डॉ. के. जयलक्ष्मी के आलेख में ‘रामचरितमानस’ : विश्व मानवता का पथप्रदर्शक
भारतीय संस्कृति सदैव से विश्व कल्याण, मानवता और समरसता की वाहक रही है। वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे आदर्शों ने भारतीय चिंतन को वैश्विक पहचान प्रदान की है। इसी सांस्कृतिक चेतना का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में दिखाई देता है, जो केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव मूल्यों का विश्वव्यापी घोषणापत्र है।
आज जब वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और तकनीकी युग के प्रभाव से मानवीय संबंधों में दूरी बढ़ रही है, तब रामचरितमानस समाज को प्रेम, त्याग, कर्तव्य और मर्यादा का संदेश देता है। इसमें वर्णित पात्र केवल कथा के पात्र नहीं हैं, बल्कि आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। श्रीराम आदर्श पुत्र, आदर्श शासक और आदर्श मानव के रूप में सामने आते हैं, वहीं भरत, लक्ष्मण, सीता, कौशल्या और उर्मिला जैसे पात्र पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों की स्थापना करते हैं।
रामचरितमानस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मानवीय दृष्टि है। तुलसीदास ने जाति, कुल और धन से ऊपर उठकर मानवता को सर्वोच्च स्थान दिया है। निषादराज गुह, शबरी और विभीषण जैसे पात्रों के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य की महानता उसके कर्म और चरित्र से निर्धारित होती है, न कि उसके जन्म से। यही कारण है कि मानस सामाजिक समरसता और समानता का अद्भुत संदेश देता है।
वर्तमान समय में संयुक्त परिवारों का विघटन और संबंधों में बढ़ती कटुता चिंता का विषय है। ऐसे में रामचरितमानस पारिवारिक सौहार्द और आत्मीयता को पुनर्स्थापित करने का मार्ग दिखाता है। इसमें माता-पिता के प्रति सम्मान, भाईचारे की भावना, पति-पत्नी के आदर्श संबंध तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व का सुंदर चित्रण मिलता है।
मानव जीवन में परोपकार, करुणा, दया और लोककल्याण जैसे मूल्यों का विशेष महत्व है। रामचरितमानस इन मूल्यों को जीवन का आधार मानता है। श्रीराम का संपूर्ण जीवन लोकमंगल और परहित की भावना से प्रेरित दिखाई देता है। यही कारण है कि यह ग्रंथ आज भी समाज को नैतिक दिशा प्रदान कर रहा है।
रामचरितमानस की लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं है। म्यांमार, इंडोनेशिया, कंबोडिया, लाओस, चीन, सूरीनाम और नीदरलैंड जैसे अनेक देशों में इसके विभिन्न रूप और अनुवाद प्रचलित हैं। भारत की विभिन्न भाषाओं—तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम आदि—में भी रामकथा का समृद्ध साहित्य उपलब्ध है। यह इसकी सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता का प्रमाण है।
डिजिटल युग में भी रामकथा की प्रासंगिकता बनी हुई है। टेलीविजन धारावाहिकों, फिल्मों और एनिमेशन के माध्यम से नई पीढ़ी तक इसके आदर्श और मूल्य पहुँच रहे हैं। इससे युवा वर्ग भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों से परिचित हो रहा है।
आज जब विश्व आतंकवाद, हिंसा, भौतिकवाद और संबंधहीनता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब रामचरितमानस मानवता, प्रेम, करुणा और विश्वबंधुत्व का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा विकास केवल भौतिक उन्नति में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के संरक्षण में निहित है।
निस्संदेह, रामचरितमानस भारतीय संस्कृति का दर्पण और विश्व मानवता का पथप्रदर्शक ग्रंथ है। इसके आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने इसके रचना-काल में थे। मानवता के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में इसकी भूमिका सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

