उर्दू अकादमी के कार्यक्रम में ‘स्त्री-विमर्श और संस्कारों के बदलते कथानक’ विषय पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए: मनोज कुमार श्रीवास्तव

अभी जब सिराज अजमली सर बोल रहे थे तो मुझे उन्हीं का एक शे’र याद आ रहा था:
क्या दास्ताँ थी पहले बयाँ ही नहीं हुई
फिर यूँ हुआ कि सुब्ह अज़ाँ ही नहीं हुई
बहुत तफ़सील से उन्होंने बताया। उसके पहले जो तीन अफ़साने पढ़े गए तो उसमें स्त्री का जो विद्रोही स्वर है उसे सुनकर भी मुझे सिराज सर का ही एक दूसरा शे’र याद आयाः
झुका के सर को चलना जिस जगह का क़ाएदा था
मिरे सर की बुलंदी से वहाँ महशर बपा था
अजमली सर ने बहुत सी भाषाओं के साहित्य के हवाले से अपनी बात कही पर मैं अपने को उर्दू अफ़सानों तक ही महदूद रखूँगा। और मैं कहानीकारों के जानिब से भी बात नहीं करूँगा, वो अजमली जी ने कर ही दी है, मैं तो आज के कार्यक्रम के शीर्षक में से एक शब्द संस्कार चुनता हूँ और उन्हीं के इर्द गिर्द अपनी बात कहने की कोशिश करूँगा।
स्त्री-विमर्श को अगर केवल औरत के अधिकारों की फ़ेहरिस्त समझ लिया जाए तो उसकी असली गहराई हमारी निगाह से ओझल हो जाती है। असल मसला यह नहीं कि औरत को कितने अधिकार मिले; उससे पहले का सवाल यह है कि मुआशरे ने “औरत” की तामीर किस तरह की। उसे किस उम्र में बताया गया कि हया क्या है, इज़्ज़त क्या है, फ़र्ज़ क्या है, शौहर के प्रति वफ़ादारी क्या है, मायके की लाज क्या है और ससुराल की ख़िदमत क्या है। संस्कार दरअसल सामाजिक क़ानून की वह नरम शक्ल हैं जो बाहर से हुक्म नहीं देते; वे भीतर बैठकर आदमी को बताते हैं कि उसे क्या चाहना चाहिए और किस ख़्वाहिश पर शर्मिन्दा होना चाहिए।
यही कारण है कि उर्दू अफ़साना स्त्री-विमर्श का असाधारण दस्तावेज़ बनता है। उसने स्त्री को किसी सैद्धांतिक “वर्ग” की तरह नहीं देखा; उसने उसे चारपाई, चौखट, रसोई, आँगन, दहेज, निकाह, पर्दा, बाज़ार, अस्पताल, बिस्तर और तन्हाई में देखा। मंटो, इस्मत चुग़ताई, राजेंद्र सिंह बेदी, ख़दीजा मस्तूर, हाजरा मसरूर, जीलानी बानो, ख़ालिदा हुसैन, ज़ाहिदा हिना और बाद के लेखकों की दुनिया में स्त्री कोई स्थिर किरदार नहीं है।उसके साथ-साथ संस्कारों का मफ़हूम भी बदलता जाता है।
इसलिए इस साहित्य को लेखक-दर-लेखक पढ़ने के बजाय मुद्दा-दर-मुद्दा पढ़ना अधिक सार्थक है। एक ही सामाजिक प्रश्न को अलग-अलग दशकों के अफ़साने किस तरह देखते हैं—यही असल साहित्यिक यात्रा है।
तो मैं मुद्दे यों ले लेता हूँ।
- “अच्छी लड़की” : संस्कार की पहली पाठशाला
स्त्री की सामाजिक तर्बियत विवाह से बहुत पहले शुरू हो जाती है। बचपन में ही लड़की को बताया जाता है कि उसकी आवाज़ कैसी होनी चाहिए, चाल कैसी, कपड़े कैसे, दोस्त कौन और सपने कितने बड़े। लड़के के लिए जुरअत गुण है; लड़की के लिए वही जुरअत अक्सर गुस्ताख़ी बन जाती है।
डिप्टी नज़ीर अहमद के मिरात-उल-उरूस में असगरी और अकबरी का अंतर इसी सामाजिक तर्बियत की बुनियादी बहस है। असगरी अपनी तालीम, तदब्बुर और घरेलू इंतज़ाम के कारण एक आदर्श स्त्री के रूप में सामने आती है। वह अपने मायके और ससुराल दोनों को समझदारी से सँभालती है; अकबरी के सामने उसका चरित्र एक आईने की तरह रखा जाता है। लेकिन आधुनिक नज़र यहाँ एक पेचीदा सवाल उठाती है—क्या स्त्री को इसलिए शिक्षित किया जा रहा है कि वह बेहतर गृहिणी बने, या इसलिए कि वह अपने जीवन का फ़ैसला ख़ुद कर सके?
यहीं संस्कार की पहली तब्दीली दिखाई देती है। पहले “अच्छी लड़की” का मतलब था—आज्ञाकारी लड़की। फिर—शिक्षित लड़की। फिर—आत्मनिर्भर लड़की।मगर आख़िरी छलाँग अभी बाकी है: अपने बारे में फ़ैसला करने वाली लड़की।
लड़की को पढ़ाना सुधार है; उसे अपने जीवन की ताबीर ख़ुद करने देना मुक्ति है।
- इज़्ज़त और औरत का वजूद
हमारे मुआशरे में औरत की इज़्ज़त अक्सर उसकी अपनी नहीं रहती; वह ख़ानदान की सामूहिक मिल्कियत बन जाती है। उसका कपड़ा, प्रेम, निकाह, तलाक़, यहाँ तक कि उसके साथ हुई ज़्यादती भी परिवार की “इज़्ज़त” का मसला बन जाती है।
उमराव जान अदा इस विडंबना का विलक्षण आख्यान है। उमराव के पास ज़ेहन, फ़न, शायरी, तहज़ीब और जज़्बात हैं। मगर समाज उसकी पूरी शिनाख़्त को एक पेशे में समेट देता है। उसकी महफ़िल में आने वाले मर्द उसकी अदाओं और फ़न से लुत्फ़ लेते हैं, लेकिन वही समाज उसे “इज़्ज़तदार” औरत मानने से इनकार करता है।
मंटो की हतक इस सवाल को एक बिल्कुल दूसरे तबक़े में ले जाती है। सौगंधी का पेशा जिस्मफ़रोशी है, मगर उसके भीतर इज़्ज़त-ए-नफ़्स है। जब माधो उसके कमरे और उसके जीवन को एक ऐसे फ़ैसले से देखता है जिसमें उसकी इंसानियत नहीं, उसकी सामाजिक हैसियत निर्णायक है, तो सौगंधी के भीतर का अपमान उभरता है। जिस बाज़ार में उसके जिस्म की क़ीमत लगती है, वहीं उसकी भावनाओं की कोई क़ीमत नहीं।
यही उर्दू अफ़साने की ख़ासियत है—वह “इज़्ज़तदार” और “बदनाम” स्त्री के बीच खड़ी सामाजिक दीवार को गिरा देता है।
जिस समाज ने औरत के जिस्म की क़ीमत तय कर रखी हो, उसे उसकी इज़्ज़त की तफ़्सीर करने का हक़ बहुत कम बचता है।
- पर्दा : कपड़े से ज़्यादा निगाह
पर्दा केवल जिस्म को ढँकने की रवायत नहीं; वह निगाह को नियंत्रित करने की सामाजिक तकनीक भी है।
इस्मत चुग़ताई का लिहाफ़ इसीलिए केवल “यौनिकता” का अफ़साना नहीं है। बेगम जान एक बड़े नवाबी घराने में रहती हैं। उनके शौहर नवाब साहब समाज की निगाह में शरीफ़, प्रतिष्ठित और मर्यादित व्यक्ति हैं, लेकिन वैवाहिक जीवन में बेगम जान की जिस्मानी और भावनात्मक ज़रूरतों से लगभग ग़ायब हैं। उनके कमरे की तन्हाई को रब्बू की मौजूदगी भरती है।
लिहाफ़ कहानी में वस्तु नहीं, मेटाफर बन जाता है। उसके नीचे क्या है, यह बच्ची पूरी तरह नहीं समझती; मगर उसका डर, उसका कौतूहल और उसकी निगाह पाठक को उस चीज़ तक ले जाती है जिसे पूरा समाज देखना नहीं चाहता।
यहाँ पर्दा उलट जाता है।
जिस चीज़ को समाज ने छिपाया था, साहित्य उसे सबसे ज़्यादा दिखाई देने वाली चीज़ बना देता है।
पर्दा अक्सर जिस्म को कम और समाज की बेचैनी को ज़्यादा ढँकता है।
- ख़्वाहिश : इच्छा का भी जेंडर होता है
स्त्री-विमर्श का सबसे मुश्किल सवाल अधिकार नहीं, ख़्वाहिश है।
समाज धीरे-धीरे यह मान सकता है कि औरत पढ़े, नौकरी करे, संपत्ति रखे। मगर जैसे ही औरत कहती है—“मैं यह चाहती हूँ”—नैतिकता का पूरा निज़ाम चौकन्ना हो जाता है।
इस्मत के लिहाफ़ में बेगम जान की ख़्वाहिश दबी हुई है। फ़हमीदा रियाज़ की कविता और कथा-संसार में वही ख़्वाहिश कहीं अधिक बेबाक ज़बान हासिल करती है। वहाँ औरत की देह सिर्फ़ मर्द की निगाह का विषय नहीं रहती; वह अपनी जिस्मानी कैफ़ियत और जज़्बाती ज़रूरतों की मालिक बनने लगती है।इसीलिए फ़हमीदा का हस्तक्षेप महज़ “सेक्सुअलिटी” का नहीं, नैतिक बराबरी का प्रश्न है।
मर्द की ख़्वाहिश—फ़ितरत ।
औरत की ख़्वाहिश—फ़ितना ।
मर्द का तजुर्बा – ज़िंदगी।
औरत का तजुर्बा—चरित्र पर इल्ज़ाम ।
यही दोहरा मयार स्त्री-विमर्श के निशाने पर है।
बराबरी तब पूरी नहीं होती जब औरत को “न” कहने की आज़ादी मिले; तब होती है जब उसके “हाँ” को भी उतनी ही वैधता मिले।
- विवाह : रिश्ता या सामाजिक इंतज़ाम?
विवाह को संस्कार कहने से उसके भीतर की सत्ता-संरचना दिखाई नहीं देती। उर्दू कथा बार-बार दिखाती है कि निकाह केवल दो अफ़राद का रिश्ता नहीं—ख़ानदान, तबक़ा, दहेज, जायदाद, बिरादरी और प्रतिष्ठा का गठजोड़ भी है।
इस्मत चुग़ताई की चौथी का जोड़ा में शादी की तैयारी एक लड़की की ज़िंदगी की तैयारी कम और सामाजिक रस्मों की तैयारी ज़्यादा दिखाई देती है। कपड़े, जोड़-तोड़, रिश्तेदारों की निगाह, आर्थिक चिंता और लड़की के भविष्य को लेकर परिवार की बेचैनी—सब मिलकर उसे एक “दुल्हन” में तब्दील करते हैं। मगर उस लड़की की अपनी आवाज़ कहाँ है?
यहीं हाजरा मसरूर का औरत एक दूसरा आयाम खोलता है। क़ुदसिया और तसद्दुक़ एक-दूसरे से मुहब्बत करते हैं, मगर विवाह नहीं हो पाता। क़ुदसिया काज़िम की बीवी बनती है और बाद में अपने अतीत को पीछे छोड़ देती है। कहानी प्रेम और विवाह के बीच उस सामाजिक अनुशासन को दिखाती है जिसमें एक स्त्री को नए रिश्ते के साथ अपनी पिछली पहचान का भी पुनर्गठन करना पड़ता है।
यहाँ विवाह “प्रेम की परिणति” नहीं, सामाजिक पहचान के पुनर्लेखन का औज़ार बन जाता है।
जिस विवाह में लड़की की रज़ामंदी आख़िरी सूचना हो, वहाँ रस्म पहले होती है, रिश्ता बाद में।
- घर : पनाहगाह भी, सत्ता का मरकज़ भी
“घर औरत का स्थान है”—यह वाक्य जितना मासूम दिखाई देता है, उतना है नहीं। सवाल यह है कि घर में उसकी हुकूमत कितनी है?
ख़दीजा मस्तूर का आँगन इस प्रश्न को निजी और राजनीतिक दोनों सतहों पर रखता है। घर के भीतर स्त्रियों के रिश्ते, विवाह की बातचीत, प्रेम और भविष्य की चिंताएँ चलती रहती हैं, जबकि बाहर हिन्दुस्तान की सियासत, आज़ादी और विभाजन का तूफ़ान आकार ले रहा है।
इससे एक बुनियादी बात खुलती है—निजी संसार कभी निजी भर नहीं होता।
घर के भीतर विवाह की व्यवस्था पर सियासत का असर पड़ता है।
विभाजन की आशंका स्त्री की सुरक्षा को बदलती है।
मर्दों के राजनीतिक फ़ैसले स्त्रियों के जीवन की दिशा तय करते हैं।
औरत आँगन में है, मगर इतिहास उससे बाहर नहीं।
घर इतिहास से महफ़ूज़ जगह नहीं; इतिहास का सबसे निजी कमरा है।
- घरेलू श्रम : “फ़र्ज़” कहकर मेहनत को अदृश्य कर देना
स्त्री के श्रम का सबसे पुराना हथियार है—उसे फ़र्ज़ कह देना।
रोटी बनाना फ़र्ज़।
बच्चे पालना फ़र्ज़।
बुज़ुर्गों की ख़िदमत फ़र्ज़।
मेहमानदारी फ़र्ज़।
पति का ख़याल फ़र्ज़।
घर की भावनात्मक टूट-फूट सँभालना भी फ़र्ज़।
फ़र्ज़ का एक विचित्र मफ़हूम है—जिसका कोई वेतन नहीं, उसका कोई हिसाब भी नहीं।
ख़दीजा मस्तूर का सहारा यहाँ बेहद अर्थपूर्ण है। कहानी की विधवा औरत रात-दिन मेहनत करके अपने बच्चों को कामयाब बनाती है। बेटियाँ ब्याह दी जाती हैं; बड़ा बेटा उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चला जाता है और वहीं अपना घर बसा लेता है। माँ की पूरी ज़िंदगी जिस परिवार को खड़ा करने में गुज़री, उसी परिवार के बिखरने की आशंका अंततः उसके अपने अकेलेपन का सवाल बन जाती है। छोटा बेटा उसके पास रहकर उसकी तन्हाई का सहारा बनता है।
यहाँ स्त्री का श्रम केवल आर्थिक नहीं—भावनात्मक पूँजी भी है।
वह परिवार बनाती है, मगर परिवार की संपत्ति में उसका श्रम अक्सर दर्ज नहीं होता।
औरत के घरेलू श्रम को “ममता” कह देना कभी-कभी उसकी मेहनत की मज़दूरी छिपाने का सबसे ख़ूबसूरत तरीक़ा है।
- आधुनिकता : पुरानी ज़ंजीरें, नये नाम
आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि पुरानी पाबंदियाँ ख़त्म हो गयीं। अक्सर वे केवल अपनी ज़बान बदलती हैं।
पहले कहा गया—“घर से बाहर मत जाओ।”
अब—“बाहर जाओ, मगर घर भी तुम्हीं संभालो।”
पहले—“पढ़ाई की क्या ज़रूरत?”
अब—“पढ़ो, नौकरी करो, मगर घर की ज़िम्मेदारी मत भूलो।”
पहले औरत से त्याग माँगा गया।
अब उससे परफ़ॉर्मेंस भी माँगा जाता है।
यानी आधुनिक स्त्री के पास इख़्तियार बढ़े हैं, मगर अपेक्षाओं का बोझ भी बढ़ा है।
समकालीन उर्दू अफ़साना इसी नई कशमकश को पकड़ रहा है—शहरी तन्हाई, नौकरी, आर्थिक दबाव, बदलते रिश्ते और तकनीकी जीवन।
नई औरत के सामने पुरानी पाबंदी का नया संस्करण है—“तुम सब कर सकती हो; इसलिए सब कुछ तुम्हें ही करना होगा।”
- माँ बनना : तक़दीस और व्यक्ति के बीच
स्त्री के बारे में सबसे ताक़तवर संस्कारों में से एक है—माँ को देवी बना देना।
लेकिन साहित्य पूछता है: देवी बनने की प्रक्रिया में इंसान कहाँ जाता है?
जीलानी बानो का A Day in the Labour Room इस प्रश्न को असाधारण रूप से भौतिक धरातल पर लाता है। एक महिला डॉक्टर के नज़रिए से अस्पताल का एक साधारण दिन सामने आता है। उसके सामने अलग-अलग औरतें हैं—एक कम उम्र की गर्भवती लड़की, एक कमज़ोर औरत जो गर्भपात के निर्णय को लेकर हिचक रही है, और एक विवाहित स्त्री की लाश। ये दृश्य डॉक्टर को स्त्री के शरीर, गर्भावस्था, abortion (गर्भपात) और अपने शरीर पर अधिकार के प्रश्न तक ले जाते हैं। कहानी का बड़ा सवाल यह है कि गर्भ किसका है—समाज का, परिवार का, पति का, या उस औरत का जिसके शरीर में वह पल रहा है?
यहीं मातृत्व की परंपरागत तक़दीस एक नए सवाल से टकराती है।
अगर माँ बनना सबसे पवित्र अनुभव है, तो क्या माँ न बनने का निर्णय भी स्त्री का अधिकार है?
अगर गर्भ धारण करना उसका शरीर करता है, तो निर्णय का इख़्तियार किसका होगा?
समकालीन स्त्री-विमर्श यहाँ मातृत्व को नकारता नहीं; वह उसका स्वामित्व वापस स्त्री को देना चाहता है।
माँ होना सम्मान है; माँ बनने के लिए मजबूर होना सम्मान नहीं।
- घरेलू ज़िम्मेदारी और अदृश्य भावनात्मक श्रम
घरेलू श्रम का एक हिस्सा दिखाई देता है—खाना, सफ़ाई, कपड़े। दूसरा हिस्सा दिखाई ही नहीं देता—रिश्तों को बचाए रखना।
कौन किससे नाराज़ है?
किसे कब फ़ोन करना है?
बेटे की परीक्षा है।
सास की तबीयत है।
पति का मूड ख़राब है।
बेटी का रिश्ता टूट गया।
भाई की शादी है।
घर में मेहमान आ रहे हैं।
यह पूरा भावनात्मक इंतज़ाम अक्सर स्त्री के ज़िम्मे होता है।
ख़ालिदा हुसैन की कहानियों की स्त्रियाँ इसीलिए केवल बाहरी शोषण की शिकार नहीं हैं; वे अपनी भीतरी दुनिया से भी जूझती हैं। पहचान, दरवाज़ा, मसरूफ़ औरत और आधी औरत जैसे पाठों में स्त्री की बाहरी सामाजिक स्थिति और उसकी अंदरूनी कैफ़ियत के बीच गहरा रिश्ता दिखाई देता है।
- बाज़ार : पितृसत्ता का नया चेहरा
पहले कहा गया—“जिस्म ढको।”
अब कहा जाता है—“जिस्म perfect बनाओ।”
पहले निगाह घर और बिरादरी की थी।
अब कैमरा, विज्ञापन और सोशल मीडिया भी निगाह में शामिल हैं।
पहले स्त्री की देह पर नैतिक पहरा था।
अब उसी देह पर बाज़ार का सौंदर्य-नियंत्रण है।
यानी नियंत्रण समाप्त नहीं हुआ; उसका मिज़ाज बदल गया।
स्त्री को कभी पर्दे में छिपाया गया, कभी विज्ञापन में प्रदर्शित किया गया। दोनों स्थितियों में सवाल वही है—क्या वह अपने शरीर की मालिक है?
पितृसत्ता कहती थी—अपनी देह छिपाओ; बाज़ार कहता है—उसे बेचने लायक बनाओ।
- डिजिटल औरत : “लोग क्या कहेंगे?” का नया अवतार
आज सामाजिक निगरानी का रूप बदल गया है।
पहले माँ पूछती थी—“कहाँ जा रही हो?”
अब परिवार पूछ सकता है—“किससे चैट कर रही हो?”
पहले पड़ोस देखता था कि कौन आया।
अब social media देखता है कि किसकी तस्वीर पर क्या टिप्पणी की।
पहले प्रतिष्ठा मोहल्ले में बनती थी।
अब डिजिटल प्रोफ़ाइल भी सामाजिक पहचान का हिस्सा है।
समकालीन उर्दू अफ़साने में तकनीकी युग की तन्हाई, सामाजिक दबाव और बदलते रिश्तों की उपस्थिति पर विशेष ध्यान देने लायक है।
इसलिए आधुनिकता ने “लोग क्या कहेंगे?” समाप्त नहीं किया।
उसने उसे online कर दिया।
“लोग क्या कहेंगे?” ने मोबाइल ख़रीद लिया है।
- नयी स्त्री और नयी अपेक्षाएँ
आज की औरत से कहा जाता है—
पढ़ो।
कमाओ।
स्वावलंबी बनो।
अच्छी बेटी बनो।
अच्छी पत्नी बनो।
अच्छी माँ बनो।
सुंदर दिखो।
स्वस्थ रहो।
सफल रहो।
और शिकायत मत करो।
यानी पुरानी ज़िम्मेदारियों के ऊपर आधुनिक सफलता का पूरा नैरेटिव रख दिया गया है।
यहाँ समकालीन स्त्री का सबसे बड़ा विरोधाभास पैदा होता है।
उसके पास पहले से अधिक इख़्तियार है।
लेकिन उसके सामने पहले से अधिक expectations भी हैं।
आधुनिक स्त्री को आज़ादी मिली है—और उसके साथ हर भूमिका में उत्कृष्ट होने की नई पाबंदी भी।
- क्या हर संस्कार स्त्री-विरोधी है?
यहाँ स्त्री-विमर्श को एक सपाट घोषणापत्र बनने से रोकना ज़रूरी है।
हर परंपरा ज़ुल्म नहीं।
हर आधुनिकता मुक्ति नहीं।
हर विवाह कैद नहीं।
हर तलाक़ मुक्ति नहीं।
हर मातृत्व दमन नहीं।
हर करियर स्वतंत्रता नहीं।
असल सवाल संस्कार बनाम आधुनिकता नहीं है।
असल सवाल है—
क्या व्यक्ति को अपने जीवन की ताबीर ख़ुद करने का इख़्तियार है?
अगर कोई स्त्री विवाह चुनती है—यह उसकी agency है।
अगर वह विवाह नहीं चुनती—यह भी उसकी agency होनी चाहिए।
अगर वह माँ बनना चाहती है—उसका सम्मान होना चाहिए।
अगर नहीं बनना चाहती—उसकी रज़ामंदी का भी सम्मान होना चाहिए।
अगर वह घर सँभालना चाहती है—उसे “पिछड़ी” कह देना उतना ही अनुचित है जितना नौकरी करने वाली स्त्री को “घर-विरोधी” कहना।
इसलिए स्त्री-विमर्श का अंतिम मफ़हूम संस्कार-विरोध नहीं, इख़्तियार की बहाली है।
मुक्ति का अर्थ परंपरा को जला देना नहीं; परंपरा के भीतर अपने लिए जगह चुनने का हक़ हासिल करना भी है।
संस्कार तब तक संस्कार हैं जब तक वे इंसान को वसीअ बनाते हैं; जिस दिन वे उसकी आवाज़ को महदूद करने लगें, वे संस्कार नहीं—सत्ता की रवायत बन जाते हैं।
और उर्दू अफ़साने की इस लंबी रवानी में सबसे बड़ा बदलाव यही है—
पहले औरत कहानी का किरदार थी; फिर कहानी का मसला बनी; फिर कहानी की आवाज़ बनी; और अब वह अपनी कहानी की मुसन्निफ़ बनने का हक़ माँग रही है।
