कंप्यूटर के विंडो के साथ आइए एक झरोखा भी खोलें : स्वरांगी साने

ज्ञान हर तरफ़ बिखरा पड़ा है, है न? यह ज्ञान के विस्फोट का युग है। व्हाट्सऐप से लेकर सोशल मीडिया तक और अखबारों से लेकर गूगल बाबा, इंस्टाग्राम तक हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, फिर हमें और अधिक नया पढ़ने-देखने-सुनने की आवश्यकता क्यों है? दरअसल हमें कुछ नया पढ़ने-देखने-सुनने से अधिक जो हमारे पास है उसे गुनने की आवश्यकता है। दुनियाभर का ज्ञान हमारे पास है लेकिन हमें बिल्कुल अपने आसपास की कोई जानकारी नहीं है। बाज़ार हम पर हावी हो रहा है और वह ठीक उस तरह से हावी हो रहा है, जैसा वह होना चाहता है सो उसी बाज़ार में खड़ी हमारे पड़ोस की किराना दुकान में क्या मिलता है, हमें नहीं पता। हमारी पुरानी गलियाँ, चौक-चौबारे ख़त्म होते जा रहे हैं, इसका रोना तो हर कोई रो रहा है लेकिन क्या कोई इसकी दखल भी लेगा कि उसके साथ हमारी पूरी संस्कृति, सभ्यता, विरासत नष्ट होती जा रही है। ‘चौक पुराओ, मंगल गाओ’ के शब्द खोते चले जा रहे हैं क्योंकि हम नई पीढ़ी तक चौक क्या होता है, उसे पूरते कैसे हैं, मंगलध्वनि कैसे होती है, जैसी सारी बातें नहीं पहुँचा पा रहे हैं।
क्या ऐसा नहीं लगता कि आज के दौर में कंप्यूटर के विंडो के साथ एक झरोखा भी खुला होना चाहिए जो हमें हमसे ही मिलवाए। ऐसा झरोखा जो ताज़ा बयार लेकर आए और हम अपनी ही भाषा, अपनी संस्कृति, अपने रीति-रिवाज़ों, परंपरा-रवायतों से रू-ब-रू हो पाएँ। जिस सिंधु घाटी की सभ्यता को हम जीवित सभ्यता कहते नहीं अघाते, उसे जीवित रखने का जिम्मा भी तो हमें उठाना पड़ेगा। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उस विरासत को पहुँचाते हुए यह भी तो देखना होगा कि कहीं उसकी सघनता तो कम नहीं हो रही? ऐसा अपने-आप नहीं होगा। हमारे ध्यान न देने पर वह हस्तांतरित होते हुए अपनेआप विरल तो होती जाएगी लेकिन उसकी सघनता को बचाए रखने के लिए हमें कोशिश करनी होगी। छोटे-छोटे कदम जैसे अपने घर-परिवार में मातृभाषा में ही बात हो, इससे ही देखिएगा कितने शब्द, उनके मायने और उनसे जुड़ी बातें खुदबखुद संरक्षित होती चली जाएँगी। जैसे संस्कृत भाषा हमारे पास बची ही इसलिए है कि सारे मंत्रोच्चार संस्कृत में होते हैं, उससे अपने आप उससे जुड़ी बातें भी स्थापित हो जाती हैं। जैसे यज्ञवेदी को उसी तरह से तैयार किया जाता है और उसके लिए लगने वाली
सामग्री भी हर संभव कोशिश जुटाई जाती है।
वही बात हमारे हर छोटे-बड़े संस्कार को जतन करते हुए लागू की जानी चाहिए। पूजा करते हुए जैसे हम उस शालीनता को निभाते हैं और भारतीय वस्त्रों को पहनने पर ही जोर देते हैं उससे ही तो वेस्टर्न आउटफिट (पाश्चात्य पहरावे) के दौर में हमें भरोसा है कि भारतीयता बनी रहेगी। वही शालीनता हर शास्त्रीय आयाम के साथ कड़ाई से निभानी चाहिए। लेकिन संस्कृत और संस्कृति के लिए पूजा-अर्चना आदि हैं पर शेष का क्या? उन्हें भी पूजा या इबादत मानकर उसी सलीके, उसी शास्त्रीयता से करना होगा पर उसके लिए वह झरोखा कहां है, जो बता सके कि ये हमारे शास्त्रीय नृत्य हैं, ये उत्तर भारतीय और ये दक्षिण भारतीय…ये हमारा संगीत है, शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, कर्नाटक संगीत या ये हमारे नाट्याविष्कार हैं, ये मालवा का माच है, ये नौटंकी है, ये रामलीला है और ये यक्षगान…पर इन सबकी जानकारी कहाँ-से ली जाए? आप तुरंत उत्तर देंगे कि गूगल बाबा से, लेकिन गूगल से क्या पूछना है वह प्रश्न तो आपको पता होना चाहिए न। पहले आपको यह पता होना चाहिए कि सुबह-सबेरे घर बुहारकर (बुहारना क्या होता है, इस शब्द को भी तो बचाना है, उसके अर्थ के साथ) उसके बाहर चित्रनुमा कुछ बनाया जाता था और वह मधुबनी पेंटिंग नहीं थी…मधुबनी कला अलग है और रंगोली अलग और अल्पना उससे अलग। हर रंग की कितनी अलग-अलग छटाएँ हैं और उन छटाओं में कितनी विविध मनोरमता है। इन सभी से आप कितने वाकिफ़ हैं? ये सारे सवाल सिविल परीक्षाओं की तैयारी के लिए हल नहीं करने हैं बल्कि हम जिसे भारतीयता कहते हैं उसकी माटी क्या है और हम किस माटी से बने हैं, उसे जानने के लिए खोजने हैं। वरना हो यही रहा है कि हमें दुनियाभर की ढेरों ज़रूरी-गैरज़रूरी बातें पता है, सूचनाओं का अंबार लगा है, कहने को हमें सब पता है लेकिन कोई हमसे कुछ पूछ ले तो हमें किसी चीज़ के बारे में ठीक-ठीक कुछ भी नहीं पता है। थोड़ा ये पता है, थोड़ा वो पता है…पर अपने ही बारे में हमें पूरा कुछ नहीं पता है। आइए अपने बारे में, अपने होने के बारे में पता करने की कवायद करते हैं वरना हमारी हालत दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो ठीक ऐसी हो जाएगी कि- ‘हम खड़े थे, कि ये ज़मीं होगी, चल पड़ी, तो इधर-उधर देखा’।

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