दिन विशेष विमर्श में डॉ. धनंजय कुमार की कविताएँ
अमेरिका के विश्व बैंक से सेवानिवृत्त, मास्टर योग शिक्षक और चिकित्सक, लेखक, कवि, नाटककार, सार्वजनिक वक्ता एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं डॉ. धनंजय कुमार। उनकी कविताओं के शब्द सहज हैं और उनमें छिपे अर्थ बहुआयामी हैं। उनकी भाषा सरल लेकिन कथन गहन है। बच्चों को बुद्धिमान, रचनात्मक, स्वस्थ और तनावमुक्त बनाने के लिए उन्होंने प्रज्ञार्थी ट्रस्ट की स्थापना की है। पाँच महाद्वीपों के 50 से अधिक देशों की यात्रा करने वाले वे एक दर्जन से अधिक पुस्तकों के रचयिता हैं। – स्वरांगी साने

हो सकता हूँ
अतिशय में एक दूक संतुलन हो सकता हूँ
मैं उतना हँसता हूँ, जितना रो सकता हूँ।
सृष्टि तुम्हारी टिकी हुई है एक बिन्दु पर
हर कण में प्रतिबिंब तुम्हारा घुला हुआ है
मेरा यह विस्तार संगठित हो जाने दो
मैं भी इन घेरों में अंकित हो सकता हूँ।
तुम मेरी परिभाषा मैं तेरा उदाहरण
खुली पलक पर लेकिन सिमटा है अंधापन
लौह मेरी निष्ठा का मन पर गिर जाने दो
तब मैं भी चुंबक के उन्मुख हो सकता हूँ।
आज रचयिता और रचना का संगम होगा
व्यक्त हुआ जाता है दोनों का अपनापन
बसी हुई जैसे सुगंध तेरी फूलों में
मैं अपनी कविता में शामिल हो सकता हूँ।
मै जितना हँसता हूँ उतना रो सकता हूँ।
नदी के दो टुकड़े
कैसा है यह नाता
नदी का किनारों से
हर पल यह मेल-जोल
कारण का परिणाम से।
जब किसी पुल पर
रुक जाता हूँ मैं
हो जाते हैं नदी के दो टुकड़े
एक मेरी ओर आता हुआ
एक मुझसे दूर जाता हुआ।
यह पल और यह पुल
सदा साथ लिये चलता हूँ
और यूँ ही बिखर जाता है
टुकड़ों में
हर प्रवाह, हर बहाव
शायद यही है देन
दृष्टि की और मन की।
