हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता की भावना : डॉ. अरुणा अजितसरिया
परिचय : कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए., ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास’ पर पीएच.डी. तथा फ्रेंच भाषा में डिप्लोमा प्राप्त कर यूके में प्रवासरत हैं। शिक्षा के क्षेत्र में 35 वर्षों का अनुभव है। ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय द्वारा एम.बी.ई. से सम्मानित हैं। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़कर हिंदी शिक्षण एवं प्रशिक्षण में योगदान दिया है। उनकी बालकथा ‘बाघ और कठफोड़वा पक्षी’ का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। हिंदी साहित्य में कहानियाँ, समीक्षाएँ एवं आलेख लिखती हैं तथा यूके में स्वतंत्र हिंदी कंसल्टेंट हैं।

राष्ट्र ‘और ‘भावना’ दोनों स्वतंत्र शब्द हैं जिनके मेल से राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय भावना अथवा राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप बनता है। यही भावना साहित्य में स्वर और सुर बनकर प्रवाहित होती रहती है। इससे जनमानस में सामूहिक चेतना का निर्माण होता है। देश भक्ति का उद्वेलन कभी समर्पण तो कभी आंदोलन का रूप धारण कर लेता है, जिससे व्यक्ति के स्वत्व से लेकर राष्ट्र तथा देश की स्वतंत्रता और समानता की सुरक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण तक के भाव समाविष्ट होते हैं।
राष्ट्रीयता सर्वथा आधुनिक संकल्पना नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर और हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। साहित्य भी उसी संस्कृति का एक अंग है। यह परस्पर एक दूसरे में गुथे हुए होते हैं, जिससे जनमानस में राष्ट्रीय चेतना को उत्तेजित तथा सुदृढ़ करने में सहायता मिलती है। इसके लिए साहित्य सदैव अग्रणी की भूमिका में रहा है।
राष्ट्रप्रेम अथवा राष्ट्रीय चेतना इस देश में सदैव से रही है, कोई भी देश बनता है भौगोलिक क्षेत्र से, उस क्षेत्र में रहने वाली जनता से, उसकी भाषा से, उसके रहन-सहन तथा संस्कृति से और इन सबका प्रतिबिंब साहित्य में मिलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस बात को इस प्रकार स्वीकार किया है कि ‘प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।’ इसलिए यह निश्चित है कि हिंदी साहित्य के प्रत्येक कालखंड में अपने युगबोध के सापेक्ष कवियों ने अपनी कविता में राष्ट्रीयता के स्वर अवश्य दिए होंगे। उन्होंने दिए भी हैं, क्योंकि राष्ट्रवाद का कोई एक रूप नहीं होता। क्रांतिकारी राष्ट्रवाद, सुधारवादी राष्ट्रवाद, जन राष्ट्रवाद, पुनरुत्थान वादी राष्ट्रवाद आदि राष्ट्रवाद के विचारधारात्मक प्रकार हैं। इन्हें हम हिंदी साहित्य के आदिकाल, भक्तिकाल तथा रीति कालीन साहित्य में पाते हैं, किंतु राष्ट्रीय चेतना एक प्रवृत्ति के रूप में अपनी पूरी धमक के साथ हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में ही प्रतिष्ठित होती है।
वस्तुत: हिंदी साहित्य के इतिहास में राष्ट्रीयता की भावना सदैव विद्यमान रही है। युग की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप उसके संदर्भ बदलते रहे हैं और कभी वह मुख्य धारा के रूप में मुखर रही तो कभी अंतर्धारा के रूप में। प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व अपनी अगली पीढ़ी के लिए जीवन मूल्यों की नींव रखना होता है जो राष्ट्रवाद द्वारा संभव है। भावी पीढ़ी की परिकल्पना के तीन महत्वपूर्ण बिंदु आधुनिकीकरण, लोकतंत्र और राष्ट्रीयता माने जाते हैं। राष्ट्रीयता की बात करते समय देश के स्वायत्त की रक्षा के लिए अपेक्षित वीरता, स्वाभिमान और उन दोनों को अभिव्यक्ति देने के लिए अपनी भाषा शामिल हैं।
आदिकाल में राष्ट्रीयता की भावना उस युग के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में करते समय यह स्पष्ट है कि देश अलग-अलग राज्यों में बँटा होने के कारण हर क्षेत्र के शासक का उद्देश्य अपने राज्य की सुरक्षा और उन्नति करना था। आदिकाल में राज दरबार के चारण कवि अपने आश्रयदाता की वीरता और राष्ट्र-प्रेम की प्रशस्ति करते थे जो उस समय की राष्ट्रीयता की भावना दर्शाता है। वे राज्याश्रय में रहकर जनजीवन में राष्ट्रीय और जातीय भावनाओं का संचार करते थे।
आदिकाल के कवियों में प्रमुख रचना चंदबरदाई की ‘पृथ्वीराज रासो’ है। चंदबरदाई पृथ्वीराज तृतीय (1178-1192) के दरबारी कवि थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें हिंदी का प्रथम महाकवि और पृथ्वीराज रासो को प्रथम महाकाव्य माना है। जनश्रुति के अनुसार चंदबरदाई और पृथ्वीराज का जन्म और मृत्यु एक साथ हुई थीं। पृथ्वीराज रासो एक चरित काव्य है। इसका नायक राजा पृथ्वीराज है। 69 सर्गों में महाकवि ने विदेशी आक्रामक मोहम्मद गौरी के खिलाफ युद्ध करते समय पृथ्वीराज के साहस, युद्ध कौशल और वीरता के वर्णन किए हैं। पृथ्वीराज के शौर्य और अपने राज्य की रक्षा के संकल्प के कई उदाहरण हैं। प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार जब राजा पृथ्वीराज की महती सेना युद्ध के लिए प्रयाण करती थी तो उनके घोड़ों के पदचाप सुनकर गर्भवती स्त्रियों के गर्भ के शिशु उछलने लगते थे। पृथ्वीराज के वीर सिपाही युद्ध में डटे रहे और तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज मोहम्मद गौरी को शब्दभेदी बाण से मार गिराकर विजयी हुए। पृथ्वीराज चौहान का जीवन और उनकी वीरता भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनके शौर्य और राज्य की रक्षा के संकल्प की कहानियाँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। युद्ध में पृथ्वीराज की निर्भीक वीरता और शौर्य का वर्णन चंदबरदाई ने अत्यंत ओजस्वी भाषा में किया है। इसकी भाषा को भाषा-शास्त्रियों ने ‘पिंगल’ कहा है, जो राजस्थान में ब्रजभाषा का पर्याय है।
पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज की सेना का वर्णन अत्यंत रोमांचकारी है। कवि ने उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक आदि अलंकारों की झड़ी लगाकर उत्कृष्ट साहित्य रचा है। वे लिखते हैं, योद्धाओं के सजने की धूम-धाम सुनाई पड़ी तो तीनों लोक केले के पत्ते के समान काँपने लगे। क्या गौरी पति शिव ने डमरू को ‘डह-डह’ किया! क्योंकि उन्होंने जाना कि योग- योगादि का अंत हो गया है। क्या शेषनाग का सिर भार-रहित तो नहीं हो गया। क्या सूर्य का घोड़ा, उच्चाश्व सूर्य के रथ में नहीं रहा? अथवा कमल-सुत ने क्षीर सागर में कमल को नहीं पाया और इसलिए शंकित होकर ब्रह्मांड को पकड़ लिया! शत्रु की फ़ौज के ऊपर राजा पृथ्वीराज की फ़ौज ऐसी थी मानो बंदर लंका गढ़ पर चढ़ कर गरज रहे हों। शिव उन्निद्र होकर जग गए, और इंद्र तथा फणींद्र दीन दिखाई पड़ने लगे। सेनाओं के भार ने पाताल में द्वंद्व उत्पन्न कर दिया था, उनके संचरण से उड़ी हुई रेणु ने आकाश को आच्छादित कर लिया था।
चंदबरदाई की भाषा की ध्वनयात्मकता युद्धभूमि के शब्दचित्र अंकित करने में कितनी सक्षम है:
सज्जतं धूम धूमे सुनंत।
कंपिय तीनपुर केलि पत्तं॥
डमरु डहडह कियं गवरि कंतं।
जानियं जोग जोगादि अंतं॥
किम किमे सेस सिर भार रहियं।
किमे उच्चासु रवि रथ्थ नहियं॥
कमल सुत कमल नहि अंबु लहियं।
संकियं ब्रह्म ब्रह्मांड गहियं॥
उप्परइ फोज प्रथिराज राजं।
मनउ वानरा लगि लंकाहि गाजं॥
जग्गियं देव देवा उनिंदं।
दिष्षियं दीन इंद फनिंदं॥
चंपियं भार पायाल दुंदं।
उड्डियं रेन’ प्रयास मुद्दं॥
आदि काल के अन्य कवियों में दलपति विजय की रचना “खुमाण रासो” में मेवाड़ के राजा खुमाण की वीरता का वर्णन है। नरपति नाल्ह की रचना “बीसलदेव रासो” में बीसलदेव की वीरता और राष्ट्रीयता का वर्णन है इन कविताओं में राजाओं की वीरता, युद्ध कौशल और देशभक्ति का गुणगान किया गया है, जो उस समय की राष्ट्रीयता की भावना को दर्शाता है।
भक्तिकाल में राष्ट्रीयता की भावना का महत्वपूर्ण स्थान था। इस काल के कवियों और संतों ने अपने साहित्य और भक्ति के माध्यम से समाज में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। भक्तिकाल के संत कवियों ने जाति-पाति और ऊँच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करके सामाजिक समरसता स्थापित करने का प्रयत्न किया जो उस युग की आवश्यकता थी। रामानंद, कबीर, रैदास, और दादू दयाल जैसे संतों ने सभी जातियों और वर्गों के लोगों को समान रूप से भक्ति का अधिकार दिया।
भक्तिकाल में धार्मिक एकता पर भी जोर दिया गया। सूफी संतों और हिंदू भक्तों ने मिलकर एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें सभी धर्मों के लोग मिल जुल कर रहें। कबीर, जायसी और नानक जैसे संत कवियों ने हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया।
तुलसीदास और सूरदास जैसे कवियों ने अपने काव्य में देशभक्ति और मानवतावाद का संदेश दिया।
तुलसीदास ने अपने महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ में राम राज्य की परिकल्पना की, जो एक आदर्श राज्य का प्रतीक है। इसमें न्याय, समानता, और धर्म की स्थापना की बात की गई है, जो राष्ट्रीयता की भावना को प्रकट करता है। इस काल के कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और एक आदर्श समाज की स्थापना का प्रयास किया।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य, रामचरितमानस न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसमें राष्ट्रीयता और सामाजिक सुधार की भावना भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस महाकाव्य में राष्ट्रीयता की भावना को विभिन्न तरीकों से प्रकट किया गया है।
रामचरितमानस में राम राज्य की परिकल्पना एक आदर्श राज्य का प्रतीक है, जिसमें न्याय, समानता, और धर्म की स्थापना की गई है। यह परिकल्पना राष्ट्रीयता की भावना को प्रकट करती है, जहाँ सभी नागरिक समान अधिकारों और कर्तव्यों के साथ रहते हैं।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में जाति-पाति और ऊँच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया है। रामचरितमानस में सभी वर्गों और जातियों के लोगों को समान रूप से सम्मान दिया गया है, जो राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की भावना को प्रकट करता है।
रामचरितमानस में धार्मिक एकता पर भी जोर दिया गया है। इसमें राम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है, जो सभी धर्मों के लोगों के लिए आदर्श हैं। यह धार्मिक एकता और सहिष्णुता की भावना को प्रकट करता है।
राम को एक आदर्श नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज में न्याय और धर्म की स्थापना करते हैं। यह आदर्श नेतृत्व राष्ट्रीयता की भावना को प्रकट करता है, जहाँ नेता अपने नागरिकों के कल्याण के लिए कार्य करते हैं।
रामचरितमानस का साहित्यिक योगदान भी महत्वपूर्ण है। इस महाकाव्य ने समाज में राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और एक आदर्श समाज की स्थापना का प्रयास किया।
उत्तर काण्ड में रामचरितमानस की कथा का समापन है। पृथ्वी पर अधर्म का विनाश और धर्म की प्रतिष्ठा करने के लिए राम ने दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लिया। उत्तर काण्ड में चौदह वर्ष के बनवास की अवधि पूरी होने की कथा है। रावण का वध करने के बाद श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, लंकापति विभीषण, वानर राज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान और अंगद सहित अयोध्या लौटे। राम का राज्याभिषेक और उनके शासनकाल के प्रभाव का वर्णन करते समय तुलसी अपने आराध्य देव को मनुज रूप में चित्रित करते हैं। तुलसी के राम मनुष्यों में श्रेष्ठ – मर्यादा पुरुषोत्तम, धर्मनिष्ठ, कर्तव्य पालक और दयावान शासक हैं। उनका उद्देश्य अयोध्या में एक आदर्श राज्य की स्थापना करना है। तुलसीदास ने एक ऐसे रामराज्य की परिकल्पना की है जहाँ प्रकृति और मानव समाज के चरम आदर्श रूप के दर्शन होते हैं:
‘दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ।।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ।।
खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ।।1।।
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ।।
सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ।।2।।…
सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहिं ।।
सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा’ ।।5।।
उत्तरकाण्ड ।।22।।
रीतिकाल (1650-1850) हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण युग है, जिसमें मुख्यतः शृंगार रस और विलासिता का वर्णन मिलता है। हालाँकि, इस काल में भी कुछ कवियों ने राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना को अपने काव्य में स्थान दिया। रीतिकाल के प्रमुख कवि भूषण ने छत्रसाल और शिवाजी जैसे राष्ट्र नायकों को अपने काव्य का विषय बनाया और राष्ट्रीय प्रेम की भावना को उजागर किया। इसी प्रकार, गुरु गोविंद सिंह और सेनापति जैसे कवियों ने भी राष्ट्रीय चेतना को प्रकट किया। रीतिकाल के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप मुख्यतः वीर रस और राष्ट्रप्रेम के माध्यम से प्रकट होता है। इस काल के कवियों ने अपने काव्य में राष्ट्र की महत्ता और उसकी रक्षा के लिए बलिदान की भावना को प्रमुखता दी।
महाकवि भूषण राष्ट्रीय भावों के गायक है। उनकी वाणी पीड़ित प्रजा के प्रति एक अपूर्व आश्वासन हैं। उनके समय में औरंगजेब का शासन था। औरंगजेब की कट्टरता व हिन्दुओं के प्रति नफरत ने उसे जनता से दूर कर दिया था। संकट की इस घड़ी में भूषण ने दो राष्ट्रीय पुरुषों – छत्रपति शिवाजी महाराज व छत्रसाल के माध्यम से पूरे राष्ट्र में राष्ट्रीय भावना संचारित करने का प्रयास किया। भूषण ने तत्कालीन जनता की वाणी को अपनी कविताओं का आधार बनाया है। इन्होंने स्वदेशानुराग, संस्कृति अनुराग, साहित्य अनुराग, महापुरुषों के प्रति अनुराग, उत्साह आदि का वर्णन किया है।
महाकवि भूषण की सारी कविताएँ मुक्तक-शैली में लिखी गई हैं। उन्होंने अपने चरित्र नायक शिवाजी और छत्रसाल के विशिष्ट चारित्रिक गुणों और कार्यकलापों को अपनी रचना का विषय बनाया। भूषण केवल छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रसाल इन दो राजाओं के ही सच्चे प्रशंसक थे। उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है-
‘और राव राजा एक मन में न ल्याऊं अब।
साहू को सराहों कै सराहौं छत्रसाल को॥’
शिवा बावनी में छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, पराक्रम आदि का ओजपूर्ण वर्णन है। छत्रसाल दशक में बुंदेला वीर छत्रसाल के शौर्य का वर्णन है: भूषण की एक और प्रसिद्ध कविता “छत्रसाल दशक” में उन्होंने महाराजा छत्रसाल के शौर्य और वीरता का वर्णन किया है:
‘छत्रसाल के बल को, देखो सब संसार।
मुगलन के मस्तक झुके, छत्रसाल के द्वार।।’
भूषण का संपूर्ण काव्य वीर रस तथा ओज गुण से ओतप्रोत है जिसके नायक छत्रपति शिवाजी महाराज हैं और खलनायक औरंगजेब। औरंगज़ेब के प्रति उनका जातीय वैमनस्य न होकर शासक के रूप में उसकी अनीतियों से विरोध है। औरंगज़ेब के राज्य में निरीह हिंदू जनता अत्याचारों से पीड़ित थी। “शिवा बावनी” में छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य का वर्णन है।
शिवाजी ने किस प्रकार अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई तथा निराश हिन्दू जन समुदाय को आशा का संबल प्रदान कर उसे संघर्ष के लिए उत्साहित किया, भूषण कवि उनके महत्व का गुणगान करते हैं:
‘राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यौ।
गरुड़ को दावा जैसे नाग के समूह पर।
तेरे हीं भुजान पर भूतल को भार।’
उनके काव्य का आधार ऐतिहासिक है। इसके अतिरिक्त, इस वीर काव्य में देश की संस्कृति व गौरव का गान है। भूषण ने अपने वीर काव्य में औरंगज़ेब के प्रति आक्रोश सर्वत्र व्यक्त किया है।
कविता में वीर रस, दानवीर और धर्मवीर के वर्णन प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, पर प्रधानता युद्ध वीर की ही है। रौद्र, भयानक, वीभत्स आदि रसों के वर्णन हैं, पर प्रमुखता वीर रस की है। वे तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम के प्रतिनिधि कवि हैं। छत्रपति शिवाजी राजे भोसले (१६२७ -१६८० ई.) भारत के एक महान राजा एवं रणनीतिकार थे जिन्होंने १६७४ ई. में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। इसके लिए उन्होंने मुगल साम्राज्य के शासक औरंगज़ेब से संघर्ष किया। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम में नायक के रूप में स्मरण किए जाने लगे।
भूषण की शैली अपने विषय के अनुकूल ओजपूर्ण और वीर रस की व्यंजना के लिए सर्वथा उपयुक्त है। प्रभावोत्पादकता, चित्रोपमता और सरसता भूषण की शैली की मुख्य विशेषताएँ हैं। अपने कथानायक छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णन करते समय जैसे वे उपमाओं की झड़ी ही लगा देते हैं। इसका उदाहरण उनकी रचना में सर्वत्र दिखाई देता है।
भूषण कवि कहते हैं कि इंद्र ने जिस प्रकार जंभासुर नामक दैत्य पर आक्रमण करके उसे मारा था और जिस प्रकार बाडवाग्नि समुद्र के पानी को जलाकर सोख लेती है, अभिमानी एवं छल-कपटी रावण पर जिस प्रकार श्रीराम ने आक्रमण किया था, जैसे बादलों पर वायु के वेग का प्रभुत्व रहता है, जिस प्रकार शिवजी ने रति के पति कामदेव को भस्म कर दिया था, जिस प्रकार सहस्रबाहु (कार्त्तवीर्य) राजा को परशुराम ने आक्रमण कर मार दिया था, जंगली वृक्षों पर दावाग्नि जैसे अपना प्रकोप दिखलाती है और जिस प्रकार वनराज सिंह का हिरणों के झुंड पर आतंक छाया रहता है अथवा हाथियों पर मृग राज सिंह का आतंक रहता है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें अंधकार को समाप्त कर देती हैं और दुष्ट कंस पर जिस तरह आक्रमण करके भगवान श्रीकृष्ण ने उसका विनाश कर दिया था, उसी प्रकार सिंह के समान शौर्य एवं पराक्रम वाले छत्रपति शिवाजी का मुग़लों के वंश पर आतंक छाया रहता है:
‘इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सु अंभ पर,
रावन सदंभ पर रघुकुल राज हैं।
पौन वारिवाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यों सहस्रबाहु पर राम द्विजराज हैं
दावा द्रुमदंड पर, चीता मृगझुंड पर,
भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज हैं।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यों मलेच्छ बंस पर सेर सिवराज हैं।’
निस्संदेह, भूषण का काव्य राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत है। वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय भावना के कवि हैं। महाकवि भूषण का हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान हैं। रीति कालीन कवियों में वे पहले कवि थे जिन्होंने हास-विलास की अपेक्षा राष्ट्रीय-भावना को प्रमुखता प्रदान की। उन्होंने अपने काव्य द्वारा तत्कालीन असहाय हिंदू समाज को वीरता का पाठ पढ़ाया उनकी कविताएँ आज भी राष्ट्रीयता की प्रेरणा देती हैं। वे राष्ट्र की अमर धरोहर हैं।
गुरु गोविंद सिंह जी की कविताओं में वीरता, धर्म की रक्षा और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम मिलता है। उनकी रचनाओं में से एक प्रसिद्ध कविता “चंडी दी वार” है, जिसमें उन्होंने देवी दुर्गा की वीरता का वर्णन किया है। इस कविता में राष्ट्रीय चेतना और धर्म की रक्षा का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। गुरु गोविंद सिंह जी ने देवी दुर्गा की वीरता और उनके द्वारा राक्षसों के संहार का वर्णन न केवल धार्मिक भावना को प्रकट करता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और वीरता का भी प्रतीक है।
सेनापति हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवि थे और उन्हें बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल का राजाश्रय प्राप्त था। महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड के एक वीर और स्वतंत्रता प्रेमी राजा थे, जिन्होंने मुगलों के खिलाफ संघर्ष किया और अपने राज्य की स्वतंत्रता को बनाए रखा। सेनापति के समय में मुग़ल शासक औरंगज़ेब का शासन था। इस समय के दौरान मुग़ल साम्राज्य का विस्तार और हिंदू राजाओं के साथ संघर्ष जारी था। सेनापति की कविताएँ इस संघर्ष और वीरता की भावना को प्रकट करती हैं। उन्होंने अपने काव्य में मुगलों के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष और स्वतंत्रता की भावना को प्रमुखता दी है। सेनापति ने अपनी कविताओं में महाराजा छत्रसाल के शौर्य और वीरता का वर्णन किया है, जिससे उनकी राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना स्पष्ट रूप से प्रकट होती है:
‘सूरज बंसि सुराज करि, करि करि मर्दन मर्द।
सिर काटि काटि सूरमा, बिचि बिचि धरती धरद।।’
आधुनिक काल में हिंदी साहित्य की एक प्रमुख विशेषता राष्ट्रीयता रही है। हिंदी साहित्य का आधुनिक काल पराधीनता तथा स्वतंत्रता का युग है, इसलिए इस कालखंड की कविता में राष्ट्रीयता का स्वर अत्यंत मुखर है। इसकी शुरुआत भारतेंदु युग से होती है। भारतेन्दु तथा भारतेंदु मंडल के कवियों के बाद यह उत्तरोत्तर पुष्पित और पल्लवित होती चली गई। जिसके संवाहकों में मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, श्याम नारायण पांडेय, सोहनलाल द्विवेदी तथा रामधारी सिंह दिनकर आदि का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। इन सभी कवियों ने संपूर्ण भारत के प्रति आस्था, अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठा, मानवता के प्रति समर्पण, सामंती प्रवृत्ति के प्रति विद्रोह तथा स्वतंत्रता के लिए संकल्प का शंखनाद किया।
भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। ब्रिटिश राज की शोषक प्रकृति का चित्रण करने वाले उनके लेखन के लिए उन्हें युग चारण माना जाता है। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के तथाकथित न्याय, जनतंत्र और उनकी सभ्यता का पर्दाफाश किया। उनके इस कार्य की सराहना करते हुए डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं: ‘देश के रूढ़िवाद का खंडन करना और महंतों, पंडे-पुरोहितों की लीला का पर्दाफाश करना निर्भीक पत्रकार हरिश्चन्द्र का ही काम था। राजभक्ति प्रकट करते हुए भी, अपनी देशभक्ति की भावना के कारण उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० में उन्हें ‘भारतेंदु'(भारत का चंद्रमा) की उपाधि प्रदान की। हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की देन भाषा तथा साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में है।’
भारतेंदु की रचनाओं में अंग्रेजी शासन का विरोध, स्वतंत्रता के लिए आकांक्षा और जातीय भावबोध की झलक मिलती है। सामन्ती जकड़न में फँसे समाज में आधुनिक चेतना के प्रसार के लिए लोगों को संगठित करने का प्रयास करना उस जमाने में एक नई ही बात थी। उनके साहित्य और नवीन विचारों ने उस समय के तमाम साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को झकझोरा और उनके इर्द-गिर्द राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत लेखकों का एक ऐसा समूह बन गया जिसे भारतेन्दु मंडल के नाम से जाना जाता है।
भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। भारत के प्राचीन गौरव की झाँकी वे इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं:
‘भारत के भुज बल जग रच्छित, भारत विद्या लहि जग सिच्छित।
भारत तेज जगत विस्तारा, भारत भय कंपिथ संसारा।’
भारतेन्दु अपने समय के साहित्यिक नेता थे। मातृ-भाषा की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही नहीं सम्पूर्ण धन भी अर्पित कर दिया। हिंदी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था –
‘निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल॥’
१८८२ में शिक्षा आयोग (हन्टर कमीशन) के समक्ष अपनी गवाही में हिन्दी को न्यायालयों की भाषा बनाने की महत्ता पर उन्होंने कहा, ‘यदि हिन्दी अदालती भाषा हो जाए, तो सम्मन पढ़वाने, के लिए दो-चार आने कौन देगा, और साधारण-सी अर्जी लिखवाने के लिए कोई रुपया-आठ आने क्यों देगा। तब पढ़ने वालों को यह अवसर कहाँ मिलेगा कि गवाही के सम्मन को गिरफ्तारी का वारंट बता दें। सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग किया जाता है। यही (भारत) ऐसा देश है जहाँ अदालती भाषा न तो शासकों की मातृभाषा है और न प्रजा की।’
भारतेन्दु का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य को, और उसके साथ समाज को साम्राज्य-विरोधी दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दी। १८७० में जब कविवचनसुधा में उन्होंने लॉर्ड मेयो को लक्ष्य करके ‘लेवी प्राण लेवी’ नामक लेख लिखा तब से हिन्दी साहित्य में एक नयी साम्राज्य-विरोधी चेतना का प्रसार आरम्भ हुआ। ६ जुलाई १८७४ को कविवचनसुधा में लिखा कि जिस प्रकार अमेरिका उपनिवेशित होकर स्वतन्त्र हुआ उसी प्रकार भारत भी स्वतन्त्रता लाभ कर सकता है। उन्होंने तदीय समाज की स्थापना की जिसके सदस्य स्वदेशी वस्तुओं के व्यवहार और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की प्रतिज्ञा करते थे। भारतेन्दु ने विलायती कपड़ों के बहिष्कार की अपील करते हुए स्वदेशी का जो प्रतिज्ञा पत्र 23 मार्च, 1874 के ‘कविवचनसुधा’ में प्रकाशित किया, वह समूचे हिंदी समाज का प्रतिज्ञा पत्र बन गया। उसमें भारतेंदु ने कहा था, ‘हमलोग सर्वान्तर्यामी, सब स्थल में वर्तमान, सर्वद्रष्टा और नित्य सत्य परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा न पहिरेंगे और जो कपड़ा कि पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की मिती तक हमारे पास हैं उनको तो उनके जीर्ण हो जाने तक काम में लावेंगे पर नवीन मोल लेकर किसी भाँति का भी विलायती कपड़ा न पहिरेंगे।’
सबसे पहले भारतेंदु ने ही साहित्य में जन भावनाओं और आकांक्षाओं को स्वर दिया था। पहली बार साहित्य में ‘जन’ का समावेश भारतेन्दु ने ही किया। भारतेन्दु ने साहित्य को जनता की गरीबी, पराधीनता, विदेशी शासकों के अमानवीय शोषण के चित्रण और उसके विरोध का माध्यम बना दिया। अपने नाटकों, कवित्त, मुकरियों और प्रहसनों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजी राज पर कटाक्ष और प्रहार किए, जिसके चलते उन्हें अंग्रेजों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। भारतेंदु अंग्रेजों के शोषण तंत्र को भली-भांति समझते थे। अपनी पत्रिका कविवचनसुधा में उन्होंने लिखा था, ‘जब अंग्रेज विलायत से आते हैं प्रायः कैसे दरिद्र होते हैं और जब हिंदुस्तान से अपने विलायत को जाते हैं तब कुबेर बनकर जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि रोग और दुष्काल इन दोनों के मुख्य कारण अंग्रेज ही हैं।’
यही नहीं, 20वीं सदी की शुरुआत में दाद भाई नौरोजी ने धन के अपवहन (ड्रेन ऑफ वेल्थ) के जिस सिद्धान्त को प्रस्तुत किया था, भारतेन्दु ने बहुत पहले ही शोषण के इस रूप को समझ लिया था। उन्होंने अपनी विरचित बहुचर्चित और सुविख्यात कविता ‘भारत-दुर्दशा में लिखा था, ‘अंगरेजी राज सुखसाज सजे अति भारी, पर सब धन विदेश चलि जात ये ख्वारी।’
कविवचनसुधा में उन्होंने जनता का आह्वान किया था, ‘भाइयो! अब तो सन्नद्ध हो जाओ और ताल ठोक के इनके सामने खड़े तो हो जाओ। देखो भारतवर्ष का धन जिसमें जाने न पावे वह उपाय करो।’
भारतेंदु अपने दृष्टिकोण में अपने समकालीनों की अपेक्षा इसलिए भी अलग और विशिष्ट हैं क्योंकि वह जन-भावनाओं की सीधी अभिव्यक्ति हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भारतीयों के द्वारा भाषा और शिक्षा को लेकर जो भी आवाज उठाई गई, उसमें एक शुद्धतावादी स्वर बहुत साफ दिखाई देता है। जनता के द्वारा गाँधीजी को दिए गए विभिन्न प्रतिवेदनों को छोड़ दें तो सीधे सरकार के विरुद्ध पहली आवाज के रूप में श्यामसुंदर दास और मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में आन्दोलन उभरा, हालाँकि यह आन्दोलन अपनी प्रकृति में शांत और शुद्धतावादी था। इस सन्दर्भ में भी रामगोपाल इसी की पुष्टि करते दिखाई देते हैं। उनके अनुसार, ‘सन 1893 की दो घटनाएँ उल्लेखनीय हैं, ‘उस वर्ष काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। उसी वर्ष रोमन लिपि को भारतीय भाषाओँ के लिए अपनाने का प्रस्ताव पुनः उठाया गया। दो-तीन वर्ष तक उस प्रस्ताव की चर्चा मात्र होती रही। परन्तु 1896 में यह बात दृढ़ता के साथ फैलने लगी कि पश्चिमोत्तर प्रदेश की सरकार अदालतों तथा अन्य दफ्तरों में फारसी अक्षरों के स्थान पर रोमन लिपि को प्रचलित करना चाहती है। उस समय नागरी लिपि का कोई सरकारी अस्तित्व नहीं था; रोमन की स्वीकृति से जिस भाषा या लिपि को तुरंत हानि पहुँचने का भय था, वह थी, उर्दू। परन्तु इस प्रस्ताव से उन अनेक लोगों की आकांक्षा पर भी पानी फिर जाता जिन्हें यह आशा थी कि वे हिंदी भाषा और नागरी लिपि को सरकारी दफ्तरों में प्रविष्ट कराकर ही चैन लेंगे। जैसा कि श्री श्याम सुन्दर दास ने लिखा है, ‘यदि एक बार रोमन अक्षरों का प्रचार हो गया तो फिर देवनागरी अक्षरों के प्रचार की आशा करना व्यर्थ होगा।’
स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिंदी भाषा और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए केवल दो लोगों का उल्लेख किया जाता है, प्राथमिक शिक्षा में गाँधी और उच्च शिक्षा में मालवीय जी का। इस सन्दर्भ में अपने भाषण में गाँधी जी कथन उल्लेखनीय है: ‘जो मधुरता मुझे ग्राम की हिंदी में मिलती है वह न तो लखनऊ के मुसलमानों की बोली में है, और न प्रयाग के हिन्दुओं की. भाषा की नदी का उद्गम जनता के हिमालय में है. हिमालय से निकली हुई गंगा हमेशा बहती रहेगी, इसी प्रकार ग्राम की हिंदी हमेशा बहती रहेगी जब कि संस्कृतमय तथा फारसीमय हिंदी छोटी नदी की भांति जो छोटी-सी पहाड़ी से निकलती है, सूख जाएगी और लोप हो जाएगी. हिंदी और उर्दू का सद्संगम उतना ही सुन्दर होगा जितना गंगा और यमुना का, और वह सदैव रहेगा।’
‘संदेश यहां मैं नहीं स्वर्ग का लाया ।
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।।’
इन पंक्तियों के लेखक राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जिनका संकल्प था,
‘सुख दुख में एक सा सब भाइयों का भाग हो ।
अंतः करण में गूंजता राष्ट्रीयता का राग हो।।’
‘भारत-भारती’ की प्रेरणा तत्कालीन हिन्दी साहित्य में एक बहुत बड़ी कमी को पूरा करने के लिए हुई थी। स्वयं गुप्त जी के शब्दों में, “हिन्दी में अभी तक इस ढंग की कोई कविता पुस्तक नहीं लिखी गई जिसमें हमारी प्राचीन उन्नति और अर्वाचीन अवनति का वर्णन भी हो और भविष्यत् के लिए प्रोत्साहन भी।’ गुप्त जी ने इस अभाव की पूर्ति के उद्देश्य से प्रेरित हो इसकी रचना की, ‘भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती’ में उनकी राष्ट्रीयता की भावना अभिव्यक्त है।
‘भू-लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल जहाँ।
सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन? भारतवर्ष है।।’
वर्तमान भारत के पतन का चित्रण करते समय भी वे राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित हैं| अंत में वे तामसिक विचारों में डूबे भारतवासियों को दिशा निर्देश करते हुए उन्हें उद्बोधित करते हैं, “अब भी समय है जागने का देख” में उनकी भविष्य के प्रति आस्था एवं, ‘”क्या साम्प्रदायिक भेद से है ऐक्य मिट सकता अहो!” में एकराष्ट्र की परिकल्पना है| गुप्त जी का आशावादी दर्शन एवं शुभांशसा ”भगवान भारतवर्ष को फिर पुण्य भूमि बनाइए” में निहित है|
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय भावना के ओजस्वी कवि हैं-
‘मुझे तोड़ लेना वनमाली उस मुझे पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक।।’
वे एक तरफ स्वाधीनता हेतु क्रांतिकारी धारा से जुड़े रहे तो दूसरी तरफ उनकी रचनाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हेतु की गई कुर्बानियों का वर्णन है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन ‘भी इसी काव्य चेतना को अंगीकार करते हैं। इसी क्रम में कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनकी कविता की एक पंक्ति, ‘कहा मुझे कविता लिखने को / मैंने लिखा जालियाँवाला बाग’, में उनकी क्रांतिधर्मिता परिलक्षित होती है। ‘बसंत’ कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करूण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है:
‘आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना
यह है शोक स्थान, यहाँ मत शोर मचाना
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खा कर
कलियाँ उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर।’
उनकी कालजयी कविता ‘झाँसी की रानी’ ने एक पूरी पीढ़ी को विदेशियों के विरुद्ध सन्नद्ध किया था और आज भी उसका पाठ अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। इस कविता की राष्ट्रीय चेतना संक्रामक है: महारानी लक्ष्मीबाई के साहस और पराक्रम के बारे में कौन नहीं जानता? झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने जिंदगी की तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए न सिर्फ अंग्रेजों को डटकर सामना किया, बल्कि उन्हें अदम्य शक्ति और बहादुरी का भी एहसास करवाया और अपनी जिंदगी की आखिरी साँस तक वे अपने राज्य झांसी को स्वतंत्र करवाने के लिए लड़ती रहीं। यही नहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। महारानी लक्ष्मीबाई ने लोगों को अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए एकजुट किया था, वहीं उनके आह्वान पर इस लड़ाई में कई महिलाएँ भी शामिल हुईं थी।1857 के युद्ध में झांसी की रानी ने अपनी अदम्य शक्ति और साहस का परिचय देकर, बड़े-बड़े वीर योद्धाओं को भी हैरान कर दिया था। उनके वीर और पराक्रम की तो प्रशंसा उनके दुश्मनों ने भी की थी:
‘जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥’
‘जगे हम लगे जगाने विश्व, देश में फिर फैला आलोक,
व्योम तम पुंज हुआ तब नष्ट, अखिल संस्कृति हो उठी अशोक।’ लिखने वाले छायावाद के प्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद की कविता स्वाधीन चेतना के बल पर नयी मानव परिकल्पना को संबोधित करने में सक्षम है। प्रसाद राष्ट्रीय भावना की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के कवि हैं। प्रसाद की ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्वला स्वतंत्रता पुकारती’ आदि कविताओं में कवि ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है।
अब जहाँ तक ‘कामायनी’ में राष्ट्रीय चेतना देखने का प्रश्न है, उसकी मूल संकल्पना किसी भी संकुचित राष्ट्रवाद के विरूद्ध है। विश्वमंगल ही इसका मूल प्रयोजन है। प्रसाद के नाटकों में उनकी राष्ट्रीयता की चेतना रेखांकित हुई है। ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से प्रसाद ने देशप्रेम और विदेशी शासकों से स्वतंत्रता का आह्वान किया। जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ ‘स्कंदगुप्त’ में उनकी राष्ट्रीयता की भावना का उत्कर्ष देखने को मिलता है। उस समय पराधीन भारत की स्थिति के प्रति साहित्यकारों में जागरूकता की भावना प्रबल हो रही थी। स्कंदगुप्त नाटक की रचना का उद्देश्य ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर सोई हुई राष्ट्रीयता की भावना जागृत करना था। उन्होंने अतीत के माध्यम से समसामयिक समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उसका समाधान प्रस्तुत किया है। “स्कंदगुप्त’ नाटक देशभक्त, वीर, साहसी, प्रेमी स्कंदगुप्त विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित ऐतिहासिक नाट्य कृति है। नाट्य रचना के प्रयोजन के संबंध में प्रसाद जी ने लिखा, ‘इतिहास का अनुशीलन किसी भी जाति को अपना आदर्श संगठित करने के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। मेरी इच्छा भारतीय इतिहास के अप्रकाशित अंश में से उन प्रकाण्ड घटनाओं का दिग्दर्शन कराना है, जिन्होंने हमारी वर्तमान स्थिति बनाने का प्रयत्न किया है।’ ऐतिहासिक नाटक लिखते समय प्रसाद का उद्देश्य अपने समय की समस्याओं के लिए समाधान खोजना रहा। नाटक का उद्देश्य बाहरी शत्रुओं से लड़ने के पश्चात विजयी होने पर सांस्कृतिक विजय और इसके द्वारा अंग्रेज़ों के अधीन तत्कालीन समाज को एक रास्ता दिखाना था। नाटक में राष्ट्रीयता की भावना के साथ विश्वप्रेम, लोककल्याण, सहिष्णुता तथा क्षमाशीलता की उदात्त भावनाएँ सम्मिलित हैं। स्कंदगुप्त का जीवन राष्ट्रप्रेम को समर्पित है। वह कहता है, ‘यदि कोई साथी न मिला तो साम्राज्य के लिए, जन्मभूमि के उद्धार के लिए मैं अकेला ही युद्ध करूँगा।’
नाटक में देश भक्ति की अंतर्धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। चाहे वह देवसेना के गीत के संदेश से हो:
‘देश की दुर्दशा निहारोगे, डूबते को कभी उबारोगे
हारते ही रहे, न है कुछ अब, दाँव पर आपको न हारोगे।’
या स्कंदगुप्त की देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रार्थना हो :
‘ जियें तो सदा उसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष।
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।’
राष्ट्रीयता की भावना की अगली कड़ी में रामधारी सिंह दिनकर ने स्वयं को द्विवेदी युगीन भाषा और छायावादी अभिव्यंजना शैली का वारिस मानते हुए अपने समय की पुकार सुन कर हिंदी कविता के अगले चरण का नेतृत्व किया।
दिनकर की ऐतिहासिक चेतना अत्यंत प्रखर है। यद्यपि कवि की कल्पना इतिहास के भग्न खंडहरों में भटकती है, लेकिन उसका उद्देश्य अपने वर्तमान की पीड़ा के प्रति सजग और संवेदनशील होना है। उसके प्रतिकार की उत्तेजना उसे प्रासंगिक बनाती है।… दिनकर की रचना प्रक्रिया की शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम के दौर में हुई। पराधीन भारत के दमन और अत्याचारों के विरुद्ध उन्होंने अपने ओजस्वी स्वर में विद्रोह की दुंदभी बजाई। विदेशी शासकों के प्रति बगावत का स्वर उनकी कविता की पहचान बन गया।…. उनकी प्रसिद्ध रचना ‘रश्मिरथी’ केवल कर्ण की संघर्ष पूर्ण जीवन गाथा नहीं, एक प्रबुद्ध प्रेरणा है जो यह दर्शाती है कि व्यक्ति का जन्म नहीं बल्कि उसके चरित्र और कर्म ही उसको परिभाषित करते हैं। राज्यसभा में गुरु द्रोणाचार्य ने उसकी जाति पूछी, कर्ण का उत्तर:
‘जाति जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाखंड,
मैं क्या जानूँ जाति? जाति है ये मेरे भुजदंड।’ और दुर्योधन के शब्द:
‘मूल जानना बड़ा कठिन हैं नदियों का, वीरों का,
धनुष छोड़ कर और गोत्र क्या होता है रणधीरों का?’
दिनकर महात्मा गाँधी से प्रभावित थे, किंतु, गाँधी जी की अहिंसा की नीति को वे नकारते हैं। वे क्रांति के उपासक कवि हैं। क्रांति में हिंसा अवश्यंभावी है। इसलिए वे एक सीमा तक हिंसा को आवश्यक समझते हैं। पर यह ‘हिंसा’ हिंसा के लिए नहीं है, उसका उद्देश्य जनजागरण और पराधीनता की बेड़ियाँ तोड़ना है। कवि ने हिंसा का दायित्व भी उस पर नहीं रखा है जो तलवार उठाता है, बल्कि हिंसा के लिए दोषी वह है जो दूसरों के अधिकारों को छीनता है। दिनकर के अनुसार क्रांति और हिंसा ‘विषस्य विषमौषधम की भाँति उस समय की माँग थी। उनकी राष्ट्रीयता में आवेग और आवेश की प्रधानता जनमन की सोई हुई राष्ट्रीयता को जगाने के लिए आवश्यक थी। ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में दिनकर प्रतिशोध शक्ति की प्रशंसा करते हैं। दिनकर की राष्ट्रीयता भाववादी राष्ट्रीयता है। उसमें चिंतन के संगीत की अपेक्षा आवेग और आवेश की प्रधानता है। गुलामी के वातावरण में अंग्रेज़ों के शोषण और अत्याचारों की प्रतिक्रिया का शक्तिशाली रूप उनकी कविता में मुखर है। उसमें उत्साह, उमंग, प्रेरणा और आस्था है। उनकी राष्ट्रीयता अंतरराष्ट्रीयता या मानवतावाद में परिणित होने का प्रयास करती है। वे उस पुनरुत्थानवादी धारा के राष्ट्रीय कवि हैं जो भारतेंदु से आरम्भ होकर द्विवेदी युग से होती हुई छायावादी काव्य में व्यक्त हुई है। दिनकर हृदय से कवि और कर्म से क्रांतिकारी थे। उनका जीवन देश भक्ति, सादगी और सेवा का प्रतीक है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय भूमिका रही। और स्वाधीन भारत में देश के निर्माण में योगदान के रूप में फलीभूत हुई। उनकी विरासत आज भी जन मानस में देशप्रेम की प्रेरणा का संचार करती है। न्याय, स्वतंत्रता और मानवता की संवेदना उनकी रचनाओं को कालजयी और कवि को सर्वकालिक बनाती है। उनकी कविताएँ आज के संदर्भ में समाज को दिशा निर्देश देने में समर्थ हैं। देशप्रेम और सामाजिक जागरूकता की भावना के कारण वे राष्ट्रकवि की सर्वोच्च पदवी के सच्चे अधिकारी बने।
