भारत की संस्कृति अनोखी है
साम्प्रदायिक उत्पात के समय नोआखाली-प्रवास में एक दिन मनु गांधीजी के घी मल रही थीं और वह कुछ पेचीदा अंग्रेजी पत्र-व्यवहार सुन रहे थे। पत्र-व्यवहार पूरा हुआ तो मनु ने कहा, “आप मुझे कालेज में जाकर एम०ए० या बी०ए० तक पढ़ने देते तो आपका अंग्रेजी में होनेवाला काम मैं भी आसानी से कर सकती थी, परंतु आपने मुझे पढ़ने ही नहीं दिया।”
गांधीजी बोले, “मुझे तो तुम्हें पढ़ना और गुनना दोनों सिखलाना है, उसका क्या होगा?”
मनु ने उत्तर दिया, “देखिये, महादेव काका इतना पढ़े, तभी तो आपके निजी मंत्री बन सके। और भी जितने बड़े लोग हैं, सबके पास डिग्रियां हैं, इसीलिए तो वे इतने ऊंचे चढ़े।”
गांधीजी हंस पड़े। बोले, “मोटे सो खोटे। ‘डिग्री’ की जगह तुम ‘उपाधि’ शब्द काम में लो। उपाधि सचमुच उपाधि ही है। मैं बैरिस्टर बना, इसका मुझे आज पश्चात्ताप होता है। सच कहूं कि मैं बैरिस्टर हूं, इसका मुझे कभी ख्याल ही नहीं आता। इसलिए अपने अनुभव के आधार पर दूसरों को तो ऐसी उपाधि से बचाना ही चाहिए। आजकल की यूनिवर्सिटी की पढ़ाई में जो रटाई हो रही है, वह मुझे खटकती है। देहात में अपार काम पड़ा है। विद्यार्थी पढ़ने और रटने में जितना समय गंवाते हैं, उतना यदि कोई रचनात्मक काम करने में लगायें तो देश की शक्ल बदल जाये। हां, इस पढ़ाई के पीछे ज्ञान प्राप्त करने और पढ़ाई के पीछे ज्ञान, यह मंत्र होना चाहिए। परंतु आजकल परीक्षा के पीछे परीक्षा, यह दृष्टि होती है और फिर इस ज्ञान का उपयोग रुपया कमाने में होता है।”
कदाचित तुम पढ़ती होतीं तो आज कहां होतीं? मेरी चले तो मैं सभी कॉलेज के लड़के और लड़कियों को दंगे की इस आग में झोंक दूं । सचमुच यदि हमारे विद्यार्थियों के मन से उपाधि का मोह निकल जाये तो तुम देखोगी कि सारी दुनिया के नक्शे में हिंदुस्तान, जो बिंदुमात्र है, वह समुद्र जैसा हो जाये। जैसा देश वैसा ही उसका रहन-सहन और वैसा ही उसका काम-काज होना चाहिए। परंतु अंग्रेजों का न करने लायक अनुकरण करने से ही हमारा पतन होगा। ‘हंस कौवे की चाल चलने लगता है तो मर ही जाता है, परंतु वह अपनी चाल चला, इसलिए जीत गया।”
संपादक:— विष्णु प्रभाकर, गांधी आख्यान माला से
