रायबरेली उत्तर प्रदेश की रत्ना भदौरिया की इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको लगता है कि आप आज के समय से दो-चार हो रहे हैं। पेशे से वे नर्स हैं, दूसरों के ज़ख़्मों को भरते हुए वे अपने ज़ख़्मों को कुछ इस तरह कविताओं में पिरोती है कि उन शब्दों में आक्रोश भी झलकता है और विडंबना भी। प्रकाशित पुस्तकें- एक कहानी संग्रह, सामने वाली कुर्सी, संस्मरण मेरे जीवन की धुरी, मन्नू भंडारी संपादन धरोहर, स्त्री प्रतिनिधि कहानियां। हंस,कथादेश और अन्य पत्रिकाओं में लघुकथा कहानियाँ संपादित, पूर्वकथन की समन्वय संपादक।

एक सवाल
रोटी माँगते हाथों को
ख़तरा घोषित कर दिया गया
मानो भूख कोई प्रश्न नहीं
राज्य के विरुद्ध दर्ज की गई
एक आपत्ति हो
मज़दूर ने तो केवल
अपने पसीने का हिस्सा माँगा था
वही हिस्सा
जो वर्षों से इमारतों में चुन दिया गया
कारखानों में खपा दिया गया
और विकास के आँकड़ों में छिपा दिया गया
मगर सत्ता ने
उसकी आवाज़ नहीं सुनी
उसने पहले आरोप गढ़े
फिर अभियुक्त चुने
और अंत में
न्याय का अभिनय रच दिया
जो भूख के साथ खड़े थे
वे सलाखों के पीछे पहुँचा दिए गए;
और जो भूख को समझ सकते थे
उन्हें शोर के ऐसे मेले में धकेल दिया गया
जहाँ नारे तो थे
पर विचार नहीं;
उत्साह तो था
पर विवेक नहीं
धीरे-धीरे
रोटी का प्रश्न गायब कर दिया गया
और प्रश्न पूछने वाला
समस्या बना दिया गया
इतिहास के पन्नों पर
ऐसे समय बार-बार लौटते हैं—
जब अन्याय
कानून की भाषा बोलता है
जब शक्ति
नैतिकता का मुखौटा पहनती है
और जब भूख को
उसकी रोटी नहीं
उसकी औक़ात याद दिलाई जाती है
पर सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है—
उसे तलवारों से उतना भय नहीं लगता
जितना उस क्षण से
जब एक श्रमिक
अपने खाली पेट पर हाथ रखकर
शांत स्वर में पूछता है—
जिस दुनिया को मैंने बनाया, उसमें मेरे हिस्से की रोटी कहाँ है?
नदी की मृत्यु
मैं एक प्राचीन नदी की तरह
प्रेम में बहना चाहती थी—
निर्बाध, निसंग, गहरी
पर वह प्रेमी नहीं था
वह एक विजेता था
जिसने आकर्षण को
अपने सबसे चमकदार हथियार की तरह इस्तेमाल किया
उसने मेरे जल को नहीं छुआ
मेरी स्वतंत्रता की गर्दन पकड़ी
उसके शब्दों में प्रेम था
पर उनकी छाया में
स्वामित्व का अँधेरा पलता था
मैं बहती रही
यह सोचकर कि यह साथ है
वह रोकता रहा
यह मानकर कि यही प्रेम है
फिर एक दिन
मेरे भीतर का स्रोत काँप उठा
मैंने देखा—
मेरे किनारों पर खड़ा व्यक्ति
मुझे प्रेम नहीं कर रहा था
वह मेरी गति की हत्या करके
मेरे समर्पण का स्मारक बनाना चाहता था
और तब से
मैं नदी नहीं रही
मैं उस सूखे तल का नाम हूँ
जहाँ कभी प्रेम बहता था
और अब केवल
आकर्षण के सड़े हुए अवशेष
धूप में पड़े हैं
