दूर तक फैला हुआ एकान्त : विज्ञान व्रत

दूर तक फैला हुआ एकान्त
साथ में बैठी हुईं तनहाइयाँ

शब्द ने तोड़े सभी अनुबन्ध
चुप्पियों की आ रही है गन्ध
दूर तक फैला हुआ एकान्त
और गहरी हो गयीं गहराइयाँ

मौन क्यों आ गया आभास में
रेत झरने लगा विश्वास में
दूर तक फैला हुआ एकान्त
क्यों ठगी सी लग रहीं सच्चाइयाँ

ऊँघता वातावरण है क्लान्त
भ्रान्ति में डूबी हवा है शान्त
दूर तक फैला हुआ एकान्त
तैरती हैं मौन की परछाइयाँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »