कहानी “पुरु और प्राची” ( दिव्या माथुर ) समीक्षा : डॉ. सुनीता शर्मा

आदरणीया दिव्या माथुर जी,

सादर प्रणाम।

वैश्विक हिन्दी परिवार में आपकी कहानी “पुरु और प्राची” पढ़ने का सौभाग्य मिला। कहानी पढ़ने के बाद मन लंबे समय तक उसके साथ संवाद करता रहा। उसी आत्मसंवाद की परिणति के रूप में मैंने अपनी एक पाठकीय प्रतिक्रिया लिखी है।

मैं यह दावा नहीं करती कि मैंने आपकी कहानी को पूरी तरह समझ लिया है। प्रत्येक पाठक अपनी संवेदना और अनुभवों के साथ किसी रचना में प्रवेश करता है। मैंने भी उसी दृष्टि से उसे पढ़ा और जो अनुभूत हुआ, उसे शब्द देने का विनम्र प्रयास किया है।

यदि समय मिले तो कृपया मेरी प्रतिक्रिया पढ़कर अवश्य बताइएगा—क्या एक पाठक के रूप में मैं आपकी कहानी की संवेदना, उसके कथ्य और उसकी धड़कन को कहीं छू सकी हूँ?

आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »