दिन विशेष प्रवासी रचना में डॉ. पद्मेश गुप्त की रचना “भारतीय भाषाएँ : हमारी सांस्कृतिक सरगम के स्वर”

Padmesh gupt

जर्मनी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी करने वाले विद्वान लेखक-विचारक डॉ. पद्मेश गुप्त के अनुभव हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं के पक्ष में महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं के अस्तित्त्व को इस महादेश की संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने के लिए अनिवार्य माना है. यह आलेख भारतीय भाषाओं के समग्रतावादी विकास पर बल दिया है. वास्तव में, यह आलेख न केवल ज्ञानवर्धक है अपितु भारतीय भाषाओं के संबंध में डॉ. पद्मेश की चिंताओं को भी रेखांकित करता है. – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र, संपादक

“भारतीय भाषाएँ : हमारी सांस्कृतिक सरगम के स्वर”

हाल ही में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में वैश्विक हिंदी परिवार के संयोजन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा संगोष्ठी एवं अंतरराष्ट्रीय बहुभाषी कवि सम्मेलन में सम्मिलित होना मेरे लिए केवल एक साहित्यिक आयोजन में भाग लेना नहीं था, बल्कि अपनी भाषायी और सांस्कृतिक जड़ों को एक नए वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने, समझने और अनुभव करने का अवसर था। दिनांक 22 अगस्त 2026 को आयोजित इस सम्मेलन में मुझे अध्यक्ष के रूप में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला।
भारत से हजारों किलोमीटर दूर जर्मनी की धरती पर जब हिंदी के साथ-साथ तमिल, गुजराती, कन्नड़, मराठी, पंजाबी, बांग्ला, उड़िया और अन्य भारतीय भाषाओं के स्वर एक ही मंच से सुनाई दिए, तो मन में एक अत्यंत सुखद अनुभूति हुई। लगा कि भारत की भौगोलिक सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं की कोई सीमा नहीं। वे अपने बोलने वालों के साथ यात्राएँ करती हैं, नए देशों में पहुँचती हैं, वहाँ नए घर बनाती हैं और फिर अगली पीढ़ियों में अपनी जड़ों की स्मृति बनकर जीवित रहती हैं। सम्मेलन में विभिन्न भारतीय भाषाओं के कवियों और रचनाकारों की व्यापक उपस्थिति इसी जीवंतता का प्रमाण रही।
इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए यह रही कि भारतीय भाषाओं के वैश्विक स्वरूप और विशेष रूप से यूरोप में उनके लिए हो रहे साहित्यिक, अकादमिक और शैक्षिक कार्यों को निकट से जानने का अवसर मिला। यह आयोजन श्री अनिल जोशी जी के भाषायी प्रेम और समर्पण को प्रदर्शित करता नया अध्याय था। यूरोप के अनेक भाषा प्रेमियों, शिक्षकों, लेखकों और सामाजिक संस्थाओं को एक मंच पर लाकर इतना वृहद आयोजन नए इतिहास का आगाज है।
यह जानना उत्साहवर्धक था कि यूरोप में भारतीय भाषाएँ केवल प्रवासी परिवारों के घरों अथवा साहित्यिक गोष्ठियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों में भी उनके अध्ययन और अध्यापन को लेकर गंभीर कार्य हो रहा है।
सम्मेलन के समापन-सत्र का विषय भी अत्यंत सार्थक था—‘भारतीय भाषा शिक्षण : स्थिति, चुनौतियाँ और अवसर।’ इसमें ट्यूबिंगन और ज्यूरिख विश्वविद्यालय से जुड़े दिव्यराज अमिय जी, फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. अजीत सिंह सिकंद जी तथा अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के निदेशक डॉ. जवाहर कर्णावत जी जैसे विद्वानों की सहभागिता ने इस विमर्श को एक व्यापक अकादमिक आयाम दिया।
इस अवसर पर कपिल कुमार जी की गरिमामयी उपस्थिति भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। साहित्य और ग़ज़ल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता तथा बेल्जियम में रहकर भारतीय भाषा, कला और संस्कृति को जोड़ने का उनका प्रयास इस बात का सुंदर उदाहरण है कि प्रवासी भारतीय किस प्रकार अपनी सांस्कृतिक जड़ों को यूरोप की धरती पर निरंतर सींच रहे हैं। वे सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इसी प्रकार वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी जी की उपस्थिति ने भारत की प्रकाशन और साहित्यिक परंपरा को इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। राकेश भटनागर जी जैसे लंबे समय से जर्मनी के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से जुड़े व्यक्तित्व का सान्निध्य भी सुखद रहा। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि विदेशों में भाषा और संस्कृति का कोई भी आंदोलन केवल लेखकों और मंचों के सहारे आगे नहीं बढ़ता। उसके पीछे ऐसे अनेक लोग होते हैं जो समाज को जोड़ते हैं, संस्थाओं को जोड़ते हैं और अपनी संस्कृति के लिए निरंतर सक्रिय रहते हैं। ऐसे व्यक्तित्व विदेश में भारतीयता और भारतीय भाषाओं के लिए अदृश्य सेतु का कार्य करते हैं।
नीदरलैंड से आए विश्वास दुबे जी और मनीष पांडेय ‘मनु’ जी से मिलना भी आत्मीय और साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध करने वाला अनुभव रहा। दोनों कवि और लेखक के रूप में सम्मेलन में सम्मिलित थे। विश्वास दुबे जी की पुस्तक ‘दिल से दिल तक’ का लोकार्पण और डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना द्वारा संपादित ‘जर्मनी की चयनित रचनाएँ’ का लोकार्पण इस आयोजन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रहा। इससे यह भी अनुभव हुआ कि यूरोप में भारतीय भाषाओं में हो रहा सृजन केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पुस्तकों में दर्ज होकर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक साहित्यिक दस्तावेज भी बन रहा है। अनेक नए रचनाकारों से परिचय और उनका सान्निध्य इस सम्मेलन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। साहित्य हमें पुस्तकों में मिलता है, लेकिन साहित्य की वास्तविक ऊर्जा उन लोगों से मिलने पर महसूस होती है जो उसे जीते हैं। जर्मनी और यूरोप के अलग-अलग हिस्सों में बसे ये रचनाकार अपनी-अपनी भाषाओं में लिखते हुए वास्तव में भारत की स्मृतियों, संस्कारों और संवेदनाओं को जीवित रख रहे हैं।
इन सभी को सुनते हुए मेरे मन में बार-बार भारतीय संगीत की एक उपमा आती रही। हमारी सरगम के सात स्वर हैं—सा, रे, ग, म, प, ध, नि। कल्पना कीजिए कि इनमें से किसी एक स्वर को यह कहकर हटा दिया जाए कि उसकी आवश्यकता कम है। संगीत शायद तब भी बज सके, लेकिन क्या वह पूर्ण संगीत होगा?
मुझे लगा कि यही संबंध भारत और उसकी भाषाओं का है।
भारत स्वयं एक विशाल राग है और उसकी भाषाएँ उस राग के अलग-अलग स्वर हैं।
इनमें कोई स्वर बड़ा नहीं और कोई छोटा नहीं। कोई भाषा दूसरी भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं है। एक भाषा को कमजोर करके दूसरी भाषा कभी समृद्ध नहीं हो सकती। हिंदी की उन्नति तमिल के कम होने में नहीं है और तमिल की प्रतिष्ठा हिंदी के विरोध में नहीं है। संस्कृत, हिंदी, तमिल, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, उड़िया और हमारी अन्य सभी भाषाएँ मिलकर उस विशाल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को जन्म देती हैं जिसे हम भारतीय साहित्य कहते हैं।
संस्कृत में हमारी सभ्यता की स्मृति, दर्शन और ज्ञान-परंपरा का विराट संसार है। वेदों, उपनिषदों और महाकाव्यों से लेकर दर्शन, व्याकरण और काव्यशास्त्र तक उसने भारतीय चिंतन को एक गहरी बौद्धिक आधारभूमि दी है।
हिंदी की अपनी विशेषता उसकी व्यापक संवाद-क्षमता और ग्रहणशीलता में है। उसने अलग-अलग बोलियों, संस्कृतियों और भाषाओं से शब्दों तथा संवेदनाओं को अपनाकर अपने संसार को विस्तृत किया है। भारत के अनेक क्षेत्रों के साथ-साथ विश्व के विशाल प्रवासी समाज में भी वह संवाद का एक महत्वपूर्ण सेतु बनी है।
गुजराती में उद्यमशीलता और प्रवासी चेतना के साथ भक्ति और गांधीवादी विचार की गहरी परंपरा दिखाई देती है। दुनिया के अनेक देशों में बसे गुजराती समाज ने अपनी भाषा को घर, परिवार, व्यापार और संस्कृति के साथ जिस प्रकार जीवित रखा है, वह स्वयं एक प्रेरक उदाहरण है।
पंजाबी अपने भीतर मिट्टी की गंध, लोकजीवन की ऊर्जा, प्रेम, वीरता और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम रखती है। गुरबाणी से लेकर लोकगीतों तक उसमें ऐसी सहज लय है जो सीमाओं को पार कर सीधे मनुष्य के हृदय से संवाद करती है।
बांग्ला ने भारतीय साहित्य को संवेदना, सौंदर्य, आधुनिकता और बौद्धिक चेतना का विलक्षण संसार दिया है। मराठी में संत परंपरा, सामाजिक चेतना और वैचारिक दृढ़ता की अपनी शक्ति है। तमिल संसार की प्राचीन जीवित भाषायी परंपराओं में से एक है, जिसकी समृद्ध साहित्यिक विरासत भारतीय सभ्यता की प्राचीनता और निरंतरता का परिचय देती है। कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, उड़िया, असमिया और हमारी अन्य भाषाएँ भी अपने भीतर अपने क्षेत्र का इतिहास, लोक-स्मृति, दर्शन और जीवन की विशिष्ट अनुभूतियाँ संजोए हुए हैं।
फ्रैंकफर्ट में यह बहुभाषिकता केवल विचार के स्तर पर नहीं थी। संस्कृत, गुजराती, हिंदी, तेलुगु, मलयालम सहित अनेक भारतीय भाषाओं से जुड़े प्रतिनिधि सम्मेलन का हिस्सा थे।
उस दृश्य को देखकर मुझे लगा—हम एक भाषा में भारत को पढ़ अवश्य सकते हैं, लेकिन सम्पूर्ण भारत को समझने के लिए हमें उसकी अनेक भाषाओं के द्वार खोलने पड़ेंगे।
पिछले कई दशकों से ब्रिटेन और विश्व के प्रवासी भारतीय समाज के बीच रहते और हिंदी के लिए कार्य करते हुए मैंने एक बात बार-बार अनुभव की है कि भारत से बाहर निकलते ही अपनी भाषा का महत्व और बढ़ जाता है। भारत में भाषा हमारे चारों ओर सहज रूप से उपस्थित रहती है, लेकिन विदेश में वही भाषा घर की स्मृति बन जाती है। माँ की आवाज़, बचपन की कहानी, त्योहार का गीत, दादी-नानी की कहावत और अपनी मिट्टी की गंध—सब कहीं न कहीं भाषा में आकर बस जाते हैं।
इसीलिए विदेश में हिंदी, तमिल, पंजाबी, गुजराती अथवा किसी भी भारतीय भाषा को पढ़ाने वाला शिक्षक केवल शब्द और व्याकरण नहीं सिखा रहा होता; वह अगली पीढ़ी को उसकी सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ रहा होता है। शायद, इसीलिए सम्मेलन में भारतीय भाषा शिक्षण की स्थिति, उसकी चुनौतियों और अवसरों पर हुआ विमर्श मुझे विशेष रूप से महत्वपूर्ण लगा।
आज वैश्वीकरण, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भारतीय भाषाओं के सामने नई चुनौतियाँ भी हैं और अभूतपूर्व अवसर भी। नई पीढ़ी की संवाद-शैली बदल रही है, दुनिया छोटी होती जा रही है और भाषाओं के बीच की दीवारें तकनीक लगातार कम कर रही है। ऐसे समय में हमें यह बहस कम करनी चाहिए कि कौन-सी भारतीय भाषा बड़ी है और कौन-सी छोटी। इसके स्थान पर हमें यह सोचना चाहिए कि हमारी सभी भारतीय भाषाएँ मिलकर विश्व के भाषायी और साहित्यिक मानचित्र पर अधिक प्रभावशाली कैसे बनें।
इस दिशा में अनुवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि तमिल की श्रेष्ठ रचना हिंदी और गुजराती में पहुँचे, पंजाबी कविता मलयालम में पढ़ी जाए, मराठी साहित्य बांग्ला में पहुँचे और फिर यही साहित्य अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रेंच तथा दूसरी विश्व भाषाओं के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय पाठक तक पहुँचे, तो भारतीय साहित्य का वैश्विक विस्तार कई गुना बढ़ सकता है। हमें भारतीय भाषाओं के बीच पुल बनाने हैं, दीवारें नहीं।
फ्रैंकफर्ट से लौटते समय मेरे साथ केवल एक सम्मेलन की स्मृतियाँ नहीं थीं। कपिल कुमार जी, अनिल जोशी जी, अरुण माहेश्वरी जी, जवाहर कर्णावत जी, दिव्यराज अमिय जी, अजीत सिंह सिकंद जी, राकेश भटनागर जी, विश्वास दुबे जी, मनीष पांडेय ‘मनु’ जी और अनेक नए रचनाकारों के साथ हुए संवाद भी मेरे साथ थे। मुझे फिर लगा कि भाषाएँ केवल पुस्तकों में जीवित नहीं रहतीं; उन्हें जीवित रखते हैं वे लोग जो उन्हें बोलते हैं, लिखते हैं, पढ़ाते हैं, प्रकाशित करते हैं और अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं।
जर्मनी की इस यात्रा ने मेरे भीतर यह विश्वास और अधिक दृढ़ किया कि भारत की बहुभाषिकता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्तियों में से एक है। हमारी भाषाएँ अलग-अलग नदियाँ अवश्य हैं, लेकिन उनकी सांस्कृतिक स्मृति का समुद्र एक है। उनकी लिपियाँ अलग हैं, ध्वनियाँ अलग हैं, मुहावरे अलग हैं, लेकिन उनके भीतर मनुष्य के सुख-दुःख, प्रेम-विरह, संघर्ष, अध्यात्म, परिवार और प्रकृति की संवेदनाएँ कहीं न कहीं एक-दूसरे से संवाद करती हैं।
रणजीत चौधरी और रुद्रदेव जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं से परिचय और उनकी गतिविधियों को जानकर सुख मिला। स्थानीय ना होते हुए भी तितिक्षा जी की आयोजन में सक्रियता प्रशंसनीय थी।
शायद, इसीलिए फ्रैंकफर्ट में मुझे लगा कि मैं अनेक भाषाएँ नहीं सुन रहा था—मैं भारत को अनेक स्वरों में सुन रहा था।
कहीं संस्कृत की प्राचीन अनुगूँज थी,
कहीं तमिल की शाश्वत धारा,
कहीं पंजाबी की मिट्टी की महक थी,
कहीं गुजराती की प्रवासी चेतना,
कहीं बांग्ला की कोमल संवेदना और
कहीं हिंदी का विस्तृत आलिंगन।
इनमें से किसी एक स्वर को भी कम कर दीजिए, गीत शायद फिर भी चलता रहेगा—लेकिन वह भारत का पूरा गीत नहीं होगा।
जर्मनी के उस सम्मेलन से मिली मेरी सबसे बड़ी अनुभूति और प्रेरणा शायद यही है कि भारतीय भाषाओं का भविष्य किसी एक भाषा की विजय में नहीं, बल्कि सभी भाषाओं की साझा यात्रा में है। जब सभी स्वर साथ होंगे, तभी भारत की सरगम पूर्ण होगी।

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