डॉ.पद्मा श्रीवास्तव-शब्द से संस्कृति तक : डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे (साक्षात्कारकर्ता)

आज हम ऐसी साहित्य साधिका, शिक्षाविद्, प्रशासक और संस्कृति-चिंतक के सृजन-संसार से रूबरू होने जा रहे हैं , जिन्होंने अपने जीवन के चार दशकों से अधिक समय को शिक्षा, भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना के संवर्धन के लिए समर्पित किया है।
डॉ. पद्मा सिंह केवल एक नाम नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य, भाषा-अध्ययन और सांस्कृतिक विमर्श की एक सशक्त परंपरा हैं। उन्होंने जहाँ एक ओर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनशाला को नई पहचान दी, वहीं दूसरी ओर हिन्दी को आधुनिक तकनीक और वैश्विक परिप्रेक्ष्य से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी किया। उनके प्रयासों से अनेक नए शैक्षणिक पाठ्यक्रम प्रारंभ हुए, भाषा प्रयोगशाला की स्थापना हुई तथा भारतीय एवं विदेशी भाषाओं के अध्ययन के नए द्वार खुले।

साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान बहुआयामी है। कविता, आलोचना, शोध, संस्कृति, भाषा-विज्ञान, संपादन और अनुवाद—सभी विधाओं में उनकी सशक्त उपस्थिति रही है। उनकी रचनाओं में एक ओर संवेदना की गहराई है तो दूसरी ओर सामाजिक सरोकारों और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्नों पर गंभीर चिंतन भी दिखाई देता है। “शब्द की हथेलियों में”, “एक सूर्य मेरे भीतर”, “बसंत के इंतजार में”, “अनहद का निनाद”, “मौन को कहाँ विराम” जैसी कृतियाँ उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की विविध छवियाँ प्रस्तुत करती हैं।

शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और प्रादेशिक सम्मानों से अलंकृत किया गया है। परंतु उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद वह पीढ़ी है, जिसे उन्होंने शिक्षा, शोध और साहित्य की दिशा दी है।

आज का यह आयोजन केवल एक पुस्तक या एक साहित्यकार का परिचय नहीं है, बल्कि उस सृजन-यात्रा का उत्सव है, जिसने शब्दों को संस्कृति से, साहित्य को समाज से और शिक्षा को जीवन-मूल्यों से जोड़ने का सतत प्रयास किया है।

आइए, हम सभी आदरणीया डॉ. पद्मा सिंह का हार्दिक स्वागत करते हुए उनके साहित्यिक अनुभवों, चिंतन और सृजन-दृष्टि को सुनने और समझने का सौभाग्य प्राप्त करें।

साहित्यिक साक्षात्कार डॉ. पद्मासिंह
आपका व्यक्तित्व केवल एक साहित्यकार का नहीं, बल्कि एक विचारक, शिक्षाविद्, सांस्कृतिक संवाहक और भाषा-साधक का है।

प्रश्न {1}—-
आपके साहित्यिक और शैक्षणिक जीवन की प्रारम्भिक प्रेरणाएँ क्या थीं? बचपन और पारिवारिक परिवेश ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार आकार दिया?

उत्तर{1}—
मेरे साहित्यिक और शैक्षणिक जीवन की प्रारम्भिक प्रेरणाएँ मेरा स्वंय पर भरोसा है। मानवता पर मेरी गहन आस्था है और मेरे मन में भारतीय सांस्कृतिक चेतना, पारिवारिक संस्कार और ज्ञान के प्रति गहरा सम्मान है। पारम्परिक रूढ़िवादी राजपूत परिवार में मेरा बचपन बीता। जब संयुक्त परिवार की परम्पराएँ, रिश्ते नाते और सामाजिक बंधन प्रभावित करते हैं तब संवेदनात्मक स्तर पर चिंतन शुरु होता है। पुरुष प्रधान समाज में लड़के लड़की का भेद था, धार्मिक मूल्यों का वातावरण था, नैतिक मूल्यों पर गहन आस्था थी। ऐसे समय में आरंभ में शब्द मेरे लिए सामाजिक विषमताओं के प्रति आक्रोश को अभिव्यक्त करने का माध्यम थे मगर बाद में वे जीवन को समझने का माध्यम बनते गए। मुझे सदैव यह अनुभव हुआ कि शिक्षा केवल सूचनाओं का संचय नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर आत्मविश्वास, विवेक, करुणा और जीवन दृष्टि का निर्माण करती है। इसी कारण अध्ययन मेरे लिए परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहा, वह आत्मविकास की निरंतर प्रक्रिया बन गया। बचपन में लोकजीवन, प्रकृति, सामाजिक विषमताएँ और स्त्री जीवन के गहरे अनुभवों ने मेरे संवेदनात्मक संसार को बहुत गहराई से प्रभावित किया। बाद में वही अनुभूतियाँ कविता, कहानी, आलोचना और आध्यात्मिक चिंतन के रूप में अभिव्यक्त होती गईं। मेरे व्यक्तित्व में यदि संवेदना, अनुशासन, कर्मनिष्ठा और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है, तो उसका आधार मेरे पारिवारिक संस्कार और भारतीय ज्ञान-परंपरा से मिला आत्मिक जुड़ाव ही है। जीवन मूल्यों में मेरी गहरी आस्था है।

प्रश्न—{2.}
आपने हिन्दी भाषा को नई तकनीक और वैश्विक दृष्टि से जोड़ने का जो कार्य किया, उस समय सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या थीं?

उत्तर-{2}- —
जब मैंने हिन्दी भाषा को नई तकनीक और वैश्विक दृष्टि से जोड़ने का प्रयास प्रारम्भ किया, तब परिस्थितियाँ आज जैसी अनुकूल नहीं थीं। उस समय हिन्दी को मुख्यतः भावनात्मक और साहित्यिक भाषा मानने की प्रवृत्ति अधिक थी, जबकि मैं उसे ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संवाद की समर्थ भाषा के रूप में देखती थी। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में “तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनशाला” के माध्यम से प्रयोजनमूलक हिन्दी, अनुवाद विज्ञान का अध्ययन, विदेशी भाषाओं फ्रेंच,जर्मन तथा भाषा प्रयोगशाला की स्थापना का उद्देश्य यही था कि भाषा को समय की बदलती आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि लोगों की सोच कैसे बदली जाए। उनमें यह विश्वास जगाना आवश्यक था कि हिन्दी आधुनिक ज्ञान-विमर्श की भाषा भी बन सकती है। मुझे यह भी लगता था कि यदि भारतीय भाषाएँ आधुनिक तकनीक से नहीं जुड़ेंगी, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी भाषायी अस्मिता से दूर हो जाएँगी। आज जब हिन्दी डिजिटल संसार में एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है, तब संतोष होता है कि मेरा वह संघर्ष केवल संस्थागत प्रयास नहीं था, बल्कि भाषा की अस्मिता और भविष्य की रक्षा का भी प्रयास था।

प्रश्न{3.}—
आपकी कविताओं में संवेदना, संघर्ष, स्त्री-चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का सशक्त स्वर दिखाई देता है। क्या यह आपकी निजी अनुभूतियों से उपजा है?

उत्तर{3}—-
-साहित्य केवल कल्पना का संसार नहीं होता; वह जीवन के गहरे अनुभवों, सामाजिक यथार्थ और अंतर्मन की संवेदनाओं से निर्मित होता है। मेरी कविताओं में जो स्त्री-चेतना, संघर्ष और सांस्कृतिक अस्मिता दिखाई देती है, वह मेरे व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ समाज और समय के व्यापक यथार्थ से भी उपजी है। एक स्त्री, शिक्षाविद् और साहित्यकार के रूप में मैंने जीवन के अनेक रूप देखे हैं—मौन पीड़ाएँ, संघर्ष, उपेक्षाएँ, लेकिन साथ ही अद्भुत धैर्य, सृजनशीलता और जिजीविषा भी। मेरे लिए स्त्री-विमर्श केवल प्रतिरोध का प्रश्न नहीं है; वह आत्मसम्मान, अस्मिता और सृजनधर्मिता का प्रश्न है। इसी प्रकार सांस्कृतिक अस्मिता मेरे लिए अतीत का मोह नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से संवाद बनाए रखने की चेतना है। आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जुड़ी रहे।

प्रश्न{4.}—
“हवा में तैरते दर्द के खामोश अफसाने” जैसे शेरों में गहरी मानवीय पीड़ा दिखाई देती है। आपके लेखन में दर्द और आशा का यह संतुलन कैसे बनता है?

उत्तर{4}—
मनुष्य का जीवन केवल उपलब्धियों का इतिहास नहीं, बल्कि संघर्षों, विडंबनाओं और मौन पीड़ाओं की भी यात्रा है। मेरे लेखन में जो दर्द दिखाई देता है, वह केवल व्यक्तिगत अनुभूति नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक संवेदना का विस्तार है। मैंने हमेशा महसूस किया है कि आधुनिक जीवन में मनुष्य बाहरी रूप से जितना सफल दिखाई देता है, भीतर से उतना ही अकेला और विखंडित भी होता जा रहा है। यही अनुभव मेरे शेरों और कविताओं में बार-बार अभिव्यक्त होता है। किन्तु मैं वेदना, पलायन और निराशा की लेखक नहीं हूँ। मुझे मनुष्य की अंत:शक्ति, उसकी जिजीविषा और पुनर्निर्माण की क्षमता पर विश्वास है। फीनिक्स पक्षी की तरह मैं पीड़ा की अग्नि में राख बन कर बार बार नया रूप लेकर उठ खड़ी होती हूँ यही मेरा वास्तविक परिचय भी है। मेरे लिए साहित्य का उद्देश्य केवल अंधकार का चित्रण करना नहीं, बल्कि उस अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना है। शायद इसी कारण मेरी रचनाओं में दर्द के साथ आशा का एक शांत लेकिन गहरा स्वर हमेशा उपस्थित रहता है।

प्रश्न -{5.}—
आपने शिक्षा, प्रशासन, शोध और साहित्य—इन सभी क्षेत्रों में समान सक्रियता बनाए रखी। समय और ऊर्जा का यह संतुलन कैसे संभव हुआ?

उत्तर{5}—
मेरे लिए शिक्षा, शोध, प्रशासन और साहित्य अलग-अलग क्षेत्र नहीं रहे; वे सभी एक ही व्यापक सांस्कृतिक और बौद्धिक साधना के विविध आयाम रहे हैं। शिक्षा ने मुझे युवा समाज से जोड़ा, शोध ने चिंतन की गहराई दी, प्रशासन ने मानव स्वभाव की परख करना सिखाया, संगठन और नेतृत्व की दृष्टि विकसित की, और साहित्य सृजन ने मेरी मानवीय करुणा और संवेदना को जीवित रखा। मेरे लिए कार्य केवल दायित्व नहीं रहा। इसे मैंने जीवन-की चुनौती माना। कामकाजी स्त्री की परिवार, पतिऔर बच्चों के प्रति हर तरह की जिम्मेदारी होती है और सामाजिक सम्बंधों का निर्वाह भी करना पड़ता है। खुद को सिद्ध करने का जुनून होता है, इसी कारण सभी के बीच समय का संतुलन कठिन नहीं लगता। विश्वविद्यालय में नए पाठ्यक्रम प्रारम्भ करना, शोधार्थियों का मार्गदर्शन करना, हिन्दीभाषा की कम्प्यूटर प्रयोगशाला की स्थापना करना, विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्ययनपरिषद की अध्यक्ष रहकर मालवी भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल कराना मेरे कर्तव्य था। नौकरी के साथ ही मैं विगत 50 वर्षों से “श्रीमध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति” जैसी 116 साल पुरानी हिन्दी सेवी संस्था से जुड़ी हुई हूँ साहित्यमंत्री रहकर मेरा यही लक्ष्य है कि अधिक से अधिक लोगों को हिन्दी साहित्य से परिचित कराऊँ और हिन्दीभाषा में लेखन की ओर प्रेरित करूँ। लिखना मेरे लिए साँस लेने जैसा है। यही मेरे जीवन की साधना के विविध रूप हैं। मेरा तो यह मानना है कि, हमारी सक्रियता का आधार बाहरी महत्वाकांक्षाएँ नहीं, बल्कि भीतर की प्रतिबद्धता और कर्म के प्रति निष्ठा होती है।

प्रश्न{6.}—-
मालवी भाषा और साहित्य को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल कराने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली? क्षेत्रीय भाषाओं के भविष्य को आप किस दृष्टि से देखती हैं?

{6}उत्तर—-
मालवी भाषा मेरे लिए केवल एक बोली नहीं, बल्कि मालवा की सांस्कृतिक आत्मा है। लोकभाषाएँ किसी क्षेत्र की स्मृति, संवेदना और जीवन-दृष्टि को अपने भीतर संजोए रखती हैं। मुझे सदैव यह चिंता रही कि यदि क्षेत्रीय भाषाओं को शैक्षणिक और बौद्धिक स्तर पर सम्मान नहीं मिलेगा, तो हमारी सांस्कृतिक विविधता धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगी। इसी सोच के साथ मालवी बोली एवं साहित्य को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराया और “मालवी भाषा और साहित्य” पुस्तक का सम्पादन किया।
मैं मानती हूँ कि वैश्वीकरण के समय में स्थानीयता का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। जो समाज अपनी लोकभाषाओं और सांस्कृतिक जड़ों से कट जाता है, वह धीरे-धीरे आत्मिक रूप से रिक्त होने लगता है। क्षेत्रीय भाषाएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक ऊर्जा भी हैं और भाषा की ताकत भी स्थानीय बोलियाँ और साहित्य ही है।

प्रश्न{7.}—-
वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य किस दिशा में जा रहा है?
क्या आपको लगता है कि नई पीढ़ी साहित्य से दूर हो रही है या नए रूप में उससे जुड़ रही है?

{7}उत्तर—
मुझे लगता है कि हिन्दी साहित्य आज परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। नई पीढ़ी साहित्य से दूर नहीं हुई है, बल्कि वह नए माध्यमों और नए सरोकारों के साथ साहित्य से जुड़ रही है। डिजिटल माध्यमों ने अभिव्यक्ति के अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन साथ ही गहराई और धैर्य का संकट भी उत्पन्न किया है। साहित्य केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि चिंतन और आत्ममंथन की प्रक्रिया है। आज का हिन्दी साहित्य स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, पर्यावरण, लोक-संस्कृति, राजनीति, धर्म और वैश्विक लिप्साओं से उपजे मानवीय संकटों जैसे विषयों पर गंभीरता से विचार कर रहा है, जो सकारात्मक संकेत है। किन्तु मैं यह भी मानती हूँ कि साहित्य को अपनी भाषिक गरिमा, संवेदनात्मक ऊँचाई और मानवीय मूल्यों को बनाए रखना होगा, तभी वह दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ सकेगा।

प्रश्न{8.}—
एक महिला शिक्षाविद् और साहित्यकार के रूप में आपके संघर्ष और उपलब्धियाँ आने वाली पीढ़ी की महिलाओं को क्या संदेश देती हैं?

उत्तर{8}—
मैं मानती हूँ कि स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसकी शिक्षा, उसकी संवेदनशीलता और उसका आत्मविश्वास है। मुझे बी.ए. एम. ए. पीएच. डी. सब डिग्रियां विवाह के बाद मिलीं। मैने दो बेटियों के साथ आत्मनिर्भर होने का कठिन संघर्ष अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बना लिया था। मेरा अनुभव है कि यदि स्त्री अपने भीतर की शक्ति को पहचान ले, तो वह केवल स्वयं को ही नहीं, समाज को भी दिशा दे सकती है। मेरे जीवन की उपलब्धियाँ किसी व्यक्तिगत सफलता का परिणाम मात्र नहीं हैं; वे निरंतर श्रम, आत्मविश्वास और अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम हैं। मैं नई पीढ़ी की महिलाओं से यही कहना चाहूँगी कि वे अपनी पहचान स्वयं निर्मित करें, अपने विचारों पर विश्वास रखें और संवेदना को अपनी शक्ति बनाए रखें। स्त्री केवल सहनशीलता की प्रतीक नहीं, बल्कि सृजन और परिवर्तन की भी आधारशिला है।

प्रश्न{9. }—–आपने अनेक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है। आज के शोध और अकादमिक लेखन की गुणवत्ता को लेकर आपकी क्या राय है?

उत्तर{9}—
आज शोध के क्षेत्र में अवसर बहुत बढ़े हैं, लेकिन गंभीरता और मौलिकता की चुनौती भी उतनी ही बढ़ी है। तकनीकी संसाधनों ने सामग्री तक पहुँच आसान बना दी है, परंतु शोध केवल सूचना-संग्रह नहीं होता; वह दृष्टि, विवेक और आलोचनात्मक चिंतन की प्रक्रिया है। मैंने अपने शोधार्थियों को सदैव इसके लिए प्रेरित किया है कि वे शोध को केवल उपाधि प्राप्त करने का माध्यम न मानें, बल्कि ज्ञान-परंपरा में सार्थक योगदान देने की साधना के रूप में देखें। भाषा की शुद्धता, संदर्भों की प्रामाणिकता और चिंतन की मौलिकता—ये तीनों किसी भी गंभीर शोध की आधारभूमि हैं। मुझे लगता है कि आज शोध को पुनः मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की आवश्यकता है।

प्रश्न {10.} —साहित्य आपके लिए क्या है—अभिव्यक्ति, साधना, समाज परिवर्तन का माध्यम, या आत्मसंवाद? और आने वाले समय में आप किन साहित्यिक योजनाओं पर कार्य करना चाहेंगी?

उत्तर{10}—
मेरे लिए साहित्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मसंवाद, समाज-संवाद और जीवन-साधना का समन्वित रूप है।
साहित्य मनुष्य को भीतर से अधिक संवेदनशील, अधिक मानवीय और अधिक सजग बनाता है। मेरे लेखन में सदैव यही प्रयास रहा है कि शब्द केवल सौंदर्य का निर्माण न करें, बल्कि मनुष्य की चेतना को भी स्पर्श करें। मैं मानती हूँ कि जब समाज में संवाद कम होने लगता है, तब साहित्य मनुष्यता की रक्षा का कार्य करता है। आने वाले समय में मेरी इच्छा है कि भारतीय भाषाओं, लोक-संस्कृति, स्त्री-अनुभव और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े विषयों पर और गंभीर कार्य करूँ। साथ ही नई पीढ़ी को साहित्य, भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहूँगी। आदरणीय ऋतुजी आज आपने मुझे अपनी बात कहने का अवसर दिया इसके लिए आपका आभार व्यक्त करती हूँ।

आज का यह साहित्यिक संवाद केवल एक रचनाकार से भेंट नहीं था, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व के विचारों से साक्षात्कार था जिसने शिक्षा, संस्कृति और साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाया। डॉ. पद्मा सिंह की रचनात्मक यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समाज और समय से संवाद की सशक्त प्रक्रिया है। उनके अनुभव, उनकी दृष्टि और उनकी साहित्य-साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। हम सभी की ओर से आदरणीया डॉ. पद्मा सिंह का हार्दिक अभिनंदन एवं आभार। साथ ही इस आयोजन को सफल बनाने वाले सभी साहित्यप्रेमियों, अतिथियों एवं आयोजकों का भी धन्यवाद।

इसी विश्वास के साथ कि शब्दों की यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहेगी, ऐसी कामना करती हूँ।

नमस्कार। धन्यवाद।

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