट ज़ोन में बैठकर खुद को सुरक्षित बनाए रखने से।

इसका सबसे सटीक उदाहरण आइज़ैक न्यूटन का है, जिन्होंने ‘गुरुत्वाकर्षण के नियम’ और ‘गति के सिद्धांत’ खोजे। न्यूटन के ‘गति के तीन सार्वभौमिक सिद्धांतों’ में 200 से अधिक वर्षों तक भी किसी को कोई सुधार नहीं दिख सका, क्या यह किसी अजूबे से कम है, जबकि सभी को पता है कि न्यूटन स्कूल से निकाले जा चुके थे। वे प्रकृति के सानिध्य में बैठने लगे, उसके सौंदर्य को निहारने लगे। उनका भविष्य अनिश्चित था और पढ़ाई में कमज़ोर छात्र के रूप में उनकी पहचान बन चुकी थी। उस दिन ऐसे ही लेटे थे कि एक सेब पेड़ से गिरा, यह कोई अनहोनी घटना नहीं थी, न्यूटन के ‘गुरुत्वाकर्षण के नियम’ खोजने से पहले और उसके बाद भी फलों से लदे पेड़ से हर फल ज़मीन पर ही गिरा था और गिरता रहा भी, वे भी कह सकते थे इसमें क्या नई बात! लेकिन उन्होंने नई बात खोज निकाली और भौतिकी जगत् में उनके नियम सार्वकालिक, सार्वभौमिक सिद्ध हुए। दूसरों के सामने यह सिद्ध करते रहने में कि हम सही हैं, हम अपना समय क्यों जाया करते हैं? खुद के बारे में सोचिए, अपने आपको समय दीजिए, विज्ञान का सूत्र कहता है कि सूत्र सार्वकालिक होते हैं मतलब किसी भी काल में वे नहीं बदलते। तदर्थ, समय अपने आपमें महज़ एक भ्रम है और कुछ नहीं। आपको अपनी गति का तारतम्य उस चक्र के साथ जोड़ लेना है जिसे जीवन चक्र कहते हैं।     

अब तो आप विश्वास करेंगे कि जो नई खोज की राह पर चलते हैं वे डर की दुर्बलताओं से घिरे हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहते, बल्कि उस डर को अपनी जिज्ञासाओं से भर देते हैं। डर उनके दिमाग को नहीं लीलता। वे कमाल कर जाते हैं। ग्रह-नक्षत्र तो हर किसी की पत्रिका में बैठे होते हैं लेकिन उन्हें कुंडली जमाकर बैठने की इज़ाजत देना है, या नहीं यह हमें तय करना होता है। न्यूटन केवल गणितज्ञ, भौतिक वैज्ञानिक ही नहीं थे बल्कि ज्योतिषी एवं दार्शनिक भी थे। ग्रहीय गति के केपलर के नियमों और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के बीच निरंतरता स्थापित करते हुए खुद न्यूटन ने दर्शाया कि पृथ्वी पर वस्तुओं की गति और आकाशीय पिंडों की गति का नियंत्रण प्राकृतिक नियमों के समान समुच्चय द्वारा होता है। मतलब  परिस्थितियों से कुछ नहीं होता। विज्ञान का हर नियम यही कहता है कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों, परिस्थितियों का हवाला देना वैज्ञानिक कहलाना नहीं होता। पानी का रासायनिक सूत्र एच2ओ है, अब आप समुद्र का पानी ले लीजिए या नदी का, या तूफ़ानी लहरों का या वर्षा का, यदि वह पानी है तो उसमें हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु होगा तभी वह पानी होगा। विश्व में कहीं भी, कोई भी, कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो, पानी की यह तासीर उस वजह से नहीं बदलेगी। ठीक यही गणित व्यक्ति के रूप में हम पर लागू होता है, यदि हम प्राणी हैं तो हम पंच तत्वों से बने हैं, किसी एक तत्व की अनुपस्थिति भी हमें मनुष्य बनने से परे कर देगी। अब यदि हम सभी मनुष्य हैं तो हम भी गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी, अभियंता, आविष्कारक और खगोल विज्ञानी आर्किमिडीज़ की तरह ‘यूरेका’ कहकर क्यों नहीं उछल पाते!

न्यूटन के जन्म लेने से तीन महीने पहले ही उनके पिता चल बसे थे। जब न्यूटन तीन साल के हुए तो माँ ने दूसरी शादी की और न्यूटन नानी के यहाँ पलने लगे। न्यूटन अपने नए पिता को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। न्यूटन ने खुद लिखा है कि मैंने अपने माता और सौतेले पिता के घर को जलाने की धमकी दी थी। माँ उनसे खेती करवाना चाहती थी और उन्हें खेती करने से नफ़रत थी। तब किंग्स स्कूल के मास्टर हेनरी स्टोक्स ने कहा कि न्यूटन को फिर से स्कूल भेजा जाए ताकि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर ले। वहाँ स्कूल में एक लड़के से बदला लेने के लिए वे शीर्ष छात्र बन गए। यह दृढ़ इच्छाशक्ति है जो स्कूल से निकाले गए छात्र को ज़हीन बना देती है..जो उन्नीस वर्ष की आयु तक नफ़रत में जलने वाले को भौतिकविद बना देती है। न्यूटन ने ‘प्रकाश के अपवर्तन’ की खोज की जैसे वह उनके जीवन का ही सच हो। जैसे प्रिज़्म श्वेत प्रकाश को सात रंगों में विकरित कर देता है और फिर दूसरा उल्टा रखा प्रिज़्म उस स्पेक्ट्रम को फिर सफ़ेद प्रकाश में परावर्तित कर देता है। यह न्यूटन की खोज भर नहीं बल्कि उनके जीवन का वास्तव है। न्यूटन का ‘रंग सिद्धांत’ अब उनके जीवन की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में समझिए। जिस तरह का उनका जीवन रहा और जितने उद्वेग से वे भरे हुए थे उसमें कभी भी भावनाओं का विस्फोट हो सकता था लेकिन भावनाओं के विस्फोट के सामने मानो कोई प्रिज़्म ही उल्टा रख उन्होंने उसे सकारात्मक रूख दे दिया। 

न्यूटन ने दिखाया कि रंगीन प्रकाश को अलग करने और भिन्न वस्तुओं पर चमकाने से रंगीन प्रकाश के गुणों में कोई परिवर्तन नहीं आता है। न्यूटन ने वर्णित किया कि चाहे वह परावर्तित हो, या विकिरित हो या संचरित हो, वह समान रंग का बना रहता है। क्या यह इस बात को दोहराने के लिए काफ़ी नहीं है कि जो रंगों के साथ हो सकता है वह आपके साथ भी संभव है, आप शुद्ध प्रकाश के रूप में धरती पर अवतरित होते हैं और उसी प्रकाश के रूप में धरती से विदा भी होते हैं, बीच की अवधि में जो कुछ भी चलता है वह केवल एक खेला है और आप अपने मूल प्रकाश स्रोत से अलग भी हो जाएँ या भिन्न वस्तुओं पर चमकने भी लगें तब भी आपके मूल गुणों में कोई परिवर्तन नहीं आना चाहिए। न्यूटन का ‘रंग सिद्धांत’ इस रूप में जाना जाता है कि रंग पहले से रंगीन प्रकाश के साथ वस्तु की अंतःक्रिया का परिणाम होता है न कि वस्तुएँ खुद रंगों को उत्पन्न करती हैं। तमाम सिद्धांतों को हम पढ़ तो लेते हैं लेकिन जीवन में उतार नहीं पाते कि जिन वस्तुओं, घटनाओं या पात्र-परिस्थितियों से हम अंतःक्रिया करते हैं वे हम पर रंग नहीं छोड़ सकतीं बल्कि हमारा ही अक्स उनमें उतरता है। यदि यह सिद्धांत है तो इसे सिद्ध करने की जवाबदारी भी हमारी है, यथा व्यष्टि तथा समष्टि, जैसे आप होते हैं, दुनिया आपको वैसी ही दिखती है।

विज्ञान हमें छोटी कक्षाओं से ही समझाता है कि हर बार प्रयोग और परीक्षण करना होता है। कभी प्रयोग सफल होता है, कभी नहीं। जो परिणाम आप हासिल करना चाहते हैं, वह जब तक साध्य नहीं होता, आपको प्रयोग करते रहना होता है, बिल्कुल जैसा ज्ञानी लोग कहते हैं, वैसे ही वर्तमान में रहते हुए। आपको अपनी प्रगति का खुद आकलन करना होता है और मानकर चलना होता है कि जो परिणाम आप चाहते हैं, वह मिलेगा ही। गणित की ही बात लीजिए। कोई इबारत सामने आती है तो उसका कोई हल भी निश्चित होता है। बिना ज्ञात हल के कोई इबारत गढ़ी ही नहीं जाती। आप जानते हैं कि इसका हल है और उस विश्वास से आप उस उस इबारत को चरण-दर-चरण सुलझाने लगते हैं। यदि आपको अपेक्षित उत्तर नहीं मिला तो आप इबारत पर संदेह नहीं करते बल्कि आप अपने चरणों की फिर से पड़ताल करते हैं, कि कहाँ आपने कौन-सा चरण ग़लत लिखा या कहाँ जोड़-घटाव, गुणा-भाग में चूक हो गई। आप हड़बड़ी नहीं करते और तब तक उसे सुलझाते रहते हैं जब तक कि आपको हल न मिल जाए। ऐसे ही जीवन के साथ भी है, आपके सवालों के जवाब विश्व के पास हैं, उन जवाबों को विश्व पर छोड़ दीजिए, आप तो सवाल को कैसे हल करना है इसकी तिकड़म लगाइए। कुछ ग़लत हो जाने का आशय यह नहीं होता कि हमेशा ग़लत ही होता रहेगा। जब आप अपनी सारी बुद्धि दाँव पर लगा देते हैं और जैसा हल चाहिए उसे पाने में जुटे रहते हैं तो आपको उसका हल भी सुनिश्चित मिलता है। आप जो भी करें उसमें सबका भला हो, इस एक बात को ध्यान में रखिए फिर सामान्य बुद्धि और प्रगल्भता दोनों ही तर्कों पर आप जान लेंगे कि दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी संभव है।

‘दैव और पुरुषाकार’ की बातें करना और वैज्ञानिक होना एक नहीं माना जाता। जबकि जो कर्म करता है उसे उसका फल मिलता ही है, आज नहीं तो कल, और ‘जैसा बोया जाता है, वैसा ही काटा’ जाता है पर हम मानते हैं कि जो लोग नियति की बात करते हैं वे अकर्मण्य होते हैं। लेकिन जो सही अर्थों में दुनिया के किसी भी धर्म को जान पाया है उससे अधिक वैज्ञानिक और कोई हो ही नहीं सकता। न्यूटन अत्यधिक धार्मिक थे। वे परंपरागत ईसाई कदापि नहीं थे। रूढ़ियों को मानना या ‘लकीर का फ़कीर’ होना मतलब धार्मिक होना नहीं होता, न्यूटन की तरह प्राकृतिक विज्ञान को समझना धार्मिक होना होता है और जितना न्यूटन ने प्राकृतिक विज्ञान पर लिखा उससे अधिक उन्होंने ‘बाइबिल हेर्मेनेयुटिक्स’ पर लिखा है। न्यूटन के कट्टरपंथी विचारों के बारे में कुछ सार्वजनिक अभिव्यक्तियाँ हैं, सबसे खास है, पवित्र आदेशों का पालन करने के लिए उनके द्वारा इनकार किया जाना, जब वे मरने वाले थे तब उन्हें पवित्र संस्कार लेने के लिए कहा गया और उन्होंने इनकार कर दिया था। जबकि न्यूटन ने कई धार्मिक शोध लिखे जो बाइबल की साहित्यिक व्याख्या से संबंधित थे। न्यूटन ने दावा किया कि  ‘प्रिन्सिपिया’(‘फ़िलॉसॉफ़ी नेचुरेलिस प्रिन्सिपिया मेथेमेटिका’), जिसमें गति के तीन सार्वभौमिक नियम हैं, जिनमें जैसा कि पहले कहा 200 से अधिक वर्षों तक कोई सुधार नहीं किया जा सका, उस ‘प्रिन्सिपिया’ को लिखते समय “मैंने एक नज़र ऐसे सिद्धांतों पर रखी, ताकि देवता में विश्वास रखते हुए मनुष्य पर विचार किया जा सके।” न्यूटन का एक निर्वात में से होकर एक दूरी पर क्रिया के ‘गुप्त विचार’ पर भरोसा नहीं किया होता तो वे गुरुत्व का अपना सिद्धांत विकसित नहीं कर पाते। इसे समझने के लिए आइजैक न्यूटन के ‘गुप्त अध्ययनों’ को समझना होगा। बहुत अधिक दूरी पर क्रिया कर सकने वाले एक अदृश्य बल की न्यूटन की इस अवधारणा की वजह से उनकी आलोचना भी खूब हुई क्योंकि उन्होंने विज्ञान में किन्हीं ‘गुप्त तत्वों’ को मिला दिया था। न्यूटन ने स्वयं लिखा है कि ‘मैं नहीं जानता कि मैं दुनिया को किस रूप में दिखाई दूँगा लेकिन अपने आप के लिए मैं एक ऐसा लड़का हूँ जो समुद्र के किनारे पर खेल रहा है और अपने ध्यान को अब और तब में लगा रहा है, एक अधिक चिकना पत्थर या एक अधिक सुन्दर खोल ढूँढने की कोशिश कर रहा है, सच्चाई का यह इतना बड़ा समुद्र मेरे सामने अब तक खोजा नहीं गया है।’ यदि भौतिकी में कोई कविता रच सकता है तो शायद वह न्यूटन है या कविता में कोई भौतिकी खोज सकता है तो वह न्यूटन हैं।

नाइट की उपाधि से सम्मानित न्यूटन के वेस्टमिंस्टर एब्बे में स्थित स्मारक पर लिखा है-

यहाँ नाइट, आइजैक न्यूटन, को दफनाया गया, जो दिमागी ताकत से लगभग दिव्य थे, उनके अपने विचित्र गणितीय सिद्धांत हैं, उन्होंने ग्रहों की आकृतियों और पथ का वर्णन किया, धूमकेतु के मार्ग बताये, समुद्र में आने वाले ज्वार का वर्णन किया, प्रकाश की किरणों में असमानताओं को बताया और वो सब कुछ बताया जिसकी किसी अन्य विद्वान् ने पहले कल्पना भी नहीं की थी, रंगों के गुणों का वर्णन किया…

वर्ष 2005 में एक सर्वेक्षण किया गया कि विज्ञान पर किस वैज्ञानिक का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा तो बहुमत से न्यूटन का नाम सर्वोपरि आया था। न्यूटन को विज्ञान के दायरे तक सीमित रखकर हम अपनी सोच को सीमित कर लेंगे, दरअसल न्यूटन को किसी प्रेरणादायी व्यक्तित्व या मेंटर की तरह देखने, समझने और कई अर्थों में उनका अनुपालन करने की ज़रूरत है। नए संदर्भों में नए सिरे से न्यूटन के हर सिद्धांत, हर व्याख्या को पुनर्प्रतिपादित करने की ज़रूरत है।

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