दिव्या माथुर की कहानी : “सफ़रनामा”

दिव्या माथुर की ताज़ातरीन कहानी “सफरनामा” विशेषतया दो पात्रों नामत: अनूप वर्मा और विजया के बीच जीवन के विभिन्न आयामों को दर्शाती है, जो किसी व्यक्ति के जीए हुए अनुभवों के ताने-बाने की बुनावट जैसे लगते हैं। कहानी जीवन में प्रेम, विछोह और जीवन की जटिलताओं को समझने और सुलझाने के प्रयासों को रूपायित करती है। शुरुआत में ऐसा लगता है कि कहानी चरित्र-प्रधान होगी जिसमें अनूप अपने व्यक्तिगत जीवन से मोहग्रस्त-सा लगता है। चुनांचे, कथानक का विस्तार कुछ ऐसा होता है कि व्यक्तिगत जीवन की उलझनें व्यक्ति पर हावी होती हुई लगती हैं। दिव्या स्त्री-पुरुष दोनों प्रकार के पात्रों के मनोवैज्ञानिक स्वरूप को निखारने में सिद्धहस्त हैं। इस दिलचस्प कहानी को पढकर पाठक नि:संदेह भावोन्मत्त हो उठेगा। : मनोज मोक्षेंद्र

परिचय : सुश्री दिव्या माथुर, एफ़.आर.एस.ए. वातायन-यूरोप की संस्थापक, वातायनम् की प्रमुख संपादक, रौयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्स की फ़ेलो, आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक-सदस्य, ब्रिटिश-लाइब्रेरी और टेट मॉडर्न की ‘फ़्रेंड’, पद्मभूषण मोटुरी सत्यनारायण लेखन सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, आर्ट्स-काउन्सिल औफ़ इंग्लैंड के आर्ट्स-अचीवर सम्मान और हाल ही में नैशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर एवं विश्व हिंदी सचिवालय में मॉरीशस के प्रधान मंत्री द्वारा सम्मानित हैं। आपका लन्दन के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन मे अपूर्व योगदान रहा है। वह एक प्रतिष्ठित इंप्रेसारियो, बहु-पुरस्कृत लेखिका, उपन्यासकार, बाल पुस्तकों की अनुवादक और सम्पादक हैं; जिनके दस कहानी-संग्रह, आठ कविता-संग्रह, चार उपन्यास: ‘तिलिस्म’ और ‘शाम भर बातें’ (कई पाठ्यक्रमों में शामिल), मॉम, डैड और मैं (सहलिखित), बाल उपन्यास ‘बिन्नी बुआ का बिल्ला’ और आठ सम्पादित कहानी/काव्य संग्रह प्रकाशित हैं।
इनका नाम ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, आर्ट्स कॉउंसिल ऑफ़ इंग्लैण्ड की ‘वेटिंग-रूम’, ‘ऐशियंस हूज़ हू’, ‘सीक्रेट्स ऑफ़ वर्ड्स इंस्पिरेशनल वीमेन’ जैसे ग्रंथों में शामिल है। प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और संस्थाओं द्वारा आमंत्रित और सम्मानित, दिव्या जी की रचनाओं पर लगभग पचास शोध हो चुके हैं/हो रहे हैं। दूरदर्शन द्वारा आपकी कहानी, सांप सीढ़ी, पर एक टेली-फ़िल्म बनाई है। निखिल कौशिक द्वारा निर्मित ‘घर से घर तक का सफ़र: दिव्या माथुर’ को विभिन्न फिल्म-फ़ैस्टिवल्स में शामिल किया जा चुका है।

सफ़रनामा

दिल्ली-दूरदर्शन-केन्द्र के अतिथि-कक्ष में बैठा अनूप श्रीमती विजया भानु प्रताप सिंह की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था; थोड़ा-सा आशंकित था क्योंकि उनसे वह पहले कभी मिला नहीं था और न ही उसे उनका कोई चित्र मिल पाया था जिससे वह जान पाता कि वह कैसी दिखती होंगी; जवान, बूढ़ी, सुन्दर, बदसूरत, रौबदार अथवा नर्म। उसने विजया की कुछ रचनाएं अवश्य पढ़ डाली थीं ताकि साक्षात्कार के दौरान उनसे उपयुक्त, तर्कसंगत तथा रुचिपूर्ण प्रश्न कर सके।
अनूप वर्मा को एक प्रतिष्ठित भेंटकर्ता के रूप में जाना और माना जाता था। अमूमन कल्पना में तैयार की गई उसकी भेंटवार्ताएं यथार्थ रूप ले लेतीं और पसंद भी की जाती थीं। किंतु आज तो उसकी कल्पना भी जवाब दे गई थी। डेनमार्क से सीधे साक्षात्कार-कक्ष में पहुंचने वाली इस महिला को वह न जाने कितने परिधान पहना चुका था, उनके कितने ही केश-विन्यास बदल डाले थे, चेहरे बदल-बदल कर वह परेशान हो गया था; किंतु वह विजया को अब तक अपनी कल्पना में उतार नहीं पाया था।
कैसी होंगी ये देवी जी? अपने नाम की तरह फैली हुई, चतुर, प्रखर या गृहस्थ जीवन से उकताई हुई एक औसत महिला जो अपना ज़ायका बदलने के लिए दिल्ली आ रही थी! ऐसा न हो कि वह इस भेंट-वार्ता को चौपट ही कर डाले; अनूप की बनी-बनाई धाक मिट्टी में मिल जाएगी! थोड़ी जल्दी आ जाती तो बातचीत का कुछ मौका मिल जाता! घनिष्टता से की गई भेंटवार्ता श्रोताओं पर निस्संदेह गहरा और चिरस्थायी प्रभाव छोड़ती है!
सहकर्मी दिवाकरन ने अनूप को अपनी ओर से बहकाने की पूरी कोशिश की थी, उसे यह बताकर कि विदेशों में बसी भारतीय महिलाएं बड़ी बेबाक़ होती हैं। बिना किसी घनिष्ठता के वह एक अजनबी के साथ पीने बैठ जाएंगी और थोड़ा ही पीने के पश्चात उसके क़रीब आने लगेंगी! यदि अजनबी पीछे हटे तो उसका मज़ाक उड़ाएंगी कि वह दक़ियानूस हैं और कहीं वह पहल कर बैठे तो उसके गाल पर एक करारा थप्पड़ भी पड़ सकता है। दो साल अमेरिका में क्या गुज़ारे कि दिवाकरन अपने को विदेश के हर मामले का विशेषज्ञ मानने लगा था।
अनूप जानता था कि दिवाकरन की ये सब कल्पित कथाएं–अनूप से साक्षात्कार हड़पने की योजनाएं भर थीं! अनूप किसी भी हीन-ग्रन्थि से ग्रस्त नहीं होना चाहता था। तिस पर दूरदर्शन के निर्देशक, प्रजापति साहब का विशेष अनुदेश था कि अनूप इस भेंटवार्ता के दौरान सावधानी बरते; भला, सावधानी का भी कोई मापदंड होता ह! उन्होंने यह भी बताया था कि विजया भानुप्रताप सिंह दो जवान बच्चों की मां थीं और उनके पति सेंट स्टीफ़ेंस में श्रीमति प्रजापति के साथ पढ़ते थे। जब उन्होंने विजया की सिफ़ारिश की थी तो अनूप को विश्वास हो गया था कि यह जानी-मानी लेखिका उनकी तरह ही बोरिंग होगी।
दिवाकरन से अमेरिका और लंदन की रंगीन शामों की चर्चाएं सुन-सुनकर अनूप को हैरानी होती थी कि वहां की महिलाओं को शाम को घर से निकलने की फुर्सत भी कैसे मिल जाती थी? उनके पतियों और बच्चों का क्या होता होगा? रात-बेरात पबों में अजनबियों के साथ बैठकर पीना, नाचना-गाना और रात के अंतिम पहर में उठकर किसी के भी घर चल पड़ना। सुबह नींद खुलने पर इस बात का अहसास होना कि वह कौन था जिसके साथ उन्होंने रात ग़ुज़ारी थी।
अनूप वर्मा एक मध्यम परिवार का सरल नवयुवक था, जो हिंदी में पी-एच.डी। करते समय किसी कविता सहगल के सम्पर्क में आया था, जिसकी चाल-ढाल, शरीर से चिपकीं पोशाकें और बेबाक़-बयानी उसे कविता के क़रीब ले आई थीं। अपने परिवारों की हिदायतों के विरुद्ध जाकर वे दोनों शादी के बंधन में बंध गए थे। सीधे-सादे गोबर गणेश से दिखने वाले अनूप वर्मा के साथ अपनी इकलौती बेटी कविता का रिश्ता उन्हें बिल्कुल नहीं जंचा था किंतु जल्दी ही अनूप में उन्हें कविता की उंगलियों पर नाचने वाला घर-जंवाई अवश्य नज़र आ गया था. एक महीने के भीतर ही अनूप के मां-बाप चुपचाप अपने बड़े बेटे-बहू के पास बम्बई चले गए थे; न तो उनसे कविता की बढ़ती हुई बदतमीजियां सहन हुई और न ही वे अनूप को और अधिक शर्मिंदा होते हुए देख सकते थे। अनूप जल्दी ही किराये का मकान छोड़कर घर-जंवाई बनकर डिफेन्स कॉलोनी में स्थानान्तरित हो गया था। अपनी कोठी में पहुंचकर मानो कविता को पूर्ण स्वच्छन्दता मिल गई; टकराहटें बढ़ने लगीं। यह भी स्पष्ट हो गया कि अनूप ऐसा गोबर-गणेश भी न था, जैसा कि कविता और उसके मां-बाप समझ रहे थे; उसकी ख़ुद्दारी उनके आड़े आ रही थी। वे हमेशा बेटी का पक्ष ही लेते, चाहे वह कितनी ही ग़लत क्यों न हो; लगता कि जैसे वे अनूप को उसकी करनी की सज़ा दे रहे हों।
जब दूरदर्शन से पांच साल का अनुबंध मिला तो अनूप ने निज़ामुद्दीन में ही एक फ़्लैट किराये पर ले लिया। कविता ने वहां रहने के लिए भी साफ़ इन्कार कर दिया और अनूप ने राहत की सांस ली। न जाने कैसा रिश्ता था, जब टूटा तो लगा कि जैसे दोनों कहीं जुड़ गए। तलाक की कार्रवाई कविता की तरफ़ से शुरू हुई थी और अनूप को मानो उसका खोया अस्तित्व और स्वतंत्रता दोनों वापस मिल गए थे।
अनूप इतने गहन विचारों में डूबा था कि विजया के आने की आहट भी न सुन सका। अनूप की पार्श्व रूपरेखा को विजया कब से खड़ी निहार रही थी; वह हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ; उसके मुंह से अभिवादन तक न फूटा। चुलबुली नवयुवती सी विजया, अनूप की बौखलाहट पर खिलखिलाकर हंस पड़ी तो अनूप को विजया में वह महिला कहीं नहीं दिखी जिसका वह इंतजार करता रहा था।
“नमस्ते, आप अनूप ही है ना?” विजया की आंखों में शरारत थी। अनूप को लगा कि विजया से वार्तालाप करने का माध्यम एक ऐसी भाषा थी, जो इकतरफ़ा थी; जिसे अनूप समझ तो सकता था; जवाब नहीं दे सकता था।
“नमस्ते, विजया…जी,” उसके सूखे होंठ हिले।
“सिर्फ विजया चलेगा। वरना हमारा आधा समय एक दूसरे का पूरा नाम लेने और तख़ल्लुस लगाने में ही निकल जाएगा।” एक पारदर्शी मुस्कान, इस युवती पर विश्वास किया जा सकता है वाली अनुभूति।
“देखिए मैं पांच मिनट पहले ही पहुंच गई। कहीं दर्शकों को यह न लगे कि हम अभी-अभी ही मिले हैं, परिचित होना जरूरी है। है ना?” यह संवाद तो संभवतः अनूप का था।
“जी, धन्यवाद!”
कागज़ों का सहारा लेते हुए अनूप सहज होने का प्रयत्न कर रहा था; उसकी कल्पना को इतना धक्का लगा था कि वह चारों खाने चित्त था! विजया को महादेवी वर्मा का जामा पहनाकर अनूप आश्वस्त था और वह स्वयं को तैयार कर चुका था कि कैसे वह उन्हें आदर और श्रद्धा से सोफ़े पर बैठायेगा; बातचीत जल्दी ही ड्रैग होने लगेगी। मन में कहीं-न-कहीं एक वैराग्य की भावना भी उछल रही थी कि वह यह भेंट दिवाकरन को ही करने देता।
विजया का सरल व्यवहार, सादा पहनावा और ताज़ा खिले गुलाब सा चेहरा अनूप को चकित कर गया था। उसकी ख़बसूरती को शब्दों में ढालना अनूप को गुस्ताख़ी लग रही था!
“क्या सोच रहे हैं, ज़नाब?” विजया अधीर हो बोली तो वह वापिस पृथ्वी पर आया।
“माफ कीजिएगा, आज शायद मेरा दिन नहीं है, नौट माई डे,” इसके पहले कि वह कुछ और जोड़ पाता, स्टूडियो से बुलावा आ गया था।
“क्या-क्या पूछने जा रहे हैं आप मुझसे?” रास्ते में विजया चहकी। लगता ही न था कि वह इतना लंबा सफ़र करके चली आ रही थी।
“कुछ ख़ास नहीं, यह वाद-विषय मैंने तैयार किया था, आप देख लीजिए। कुछ जोड़ना-काटना चाहें तो बता दीजिएगा। मैं प्रसंग तैयार कर लूंगा। वह सहज हो उठा था! अनूप से पर्चा लेकर विजया ने एक सरसरी नज़र से उसे देखा और लौटा दिया!
“जैसा कि प्रजापति का निर्देश हुआ है कि बातचीत सिर्फ़ वर्तमान समाज में महिलाओं की स्थिति तक सीमित रहे, मैं आपके निजी जीवन या आपकी रचनाओं के बारे में कुछ नहीं पूछूंगा।”
“अरे नहीं नहीं, मेरा यह आशय क़तई न था!” वह अनूप को बीच में टोकते हुए बोली। “कार्यक्रम क्योंकि सिर्फ पंद्रह मिनट का है इसीलिए, मैंने सोचा कि एक विषय पर ही केन्द्रित रहें। बातचीत को उद्देश्यपूर्ण और रोचक बनाने के लिए आप कुछ भी पूछ सकते हैं, मुझे कहीं कोई आपत्ति नहीं।” सफ़ाई देती-सी विजया बोली।
रूमाल से अपने चेहरे को पोंछ, साड़ी की सलवटें सीधी करती विजया स्त्री-सुलभता से अपनी कुर्सी पर आ बैठी। निदेशक का इशारा हो चुका था।
अनूप ने विजया का औपचारिक परिचय दिया; अपनी नामवरी सुनकर, विजया सकुचा गई।
“नमस्ते विजया जी, भारत में क़दम रखते ही हम दूरदर्शन वाले आपको सीधे प्रसार-कक्ष में ले आए हैं, इसके लिए क्षमापार्थी हैं किंतु आपके तीन दिन के इस प्रवास में कहीं कोई गुंजाइश भी तो नहीं है। आपके लेख, कविताएं और कहानियां भारतीय जीवन का इतना सजीव वर्णन करते हैं कि लगता ही नहीं कि आप एक लंबे अर्से से विदेश में हैं। आप हमारे दर्शकों को कृपया बताएंगी कि क्या आप स्वयं भी उन झंझाओं से गुज़र चुकी हैं जिनसे एक आम स्त्री दो-चार होने को मजबूर है?”
अरे, ये प्रश्न तो कागज़ पर कहीं नहीं था। ख़ैर, अभिवादन स्वीकार करते हुए विजया निर्देशित कैमरे की ओर घूम गई।
“नमस्ते अनूप, दूरदर्शन के प्रत्येक दर्शक को मेरा भी प्यार-भरा नमस्कार! मैं तो यह भी नहीं जानती थी कि यहां लोग मुझसे परिचित हैं। जब आपके यहां से निमन्त्रण आया तो मैंने अपने पति से कहा कि दूरदर्शन वालों को अवश्य कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी। ख़ैर, बहुत उत्साह बढ़ा दिया, आपके निमन्त्रण ने मेरा। बचपन में मेरी एक अंतरंग सहेली थी ‘बिल्लो’ जिसके बहनोई व पिता ने मिलकर उसे ज़हर दे दिया था। उसके बहनोई ने उसे अपनी वासना का शिकार बना डाला था। वह तीन महीने के गर्भ से थी जब उसे ज़हर दिया गया। इज़्ज़त और दहेज़ बचाने का इससे उत्तम उपाय और क्या हो सकता था? कुछ गिरफ्तारियां हुई किंतु ले-देकर अभियुक्त छूट गए। यह घटना मेरे मस्तिष्क पर आज तक अंकित है। फिर मेरे पति के रिश्ते में भी एक दुर्घटना हुई। बचपन में उनकी आंखों के सामने उनकी बुआ जल मरी थीं; जिनके पति ने उन्हें दहेज़ की वजह से छोड़ दिया था।
विजया ने पानी पिया, वे दुःखद यादें उसे फिर से उद्वेलित कर गई थीं। अनूप को मानों सांप सूंघ गया था; क्या विजया भी किन्हीं भयंकर हादसों से ग़ुज़र चुकी होगी।
“फिर एक टीवी कार्यक्रम, जो डेन्मार्क व अन्य देशों में भी दिखाया गया था, हम सबको झकझोर के रख गया। इस फ़िल्म के ज़रिये भारतीय नारियों पर हो रहे अत्याचारों का खुला वर्णन किया गया था। दहेज़ की वज़ह से जला दी जाने वाली बहुओं के परिवारों की व्यथा हम सबको अंदर तक बेध गई। मन छटपटाने लगा। मेरे पति ने मुझे इतना उद्विग्न कभी नहीं देखा था। उन्होंने ही मुझे अन्ततः लिखने के लिए प्रेरित किया। भारत और लन्दन से मैं किताबें, समाचार-पत्र और पत्रिकायें नियमित रूप से मंगाने लगी। तब तक हम विदेशों में बसे भारतीयों, बी.बी.सी. व अन्य माध्यमों से मिली सूचनाओं को पूर्णतः पक्षपातपूर्ण समझते आए थे। वास्तविकता पर पर्दा डालकर हम समझते रहे कि भारत तरक्की कर रहा है, किंतु सच्चाई अब हम सब जानते हैं, कुछ और ही है।”
विजया के धारा-प्रवाह कथन के बीच अनूप उसे कहीं भी तो रोक नहीं पाया था। अब जैसे ही उसने लंबी सांस ली, वह मौका पाकर बोल उठा।
”विजया जी हम जानते हैं कि आप दो बच्चों की मां भी है। विदेशों में नौकर भी प्रायः नहीं रखे जाते, बताएंगी आप किस तरह लिखने का समय निकाल पाती हैं?”
“डेनमार्क जैसी ठंडी जगह में अधिक कुछ करने को नहीं होता। भाषा की जानकारी न होने के कारण मैं यूं ही कट गई थी; हफ़्ते में दो दिन डेनिश भाषा लिखने के लिए भी लंबा सफर तय करना पड़ता था, जिसके दौरान पढ़ना या लिखना अनिवार्य होता चला गया। घर के कामों में भी मेरे पति और बच्चे हाथ बंटाते हैं, यह वहां का रिवाज़ है। फिर वहां का वातावरण इतना निर्मल, मनमोहक और शांत है कि किसी का भी मन कविता कहने को लालायित हो जाए। ग्रीष्म काल में रात के दो बजे तक धूप निकली रहती हैं, सूरज निकला हो तो मैं नहीं सो सकती। सबसे बढ़िया बात तो ये है कि मेरे पति ही मेरे श्रोता, पाठक, समीक्षक और मेरे सबसे बड़े फ़ैन हैं,’’
अनूप ने देखा कि पति के ज़िक्र मात्र से विजया के गाल और कान तक लाल हो उठे थे।
“आपके पति के तो सचमुच दर्शन करने चाहिएं, अगली बार आप उन्हें अवश्य अपने साथ लाइएगा। एक प्रश्न और विजया जी, आपने अपने लेखों और कहानियों में पुरुषों का वर्णन सदा बेरहमी से किया है, ऐसा क्यों?” अनूप के मन में यह प्रश्न कुलबुला रहा था। इतना अच्छा पति मिलने के बावज़ूद विजया इतनी पुरुष-विरोधी क्यों थी?
“शायद आप मुझसे सहमत होंगे कि भारतीय पुरुष सामाजिक, मानसिक व व्यवहारिक स्तर पर वहीं का वहीं खड़ा है जहां वो सौ साल पहले था। संसार कहां से कहां पहुंच गया; महिलाओं ने हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर प्रगति की किंतु पुरुष प्रगति के नाम पर पढ़ी-लिखी नौकरी-याफ़्ता पत्नियों की तलाश में निकल पड़ा। किसी अन्य स्तर पर बदलने से उसे फायदा भी क्या था? चाहे पत्नी स्वयं दफ्तर से थकी आयी हो, पति चाहेगा कि वह शाम को जब लौटे पत्नी सजी-संवरी ताज़ा चाय का कप लिए मुस्कराती मिले। बच्चों को स्कूल से मिले होमवर्क करवाने में भी वे अचकचाता है। इन सबके बाद भी आज की नारी न तो अच्छी पत्नी साबित हो पाती है, न बहू और न ही एक अच्छी मां। सोने से पूर्व सास के पांव नहीं दबा पाई, ससुर के लिए कॉफ़ी बनाना भूल गई, बच्चों के कपड़े इस्तरी नहीं कर पाई, दफ्तर की ज़रूरी रिपोर्ट अधूरी छूट गई और सबसे अहम बात यह कि वह पति को ख़ुश नहीं कर पाई क्योंकि उसका दिमाग़ गृहस्थी के हज़ार कामों में अटका था।”
विजया ने अपने हाथ उठा दिए कि कहां तक गिनाए. पर, अनूप के बोलने से पहले ही फिर शुरू हो गई, “…और इस सेवा-टहल में कहीं व्यवधान आ गया, वह बीमार पड़ गई या कहीं ज़वाबतलबी कर बैठी तो पीहर भेज देने की धमकी और फिर पीहर वालों की ज़िल्लत। पति या उसके परिवार को कहीं दहेज़ का चस्का हो तो बेचारी जब तक जीवित रही, गनीमत है। हैरानी की बात यह है कि एक या दो बहुओं को सफलतापूर्वक जला चुकने के बाद भी हत्यारों को फिर रिश्ते मिल जाते हैं।”
अनूप को बीच में टोकना ही पड़ा।
“आप ठीक कहती हैं कि पुरुष वर्ग बदलना नहीं चाहता। इस दोष में बराबर की साझेदारी क्या महिलाओं की नहीं? अपने ही बेटों और भाइयों को बदलता देख वे ताने मार-मार कर उनका जीवन दूभर कर देती हैं–कि वह जोरु का गुलाम हो गया है, पत्नी की छोटी उंगली पर नाचता है इत्यादि…”

अनूप शरारत से मुस्कराया तो विजया का तमतमाया चेहरा धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। पारदर्शी मुस्कान लौट आई।
आंखों ही आंखों में विजया ने अनूप को वस्तुनिष्ठता बनाए रखने के लिए धन्यवाद दिया, ‘आप ठीक कहते हैं। दोष महिलाओं का भी है। जन्म से ही अगर लड़के-लड़कियों में भेद न किया जाए, लड़कों को बराबर का दायित्व दिया जाए, लड़कियों को बचपन से ही घुट्टी न पिलायी जाए कि उन्हें अपनी व्यथा कहने का कोई हक़ नहीं, बिना पति के पीहर में उनका स्वागत नहीं इत्यादि, तब कहीं जाकर हम इस समस्या का समाधान कर पायें किंतु अभी स्थिति नाज़ुक है। कष्ट पा रही हैं युवतियां जला दिये जाने पर भी मुंह नहीं खोलतीं, मायके वाले बेटी की शादी के बाद उसकी खोज-ख़बर नहीं लेना चाहते। पीहर से रिश्ता टूट जाता है और ससुराल से जुड़ता नहीं, लड़की अधर में जीती-मरती है।” विजया सांस लेने को रूकी ही थी कि अनूप को बीच में ही उसे रोकना पड़ा; समय हो चुका था।
“विजया जी, क्या हम आपसे आशा करते हैं कि भारत में आपके इस अल्प निवास के दौरान हमें कुछ नतीजे देखने को मिलेंगे?”
बहुत कुछ कहना सुनना शेष रह गया था। एक स्कूटर या एक कार के लिए एक असहाय लड़की पर इतने अत्याचार! विजया के दिमाग में अनकही बातें अब भी घुमड़ रही थी। उसकी आंखों में “क्यों” सीधे अनूप से ज़वाब मांग रहा था। दोनों को संयत होने में कुछ समय लगा। कैमरों को हटा दिया गया था। औपचारिक विदा तक न ले पाया था अनूप।
अनूप से विजया की भेंट-वार्ता सचमुच अनूठी थी, जिसमें उन सब प्रश्नों का कहीं उल्लेख न था जो वाद विषय में थे। विजया की आंखों में चमकती भावुकता मानो कह रही हो कि वह कमज़ोर या डरपोक नहीं, वह मांगें उठायेगी और चुप नहीं बैठेगी।
अनूप, मुझे एक कम चाय मिल सकती है?’ उसकी आवाज़ में एक बच्चे की सी ललक थी जो एक ग़ुब्बारा मांग रहा हो।
‘हाँ हाँ, क्यों नहीं? सामने ही एक छोटा-सा कैफ़े है या दूरदर्शन की कैन्टीन में ही बैठा जा सकता है।’ अनूप बेहद शर्मिन्दा था; उसे पहले ही पूछना चाहिए था।
‘आप सीधे हवाई अड्डे से चली आ रही हैं और…आप ठीक ही कहती हैं हम पुरुषों को इतना भी सलीक़ा नहीं; काम ही अधिक महत्व रखता है।’ वह सफ़ाई देने लगा।
‘महिलाओं के लिए तो शायद काम के अलावा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं पर एक समय ऐसा भी आता है जब वे भी एक कप की चाय की इच्छा कर बैठती हैं।’
अनूप का यह मतलब न था और न ही विजया का मन्तव्य; बात कभी-कभी यूं ही खिंच जाती है, आहत करती दायें, बायें। कैन्टीन में बैठे वे चाय पी रहे थे। विजया ने चाय के साथ कुछ भी लेने से इन्कार कर दिया था। जहाज़ में खाया हुआ ही हज़म नहीं हुआ था उसे शायद।
इन तीन दिनों में विजया क़रीब आधा दर्जन महिला-गोष्ठियों में भाग ले रही थी। इन गोष्ठियों को स्वयं महिलाएं ही उचित नहीं ठहरा रही थीं। कई आलोचकों ने तो यहां तक लिख डाला था कि ये गोष्ठियां समाज को भ्रष्ट कर रही थीं। वे नारी को रत्ती भर भी स्वतंत्राता देने के पक्ष में नहीं थे।
“मेरे विचार में यह भेंटवार्ता लोगों को पसन्द आई होगी।” अनूप ने विषय बदलना चाहा।
“मुझे जो कहना था, कह दिया। और समय मिलता तो और कहती, कहती चली जाती। जानते हो अनूप यह मेरा पहला अनुभव था। इन्होंने हिदायत दी थी ‘विजया, कुछ भी करना, रोना नहीं, चिल्लाना नहीं और मेज़ पर मुक्का तो बिल्कुल नहीं मारना।” दोनों हंसने लगे. स्टूडियों वापिस जाकर अनूप फ़िल्म का जल्दी से जल्दी सम्पादन करना चाहता था किंतु विजया आराम से चाय पी रही थी, जैसे उसे कहीं न जाना हो।
“अब क्या करें?” विजया के इस प्रश्न से अनूप सकपका गया; उसे दिवाकर की बात याद आई।
“मैंने तो सोचा था कि इंटरव्यू के बाद भी लोगों से बातचीत जारी रहेगी। यहां तो अभी से फ़्री हो गए, कहां जाएं अब?” विजया ने अपना प्रश्न दोहराया।
“इतने शौर्ट नोटिस में हुआ यह सब कि ऐसा कुछ प्रबन्ध न हो सका. और फिर आप थकी भी तो होगी?” अनूप हकलाते हुए बोला।
“अरे नहीं, मैं तो ज़रा नहीं थकी। भैया दफ़्तर के बाद मुझे दस बजे लेने आएंगे, यहां। आपका घर कहां है? कौन-कौन है वहां? वहां चलें या यहीं बैठें?”
एक ही सांस में इतने सारे प्रश्न? कहां से शुरू करे, क्या कहे या चुप ही रहे?
“मैं अकेला ही रहता हूं। सुबह एक बूढ़ी-अम्मां खाना बनाकर रख जाती हैं।’ उसने सोचा कि वार्तालाप को पूर्ण विराम लग चुका था, कितना ग़लत सोच रहा था अनूप।
“फैन्टास्टिक, तो चलो फिर तुम्हारा घर भी देख लेते हैं, एक घंटा गप्पे मारकर फिर यहां आ जांएगे।” निर्णय लिया जा चुका था; अनूप को विरोध करने का कोई कारण नहीं सूझा तो वह अपना दोपहिया लेकर आ गया।
“यह मेरे लिए नया अनुभव होगा। मैं कब से चाहती थी कि स्कूटर या मोटर साइकिल पर सफ़र करूं, आज मौका मिला।” यह प्रसन्न-मन से उसके पीछे बैठ गई।
अनूप के ज़हन में हज़ारों चिंताएं धक्का-मुक्की कर रही थीं। घर की हालत न जाने कैसी होगी? सुबह जल्दी में वह रात के कपड़े तक नहीं उठा पाया था; क्या सोचेगी विजया उलझे ऊन सा उसका फ़्लैट देखकर? कैसी लड़की…औरत है? जान न पहचान, मैं तेरा मेहमान। सब पर झट से भरोसा करने को आतुर। या कहीं दिवाकरन ठीक ही तो नहीं कह रहा था? बाप रे! बच्चु अब फंसे। कल प्रजापति साहब को विवरण तो देना ही होगा। नहीं नहीं, विजया ऐसी नहीं हो सकती, फिर क्यों चल दी?
“क्या सोच रहे हो, अनूप?”
“कुछ नहीं”, उसकी झूठ छिप न सकी।
“मुझे मालूम है।” वह नटखट लड़की-सी बोली!
“क्या?” अनूप के स्कूटर और हृदय दोनों की गति तेज़ हो गयी।
“यहीं कि मैं कैसे तुम्हारे साथ चल दी, है ना?” अनूप को काटो तो खून नहीं, क्या कहता?
“मेरे जानकर सूत्रों ने मुझे तुम पर सौ फ़ीसदी भरोसा करने की अनुमति दे रखी है। वैसे भी तुम्हें देखकर ऐसा नहीं लगता कि तुम मेरा पर्स ले उड़ोगे।” बेबाक़ी से हंसी विजया; सिटपिटा उठा अनूप।
घर में घुसते ही विजया सोफे पर अधलेटी-सी हो आई; अब उसे थकान लग रही थी। अनूप चाय बनाने रसोई में घुस गया। बीच-बीच में वह बिखरे कपड़े और बर्तन भी संवार रहा था। विजया ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। कमरे में टंगी तस्वीरें और बौंसाई पेड़ और पौधे अनूप की पसन्द ज़ाहिर कर रहे थे; छोटे से फ़्लैट को ख़ूबसूरती से सजाया गया था। जल्दी से उतारा हुआ पाजामा विजया की पीठ से नीचे से झांक रहा था। अनूप ताक में था कि विजया हिले तो वह उसे खिसकाकर पीछे की ओर गिरा दे। चाय हाथ में लेकर विजया ज़रा सीधी हुई ही थी कि अनूप ने पाजामें को सोफे के पीछे खींचा, नाड़ा ही आ पाया उसके हाथ में। विजया की नज़र पड़ी तो मानो उसे हंसी का दौरा पड़ गया; उसे देखकर अनूप भी हसंने लगा। इधर-उधर की बातें करते एक घंटा बीत गया।
“तुम्हारी खाना बनाने वाली नहीं आई?” विजया ने पूछा।
“कुछ बनाकर रख गई होगी किंतु आपको शायद अच्छा न लगे। दरियागंज के मोती महल में खा सकते हैं या साउथ एक्टैन्शन में भी अच्छे रेस्तरां हैं।” मन में सोचा अनूप ने कि हो गई 500-600 रुपयों की छुट्टी; महारानी घर भी जाएंगी कि नहीं?
“नहीं, नहीं, होटल-वोटल में नहीं; प्रताप भैया ने कहा था कि बाहर कहीं नहीं खाना। बस चाय पीना। वापिस दूरदर्शन भी पहुंचना है अब। ऐसा करते हैं हमारे घर चलते हैं क्यूं अनूप?”
“लाहौलविलाकुव्वत,” अनूप ने सोचा कि ये शब्द किसी ने ऐसे ही मौके पर बनाया होगा। इससे पहले के वह कुछ कहता, वह बोली,
“चलो, भैया को फोन कर देते हैं, अरे मैं तो भूल ही गई, पापा ने ज़रूर मेरी पसन्द का भुनवा मीट बनाया होगा, ख़ास तौर पर मेरे लिए। आप खिला देते तो भी पापा मार-मारकर दोबारा खिलाते। फ़ोन कर लूं?”
शुक्र है अनूप से पूछा तो हालांकि उसके ‘हां’ या ‘ना’ का विजया ने इंतजार नहीं किया था। फ़ोन पर सिर्फ चार वाक्य, “हम आ रहे हैं, मैं और अनूप, वही टीवी पर आपने जिसे मेरे साथ देखा होगा। खाना खत्म नहीं कर देना।” विजया को दोपहिए पर बैठा कर अनूप फिर निकल पड़ा।
घर पहुंचकर जो दोनों का स्वागत हुआ, अनूप उसे कभी नहीं भूलेगा। ऐसा लगा कि विजया का परिवार बहुत सारी विजयायें था। उन्मुक्त वातावरण मानो इंतज़ार कर रहा था, न जाने कब से शिकायत लिए कि वह पहले क्यों नहीं आया। सबने भेंट-वार्ता की तारीफ़ की। विजया अपनी मां और भाभी के साथ रसोई में घुस गई। पापा ताश का एक जादू दिखाने लगे। प्रताप भैया लेमनेड ले आये, हालांकि पापा व्हिस्की की बोतल निकाले बैठे थे। भाभी खाने की मेज़ पर प्याज़ के लच्छे में बारीक हरी मिर्च काट रही थीं, नमक डालकर जब उन्होंने नींबू निचोड़ा तो अनूप की भूख चमक उठी! प्रताप बैठा-बैठा लच्छे को पोदीने की चटनी में डुबोकर खाने लगा तो भाभी ने बरजा कि कम से कम मेहमान के सामने तो वह अपना व्यवहार ठीक रखें. छोटा भाई पापड़ लेकर आया तो अनूप भी पापड़ के टुकड़े पर चटनी और प्याज़ रखकर खाने लगा; उसका धैर्य जवाब दे चुका था। विजया भुनवा मीट का डोंगा लेकर आई, भाभी कुछ सब्जियां और रायता। अनूप ने शायद ही कभी इतना खाना खाया हो पर उसकी नीयत नहीं भर रही थी। तिस पर मम्मी ज़बरदस्ती उसकी प्लेट में चुपचाप रोटी रखे जा रही थीं कि शायद वह शर्मा रहा हो। ऊपर से ‘न, न, बहुत खा लिया’ करता हुआ वह मन ही मन प्रसन्न था। उसे अगली बार अपने मां-बाप को साथ लाने का न्यौता भी दे दिया गया था। उसने सोचा कि अब जा पाएगा तो न आएगा दोबारा। जब वह किसी तरह से उठ पाया तो देखा रात के बारह बज रहे थे और सब उसके रूक जाने का आग्रह कर रहे थे।
सुबह की पहली किरण आंखों पर पड़ी तो अनूप कूद कर उठ बैठा, मानो एक मीठा सपना देखा हो कल रात। यकायक उसने तय कर लिया कि वह विजया के सारे कार्यक्रम फिल्माएगा। यह फ़ैसला उसने विजया के आकर्षण की वजह से ही नहीं किया था। उसकी छोटी बहन मिन्नी की आकस्मिक मौत उसके दिल में खुली क़ब्र सी बिछी थी; जितने मुंह, उतनी बातें। अनूप उन दिनों अपने दोस्तों के साथ कश्मीर में था। रवाना होने से एक दिन पहले राखी थी। मिन्नी सिमटी सिमटाई आयी थी, उसकी आंख और होंठ सूजे थे, बताया कि वह सीढ़ियों से गिर गई थी। कोई चाहता तो बहुत कुछ जाना जा सकता था पर सब चुप रहे कि यह उसका निजी मामला था। जब अनूप वापिस लौटा तो मिन्नी को मरे दो दिन हो चुके थे। अंतिम समय तक वह यही कहती रही कि इसमें किसी का दोष न था। मां-बाप को मानो सांप सूंघ गया था। अनूप मन को समझाता आया था कि मिन्नी परिपक्व न थी, ढल नहीं पाई सुसराल के माहौल में…कि मिन्नी मां-बाबू की लाड़ली थी, सिर चढ़ा रखा था उन सबने…कि सचमुच ही एक दुर्घटना हो गई थी…कि लोग बात का बतंगड बना रहे थे। अपनी कायरता को छिपाने के लिए स्वंय से ही तर्क-वितर्क करता हुआ अनूप प्रत्यक्ष में कुछ न कर पाया था। मिन्नी के पति ने तीन महीने के भीतर ही जब दूसरी शादी कर ली थी तो अनूप ने सोचा था कि नयी दुल्हन को मिन्नी की कहानी बताने जाएगा पर सबने उसे रोक दिया था। अनूप अब शायद विज़या की यात्रा को फ़िल्माकर पश्चाताप करना चाह रहा था। विजया के झंझोड़ने के बाद एक नए सिरे से उसने सोचना शुरू किया था। काश! विजया पहले आ गई होती तो मिन्नी शायद जीवित होती।
जनकपुरी में एक भारी जलसे का आयोजन किया गया था जहां विजया का विधिवत स्वागत होने वाला था। अपने साथ हज़ारों महिलाओं को आह्नान देती; कई महिला संस्थाएं इस हेतु इकट्ठी हुई थीं। विजया की लेखनी ने न जाने कितने पाठकों को बींधा था, कचोटा था; उसके भाषण प्रभावशाली थे किंतु पुरुष तो पुरुष, महिला वर्ग भी उसकी आलोचना कर रहा था। वृद्ध महिलाओं को शक था कि वह समाज को भ्रष्ट करके रहेगी; किंतु नई पीढ़ी में उसका आदर था।
विजया और अनूप के पंडाल में कदम रखते ही हलचल मच गई; फूलों के हार हवा में लहराने लगे। शोरोगुल से बच्चे रोने लगे। विजया ने देखा एक नवयुवती अपने डेढ़-दो साल के बेटे को चुप कराने का असफल प्रयत्न कर रही थी। विजया भीड़ से लड़ती, रास्ता बनाती उस युवती तक पहुंची, पर्स से चाकलेट निकालकर बच्चे को देती हुई विजया उसका नाम पूछने लगी। युवती विस्फरित नेत्रों से विजया को देख रही थी मानो सपना देख रही हो। उसके हाथ में विजया का नया कहानी–संग्रह था जिसपर उसे विजया के ऑटोग्राफ चाहिए थे।
यह मानसी थी अपने बेटे अनन्त के साथ; भयभीत और क्लांत। जल्दी में विजया केवल यही जान पाई कि जब आज सुबह वह जनकपुरी आने के लिए घर से निकली थी तो सास ने उसे धमकी दी थी कि वह उसे वापिस घर में पांव नहीं रखने देंगी। विजया ने पूछा कि वह पीहर क्यों नहीं चली जाती। मानसी ने बताया कि उसका परिवार एक बड़ा संयुक्त परिवार है, वह उन्हें शर्मिन्दा नहीं करना चाहती। मंच से विजया को बार-बार बुलाया जा रहा था; जाते-जाते वह अनूप को निर्देश देकर गई कि वह मानसी और अनन्त का ध्यान रखे, कार्यक्रम के पश्चात् वह उनसे स्वयं बात करेगी किंतु अपने कैमरा-क्रू में उलझा हुआ अनूप चूक गया। वह एक पल के लिए भी कैमरा हटाता तो उसे लगता कि उसने विजया की एक महत्वपूर्ण मुद्रा खो दी। काश कि उसके पास दो कैमरामैन होते पर दूरदर्शन वालों ने उसे ही पूरा दिन यहां रहने पर भी आपत्ति की थी। वह तो प्रजापति साहब बीच में आ गए नहीं तो अनूप को छुट्टी लेकर निजी तौर पर यह फिल्म बनानी पड़ती।
इन सभाओं में विजया ने महिलाओं पर सीधे चोट की; उनसे सीधे पूछा कि वह स्वयं को प्रताड़ित करवा के भी कैसे चुप रहती हैं, मार खाके भी क्यों विरोध नहीं करतीं? अत्याचार से दबी लड़कियों-बहुओं के मां-बाप, भाई-बहिनों को लताड़ा कि वे जान-बूझकर क्यों अनजान बने रहते हैं? जानवर के बच्चे को भी छेड़ो तो वह काट खाता है; चिड़िया के अंड़ों को छूकर तो देखो, वह कैसे अपनी चोंच से आक्रमण करती है? तो क्या हम जानवरों से भी गए-बीते हैं? वह पति जो सुख-दुःख में साथ रहने की कसमें खाता है, कैसे अपनी अर्धांगनी को यन्त्रणा दे सकता है? और कौन हैं वे लोग जो जानते-बूझते अपनी लड़की को उस हत्यारे को देने को सौंपने को तैयार हो जाते हैं? मां-बाप निकम्मे लड़कों को भी तो खाना कपड़ा देते हैं, दो कौर लड़की को देने क्यों भारी पड़ते हैं उन्हें? पढ़ी-लिखी, नौकरी करती युवतियां तो कम से कम उदाहरण प्रस्तुत कर सकती हैं; उनकी देख-रेख में कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ लड़कियां भी अवश्य अपना जीवनयापन कर सकती हैं। क्यों अपमानित होती हैं? प्रताड़ित होकर और मार खाकर जीने से सड़क पर झाड़ू मारकर जीना अच्छा है। समाज क्यों नहीं गिरा देता ऐसे लोगों को अपनी नज़रों से? उसकी बातें शब्द सभाजनों के दिल में सीधे उतर गई थीं।
विजया का जोश, उसकी आशाएं, उसके सपने मानो सारी सभा के हो गए थे। चित्र-लिखित से लोग अपलक उसे सुन रहे थे। लग रहा कि जैसे कल से कोई ज़ुल्म न होगा। अनूप का कैमरा लगातार विजया की विभिन्न मुद्राएं कैद कर रहा था। लोगों की याददाश्त बहुत छोटी होती है। जब वह चली जाएगी तो शायद ये फिल्म ही लोगों को याद दिलाती रहेगी, विजया के उपदेश-निर्देश।
विजया का ध्यान मानसी में अटका था; भाषण के दौरान कई बार उसकी नज़रों ने मानसी को खोजा था। अनूप ने भी एक-दो बार मानसी और अनन्त के क्लोज़-अप लिए थे; किंतु, हर बार जब उन दोनों की नज़रें मिलतीं, अनूप शर्मिन्दा होकर कैमरा घुमा लेता था।
सभा समाप्त हुई तो विजया को पचासियों लोगों से मिलना था जो किसी न किसी प्रतिष्ठान से जुड़े थे। इसी भाग-दौड़ में मानसी और अनन्त कहीं गुम हो गए थे। पूरा पंडाल छान मारा, किन्तु उनका कहीं पता न चला। जिधर जाती, लोग उसे घेर लेते. विजया को लगा जैसे उसका उत्साह फीका पड़ गया हो। शायद, उसकी स्वावलम्बन और स्वाभिमान वाली बातों से घायल होकर मानसी शर्मिन्दा हुई हो। विजया ने अनूप से वादा लिया कि वह उन्हें ढूंढ निकालेगा।
“मानसी पढ़ी-लिखी दिखती है; कहीं नौकरी का बंदोबस्त कर देना, अनूप। जानती हूं आजकल नौकरी मिलना कोई आसान नहीं। सुनो! मेरा कुछ धन यहां स्टेट बैंक में बेकार पड़ा है, कुछ घर में ही काम शुरू करवा देना।” विजया ने अपनी चैक बुक निकाली और ख़ाली चेक पर साइन करके उसे थमाते हुई बोली, “डेढ़ दो लाख रुपये तो होंगे ही इसमें।”
“आप यह क्या कर रही हैं, थोड़ा-बहुत तो मेरे पास भी है, आप रखिए, आवश्यकता हुई तो मैं ज़रूर आपसे कह दूंगा।”
“नहीं अनूप, यह चेक तुम्हारे पास रहेगा तो मुझे तसल्ली रहेगी, तुम भी अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं रखोगे, भूल भी न पाओगे अपना वादा।”
अनूप को विश्वास था कि उसने मानसी और उसके बेटे को डा. कुलकर्णी के क्लिनिक में देखा था। शायद वह भोगल में ही कहीं रहती हो। विजया की भाभी ने मानसी का नाम सुना तो बोली, “अरे कहीं ये वही मानसी तो नहीं, जो हमारे साथ डिफैन्स कॉलोनी में पढ़ती थी। उसकी शादी पढ़ाई के दौरान ही एक भोगल के बड़े व्यापारी खानदान में हो गई थी।” जो नैन-नक्श भाभी ने बखाना वह मानसी का ही था। विजया को माना गड़ा हुआ ख़जाना मिल गया हो।
अनूप उसी रात डॉ. कुलकर्णी से मिलने गया। दोनों स्कूल में साथ पढ़े थे और अब भी अच्छे मित्र थे। उसने अनूप को बताया कि मानसी और अनन्त उसी दोपहर को उसकी क्लिीनिक पर आए थे। मानसी कह रही थी कि अनन्त सीढ़ियों से गिर गया था; उसके बदन पर जगह-जगह चोटें थीं। कुलकर्णी ने यह भी बताया कि जब तब वह मानसी की चोटों का इलाज भी वह करते रहे थे; पर, मानसी हमेशा यही कहती थी कि वह गिर गई थी। भाभी ने भी अपने किसी सहेली से पता लगवा लिया था कि मानसी और अनन्त अभी भोगल में ही होने चाहिए थे क्योंकि वे डिफैन्स कॉलोनी में नहीं थे।
अगले दिन, सुबह प्रताप भैया और भाभी अनूप के घर आए। विजया अपने ससुराल वालों से मिलने मेरठ गई हुई। एक फ़ूल-प्रूफ योजना बनाई गई; भाभी मानसी की सहेली बनकर जाएंगी और किसी बहाने से उसे घर से बाहर ले आएंगी। अनूप ने मानसी के घर का नम्बर घुमकार भाभी को चोंगा पकड़ा दिया। फ़ोन शायद मानसी की सास ने उठाया था; एक लठमार आवाज़ सुनाई दी, “हल्लो, कौन बोल रा है?”
“मैं मानसी की सहेली हूं, इंग्लैंड से आई हूं, क्या मानसी घर में है?” भाभी ने पूछा।
“ओ मन्सी, तेरी कोई सहेली है, देखियो ज़रा,” वह चिल्लाईं।
मानसी की घबराई आवाज़ सुनाई दी तो भाभी ने उसे सांत्वना दी, “सॉरी मानसी, मैं विजया जी की भाभी बोल रही हूं। वह तुम्हारे लिए बहुत परेशान हैं। यहां निज़ामुद्दीन में ही हैं हम सब; तुम ठीक तो हो ना?”
”हां, आप लोग कैसे हैं?” वह धीरे से बोली।
“हमसे मिलने आ सकोगी!”
“नहीं, अनन्त ठीक नहीं है।”
“हम तुमसे मिलने आएं? यानि कि मैं आऊं तो तुम्हारी सास रोकेगी तो नहीं?”
“नहीं।”
“अभी आ जाऊं?”
“हां,” पीछे से उसकी सास की बुड़बुड़ाहट सुनाई दे रही थी।
प्रताप, अनूप और भाभी उसी समय घर जा पहुंचे। कार को थोड़ी दूर खड़ी कर भाभी ने मानसी के घर की घंटी बजाई तो सास ने ही दरवाज़ा खोला।
“मैं मानसी की सहेली हूं; कहां है मानसी?” वह अंदर झांकते हुए बोली।
“अब्बी तूने ई फून किया था?” उन्होंने पूछा, “इत्ती जल्दी कैसे आ गई?”
“मैं निजामुद्दीन में जो थी, यहीं स्टेशन के पास।”
मानसी और अनन्त डरते-डरते आ खड़े हुए तो भाभी भागकर मानसी से गले मिलीं, अनंत के माथे पर टांके लगे हुए थे।
“कितनी बदल गई है तू? तबियत ठीक नहीं है क्या? और यह तेरा बेटा अनन्त? हेलो अनन्त।” भाभी ने एक चाकलेट का डिब्बा देते हुए उसे गोदी में बैठा लिया। मानसी ने चाय के लिए पूछा तो भाभी ने मना कर दिया।
“अम्माजी, क्या मैं इन्हें थोड़ी देर के लिए अपने घर ले जा सकती हूं?” भाभी ने समय व्यर्थ नहीं किया और अपने मतलब पर आ गई।
“हमें का मालूम, अपने घरवाले से पूछ के चली जाए। वैसे ही हमसे कौन पूछ के जाती है। कल गई थी न जनकपुरी, बिना हमसे पूछे।” वह बड़बड़ाने लगी।
“मैं एक-दो घण्टों में ही कार से घर छोड़ कर जाऊंगी, ठीक है?” भाभी ने फिर प्रार्थना की।
“ठीक है, कपड़े तो ढंग के पैन ले, लोग तो यई सोचेंगे न कि हम इसे ठीक से नई रखते…और सुन अनंत को साथ लेती जाए; ये बी गूम आएगा बाहर।” वह फिर कुड़कुड़ाईं।
मानसी और अनन्त कपड़े बदलकर नीचे आए तो भाभी झट से उन्हें बाहर ले आईं। अनूप को देखकर मानसी उद्वेलित हो उठी क्योंकि उसने भी कल मानसी की व्यथा सुनी थी। वह चुपचाप कार में बैठ गई। अनन्त को बीच में बिठाकर मानसी और भाभी पिछली सीट पर यूं घुल मिल गए जैसे बरसों से एक दूसरे को जानते हों।
अनूप के घर आकर सबने चाय पी! अनूप और प्रताप अनन्त को लेकर बाज़ार चले गए तो भाभी ने मानसी की कहानी सुनी। उसका पति मंगल न केवल शराबी कबाबी था, बल्कि वेश्याओं के पास भी जाता था। रात को आकर ज़रा-ज़रा सी बात पर उसे पीटने लगता था। अम्मां ने आते ही जब उससे कहा कि मानसी जनकपुरी गई थी तो मानसी डर के मारे ग़ुसलखाने में जा छिपी थी; उसका ग़ुस्सा पलंग पर सोये हुए अनन्त पर ही उतरा। मानसी ने भाभी से प्रार्थना की कि वह उसे अपने यहां नौकर भी रख लेंगी, तो जीवन भर वह उनका उपकार मानेगी। बस, अनन्त को पढ़ा-लिखा दें, उसे और कुछ नहीं चाहिए। वह कांप रही थी डर के मारे कि इस योजना का पता कहीं उसके पति को लग गया तो वह उसे मार ही डालेगा। भाभी ने कहा कि वे दोनों अब से उनके साथ ही रहेंगे। अपने कपड़े वग़ैरह लेने जाने की भी उन्हें आवश्यकता नहीं थी। मानसी भाभी के गले मिलकर फूट-फूटकर रोने लगी जैसे अपने विवाहित जीवन का सारा क्लुष आज ही धो डालेगी।
जब प्रताप और अनूप वापिस आए तो भाभी ने उन्हें बताया कि मानसी और अनन्त अब उनके साथ ही रहेंगे। वे सब मिलकर मानसी के लिए किसी नौकरी का प्रबन्ध करेंगे। अनूप ने विजया का कोरा चैक मानसी को थमा दिया और कहा कि वह यह न समझे कि वह किसी पर भार है। आज से वे सब उसका परिवार थे, मानसी और अनन्त का नया परिवार।
हवाई-अड्डे पर न जाने कितने जाने-अनजाने लोग विजया को छोड़ने आए थे; सब प्यासे प्यासे, अधीर, उदास। जी भर कर वह किसी से भी न मिल पाई थी। मम्मी-पापा गर्व से सिर ऊंचा करे अपनी बेटी को निहार रहे थे; विजया सोच रही थी कि वह एक या दो महीने रहकर भी जाती तो क्या यह प्यास बुझ जाती? उसकी आंखे अब भी किसी को ढूंढ रही थीं। विजया का दिल मानों थम-सा गया; अनूप और प्रताप के बीच हाथों पर झूलता अनन्त ही तो था, कैसा मुस्करा रहा था? साथ में नज़र आई मानसी। लौटने से पहले विजया की अन्तिम इच्छा भी मानो पूरी हो गई थी। आज मानसी न बेबस लगी, न विक्षुब्ध, उसकी आंखें चमक रही थीं। उसे अब किसी के दान की आवश्यकता नहीं थी। विजया तक वह पहुंच तो न पाई, पर उसका उत्साह उसके दोनों हाथों में हिल रहा था।
विजया के आंसू छलक ही तो पड़े; ख़ुशी बरसने लगी, छम-छम। अनूप ने अपना कैमरा कंधे पर लाद लिया था; विजया का यह आख़िरी रूप फिर न जाने कब देखने को मिले।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »