विशेष विमर्श में डॉ. पद्मेश गुप्त का लेख – हिंदी अख़बारों में अंग्रेज़ी शब्दों के अनावश्यक प्रयोग : आवश्यकता, प्रवृत्ति और संतुलन
हिंदी के भविष्य को स्थायी आधार प्रदान करने के लिए डॉ. पद्मेश गुप्त का यह आलेख अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने इस आलेख में भारतीय समाचार-पत्रों में धड़ल्ले से प्रयोग की जा रही अंग्रेज़ी की शब्दावलियों पर अपनी गहरी चिंता जताई है और वह इस चिंता को हिंदी जगत में सर्वजनीन बनाने के लिए आकुल दिखाई देते हैं। उनका विरोध अंग्रेज़ी शब्दावलियों के प्रयोग से नहीं है; बल्कि, हिंदीभाषी जनों में उनके प्रति अनावश्यक और अनुचित आकर्षण से है।
डॉ. पद्मेश गुप्ता ऑक्सफ़ोर्ड यू. के. Padmeshgupta@gmail.com

हिंदी अख़बारों में अंग्रेज़ी शब्दों के अनावश्यक प्रयोग : आवश्यकता, प्रवृत्ति और संतुलन
मेरे जीवन में भाषा की समझ, शब्द-संपदा और अभिव्यक्ति के विकास में हिंदी अख़बारों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। बचपन में हमारे घर प्रतिदिन कई समाचार पत्र आते थे और मेरी माँ सुबह उठकर उन्हें आरंभ से अंत तक शब्दश: पढ़ती थीं।
इसके पीछे का स्वाभाविक कारण यह था कि मेरे नाना स्वर्गीय श्री कृष्ण चंद्र गुप्त सीतापुर से पाँच बार विधायक और नगर पालिका के अध्यक्ष रहे थे। दूसरी ओर, मेरे पिता स्वर्गीय डॉ. दाऊजी गुप्त मात्र इकतीस वर्ष की आयु में लखनऊ के महापौर निर्वाचित हो गए थे। स्वाभाविक था कि समाचार पत्रों में उनसे संबंधित समाचार नियमित रूप से प्रकाशित होते थे। माँ उन्हें बड़े गर्व के साथ पढ़तीं और हमें भी बुलाकर पढ़वातीं। उनके चेहरे पर झलकता आत्मगौरव और पढ़ने के प्रति उनका अनुशासन मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा था।
उनकी उसी प्रेरणा ने मेरे भीतर पढ़ने की आदत विकसित की। मैं प्रतिदिन समाचार पत्र पढ़ता, नए-नए शब्दों का अर्थ पूछता और उन्हें अपनी शब्दावली का हिस्सा बनाता। मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं था कि अख़बार हिंदी का है या अंग्रेज़ी का; हर नया शब्द मेरे लिए एक नई दुनिया का द्वार खोलता था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि मेरी भाषा, लेखन और चिंतन की नींव बहुत हद तक उन अख़बारों के पन्नों पर ही रखी गई थी।
शायद यही कारण है कि आज जब भारत में हिंदी के समाचार पत्रों को उठाता हूँ और उनमें अंग्रेज़ी शब्दों का बढ़ता तथा अनेक स्थानों पर अनावश्यक प्रयोग देखता हूँ, तो मन में अनेक प्रश्न जन्म लेते हैं। यह लेख उन्हीं प्रश्नों, उन्हीं चिंताओं और भाषा के प्रति उसी आत्मीय लगाव की अभिव्यक्ति है।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती; वह किसी समाज की संस्कृति, इतिहास, सोच और सामूहिक स्मृति की वाहक होती है। किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से नहीं आँकी जाती कि उसमें कितने विदेशी शब्द आ गए, बल्कि इस बात से कि वह अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए नए शब्दों और नए विचारों को किस संतुलन के साथ आत्मसात करती है।
आज भारत के अधिकांश हिंदी समाचार पत्रों को पढ़ते समय सहज ही यह प्रश्न मन में उठता है कि क्या हम वास्तव में हिंदी पढ़ रहे हैं या अंग्रेज़ी शब्दों से सुसज्जित हिंदी?
अधिकांश हिंदी अख़बारों की सुर्खियां कुछ इस प्रकार से प्रकाशित होती हैं:
“सीएम ने मेगा प्रोजेक्ट लॉन्च किया।”
“स्टार्टअप सेक्टर में इन्वेस्टमेंट बढ़ा।”
“मिनिस्टर ने नई पॉलिसी अनाउंस की।”
“स्टूडेंट्स के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू।”
ऐसे समाचारों में कई बार हिंदी केवल वाक्य विन्यास तक सीमित रह जाती है, जबकि शब्दावली का बड़ा भाग अंग्रेज़ी से लिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे हिंदी शब्दों का प्रयोग करने से समाचार आधुनिक नहीं रह जाएगा। विडम्बना यह है कि जिन शब्दों के लिए सरल, सुंदर और प्रचलित हिंदी शब्द पहले से ही उपलब्ध हैं, जैसे–उद्घाटन, निवेश, नीति, परियोजना, छात्र, पंजीकरण, घोषणा, संवाददाता, प्रवक्ता—उनकी जगह अंग्रेज़ी शब्द तेजी से लेते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल भाषायी परिवर्तन नहीं है; यह हमारी भाषायी मानसिकता का भी दर्पण है।
इसके पीछे अनेक कारण हैं। पत्रकारिता में अंग्रेज़ी माध्यम से आए पत्रकारों की संख्या बढ़ी है। डिजिटल मीडिया की तीव्र गति ने भाषा की शुद्धता की अपेक्षा गति को अधिक महत्त्व दिया है। बाज़ारवाद ने भी यह भ्रम पैदा किया है कि अंग्रेज़ी शब्द समाचार को अधिक आधुनिक और आकर्षक बना देते हैं।
लेकिन इस विषय पर चर्चा करते समय मैं केवल नकारात्मक पक्ष नहीं देखता हूँ। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होता कि हिंदी समाचार पत्रों ने अंग्रेज़ी शब्दावली को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें विद्यालय में अंग्रेज़ी शिक्षा का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। गाँवों और छोटे कस्बों के अनेक पाठक नियमित रूप से हिंदी समाचार पत्र पढ़ते हैं। जब वे बैंक, बजट, मोबाइल, ऑनलाइन, डिजिटल, मैनेजमेंट, इंटरव्यू, प्रोजेक्ट, ट्रेनिंग जैसे शब्द बार-बार पढ़ते हैं, तो अनायास ही उनकी अंग्रेज़ी शब्दावली समृद्ध होती जाती है।
इस दृष्टि से हिंदी समाचार पत्र करोड़ों लोगों के लिए अंग्रेज़ी शब्दावली की एक अनौपचारिक पाठशाला भी सिद्ध हुए हैं। शायद ही किसी भाषा ने दूसरी भाषा को लोकप्रिय बनाने में इतना बड़ा योगदान दिया होगा। इस कार्य में हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ध्वन्यात्मक प्रकृति और देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता रही है। हिंदी में सामान्यतः वही पढ़ा जाता है जो लिखा जाता है। इसलिए जब Computer को कंप्यूटर, Management को मैनेजमेंट, Registration को रजिस्ट्रेशन और Interview को इंटरव्यू लिखा जाता है, तो वह व्यक्ति भी उनका उच्चारण अपेक्षाकृत सही ढंग से कर लेता है जिसने कभी अंग्रेज़ी पढ़ी ही नहीं। यह देवनागरी लिपि की एक विलक्षण विशेषता है। अंग्रेज़ी की जटिल वर्तनी जहाँ नए शिक्षार्थियों के लिए कठिनाई उत्पन्न करती है, वहीं देवनागरी उस शब्द के उच्चारण को सरल बना देती है। अतः मेरा यह आग्रह है कि अंग्रेज़ी शब्दों के इस सीमित और व्यावहारिक प्रयोग का स्वागत देवनागरी में किया जाना चाहिए।
मेरा विरोध अंग्रेज़ी से नहीं, अनावश्यक अंग्रेज़ी से है। यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मुझे व्यक्तिगत रूप से अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोगों पर कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि, अनेक परिस्थितियों में मैं उसका समर्थक रहा हूँ। विशेषकर उन शब्दों का, जिनका हिंदी अनुवाद सामान्य पाठक के लिए सुविधा के बजाय असुविधा और भ्रम उत्पन्न करता है।
मेरा मानना है कि विज्ञान, तकनीक और आधुनिक जीवन से जुड़े जिन उपकरणों, तकनीकों या अवधारणाओं का आविष्कार जिस देश में हुआ हो और जिन्हें पूरी दुनिया उनके मूल नाम से पहचानती हो, उनका कृत्रिम अनुवाद करना व्यावहारिक नहीं है। मेरे विचार में भाषा का उद्देश्य संप्रेषण को सरल बनाना है, उसे कठिन बनाना नहीं।
उदाहरण के लिए AI, Computer, वेब, Internet, Email, Smartphone, Dishwasher, Social Media, Facebook, WhatsApp, Google जैसे शब्द अब केवल अंग्रेज़ी के शब्द नहीं रहे। वे विश्व की साझा शब्दावली का हिस्सा बन चुके हैं। यदि इनके लिए ऐसे हिंदी शब्द गढ़े जाएँ जिन्हें स्वयं हिंदीभाषी भी समझ न पाएँ, तो भाषा लोगों को जोड़ने के बजाय उनसे दूर कर देगी।
इतिहास पर नज़र डालते हुए मैं एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। टेलीफोन के आविष्कार के बाद Hello शब्द आज लगभग पूरे विश्व का अभिवादन बन गया। फ्रेंच ने उसे Allô (एलो) कहा, स्पेनिश ने Hola (ओला), लेकिन किसी ने उसका कृत्रिम विकल्प बनाने की आवश्यकता नहीं समझी। प्रत्येक भाषा ने उसे अपनी ध्वनि-व्यवस्था के अनुसार अपना लिया।
मैं मानता हूँ कि जीवंत भाषाएँ शब्दों को अपनाती हैं; उनसे डरती नहीं हैं।
अंतर कहाँ है?
समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ अंग्रेज़ी शब्द आवश्यकता नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा या फैशन का प्रतीक बन जाते हैं।
यदि नीति के स्थान पर हर बार पॉलिसी, निवेश के स्थान पर इन्वेस्टमेंट, उद्घाटन के स्थान पर लॉन्च, छात्र के स्थान पर स्टूडेंट, परियोजना के स्थान पर प्रोजेक्ट, संवाददाता के स्थान पर रिपोर्टर और पंजीकरण के स्थान पर रजिस्ट्रेशन ही लिखा जाएगा, तो धीरे-धीरे हिंदी की अपनी शब्द-सम्पदा पाठकों की स्मृति से विलुप्त होने लगेगी। भाषा केवल नए शब्द जोड़ने से समृद्ध नहीं होती; वह अपने पुराने शब्दों को जीवित रखने से भी समृद्ध होती है।
ब्रिटेन के अंग्रेज़ी समाचार पत्रों में हिंदी शब्दों के प्रयोग से सीखना चाहिए।
आज अंग्रेज़ी में Guru, Yoga, Karma, Mantra, Avatar, Pundit, Chai, Jungle, Bungalow, Shampoo, Pyjamas जैसे अनेक भारतीय मूल के शब्द पूरी सहजता से प्रयुक्त होते हैं। अधिकांश अंग्रेज़ीभाषी लोगों को यह भी ज्ञात नहीं कि ये शब्द भारत से आयातित हैं। किन्तु, अंग्रेज़ी ने इन शब्दों को अपनाकर अपनी मूल शब्दावली का स्थानापन्न नहीं बनने दिया। उसने विदेशी शब्दों का स्वागत किया, पर अपनी भाषायी पहचान को अक्षुण्ण रखा।
यही संतुलन हिंदी पत्रकारिता को भी अपनाना चाहिए। भाषा का भविष्य संतुलन में है। भाषा का भविष्य अपनी भाषा पर गर्व से है, सम्मान से है।
भाषाएँ कभी स्थिर नहीं रहतीं। वे निरंतर बदलती हैं, सीखती हैं और नए शब्द ग्रहण करती हैं। हिंदी स्वयं संस्कृत, प्राकृत, फ़ारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेज़ी से हजारों शब्द ग्रहण कर चुकी है। यही उसकी जीवंतता है। लेकिन प्रत्येक भाषा का आत्मसम्मान भी होता है।
यदि हम केवल इसलिए हिंदी शब्दों को छोड़ दें कि अंग्रेज़ी शब्द अधिक आधुनिक प्रतीत होते हैं, तो यह भाषा का स्वाभाविक विकास नहीं, बल्कि भाषायी असुरक्षा का संकेत होगा। आधुनिक होना और अपनी भाषा से दूर होना—दो अलग-अलग बातें हैं। मेरा आग्रह न तो अंग्रेज़ी के विरोध का है और न ही कृत्रिम हिंदी का। मैं ऐसी हिंदी का पक्षधर हूँ जो विश्व से संवाद भी करे और अपनी पहचान भी बनाए रखे।
जहाँ वैश्विक शब्दावली अपनाना आवश्यक हो, वहाँ उसे अवश्य अपनाइए। जहाँ अंग्रेज़ी शब्द करोड़ों हिंदीभाषियों को नई शब्दावली सिखाते हों, वहाँ उनका स्वागत कीजिए। लेकिन जहाँ सुंदर, सरल और सर्वमान्य हिंदी शब्द उपलब्ध हों, वहाँ केवल आधुनिक दिखने के लिए अंग्रेज़ी का अनावश्यक प्रयोग न कीजिए। समस्या अंग्रेज़ी शब्दों की नहीं है। समस्या उनके अनावश्यक प्रयोग की है। हिंदी पत्रकारिता को यह अंतर समझना चाहिए। उसकी भाषा अधिक आधुनिक भी होगी, अधिक समृद्ध भी, अधिक शिक्षाप्रद भी और सबसे बढ़कर—अधिक आत्मविश्वासी भी।
मेरा मानना है कि हिंदी को अंग्रेज़ी से कोई खतरा नहीं है। यदि कोई खतरा है, तो वह हिंदीभाषियों के अपनी ही भाषा पर घटते विश्वास से है। भाषा का विकास उधार के शब्दों से नहीं रुकता, लेकिन अपनी शब्द-सम्पदा को भूल जाने से अवश्य रुक जाता है। आवश्यक अंग्रेज़ी का स्वागत कीजिए, अनावश्यक अंग्रेज़ी से बचिए—शायद यही हिंदी पत्रकारिता के उज्ज्वल भविष्य का सबसे संतुलित मार्ग है।
चिंता करने वाला प्रश्न यही है कि क्या हम नई पीढ़ी को हिंदी अखबारों के माध्यम से अंग्रेजी की शब्दावली मज़बूत कर रहे हैं?
