नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जना – श्री अनिल जोशी : डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना
जन्मदिन विशेष – श्री अनिल जोशी
मात्र हिन्दी ही नहीं भारतीय भाषाओं को केवल भाषा के रूप में नहीं, वरन एक जीवंत संस्कृति, एक वैश्विक परिवार और एक आत्मीय पहचान के रूप में स्थापित करने के लिए कृत संकल्प व्यक्तित्व आदरणीय श्री अनिल जोशी जी को जन्मदिन की असीम अनंत शुभकामनाएँ।
कहते है “नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः” अर्थात् जिस प्रकार फलों से लदा वृक्ष विनम्रता से झुक जाता है ठीक वैसे ही ज्ञान वान, प्रबुद्ध, शालीन व्यक्ति विनम्र होता है, ये श्लोक आदरणीय जोशी जी के व्यक्तित्व पर पूर्णतः चरितार्थ होता है। 2 वर्ष पूर्व आदरणीय जोशी जी के आमंत्रण पर, भारत प्रवास के मध्य आपसे प्रवासी भवन में व्यक्तिगत स्तर पर भेंट हुई थी और उससे पहले वो मेरी पुस्तक के लोकार्पण पर भी अपना आशीष देने कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे। भारत में अपनी व्यस्त दिनचर्या के मध्य भी उनका सहज भाव से मेरे आमंत्रण को स्वीकार करना एवं कार्यक्रम में पूरे समय उपस्थित रहना, उनकी सौम्यता उनकी विनम्रता का परिचायक था। इससे पूर्व भी दूरभाष और ऑनलाइन कार्यक्रमों के माध्यम से आपको कई बार सुनने का सौभाग्य मिला था मुझे, पर ये सच है आभासी पटल आभासी ही होता है सामने से व्यक्तिगत रूप में मिलने से आप सिर्फ व्यक्ति से नहीं मिलते बल्कि उनके व्यक्तित्व के गुणों को आत्मसात भी कर लेते है, मेरे साथ भी यही हुआ जिस त्वरित गति से अनिल जी ने एक दिन के अंतराल में प्रवासी भवन में भव्य आयोजन आयोजित किया और श्रेष्ठ साहित्य अनुरागियों को जोड़ा, वो मात्र प्रशंसा का ही विषय नहीं था बल्कि उनके साहित्य और साहित्यनुरागियों के प्रति अपनत्व एवं समर्पण भाव का परिचायक था।
निश्चित ही भारत में हुई ये छोटी सी मुलाकात पूर्णतः औपचारिक थी, जिसमें आदरणीय अनिल जी की लगन, निष्ठा, समर्पण ,आयोजन क्षमता एवं साहित्य प्रेम को निकट से समझने का अवसर मिला। वो एक कर्मठ, जुझारू, दृढ़ निश्चय से परिपूर्ण , हिंदी भाषा एवं साहित्य को समर्पित अथक साधक है। जिनकी साधना के पुण्य फल स्वरूप वैश्विक हिन्दी परिवार विश्व पटल पर भारतीय भाषाओं, साहित्य एवं संस्कृति का परचम लहरा रहा है।
सौभाग्य से इस वर्ष उनकी बेटी कृति और नाती नीर का ऑफिशियल कारणों से जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर आना हुआ। मै भी जर्मनी में ही रहती हूँ, इस संदर्भ में अनिल जी से विगत कुछ माह से निरंतर संपर्क हुआ और उनके जर्मनी आगमन पर उनसे मुलाकात भी। ये अवसर था अनिल जी के व्यक्तित्व के कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का और उसमें सबसे प्यारा रूप था “नीर के नानू” का। अपने विचारों में स्पष्ट, दूर दृष्टा, कुशल आयोजक, गंभीर चिंतक, वरिष्ठ साहित्यकार रूप में तो आपको सब जानते है किंतु अनिल जी का नीर के साथ राइन नदी के किनारे बतखों को पकड़ने के लिए दौड़ना, तो कभी नीर की भोली भोली बातों में मगन रहना, तो कभी उंगली पकड़ कर नीर की नटखट चमकती आंखों के हर स्वप्न को पूरा करने की ललक, उनका ये रूप देखना सच में सबसे सुखद था।
जिस तरह से उत्साह के साथ अनिल सर एवं सरोज भाभी ने हमें एवं भारत से जर्मनी प्रवास पर आई कविता जी का सत्कार किया, अत्यंत स्नेह से स्वादिष्ट खाना खिलाया, फ्रैंकफर्ट के ऐतिहासिक स्थानों का भ्रमण कराया एवं उसके इतिहास से परिचित कराया, वो अविस्मरणीय आत्मीय अनुभव था हम सब के लिए। आगे बढ़ बढ़ कर सब जानने की उत्कंठा और फिर हम सब को उस जानकारी से अवगत कराना, मैने एक साथ एक ही समय पर जोशी सर के अंदर बच्चों सी जिज्ञासा और घर के वरिष्ठ होने का भाव देखा।
वो युगदृष्टा है, इतिहास को जानकर, वर्तमान के कार्यों से भविष्य का निर्माण करने वाले एक कर्मठ व्यक्तिव और उनकी इसी कर्मठता से हम सबने मिलकर उनके सानिध्य में फ्रैंकफर्ट, जर्मनी में “अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा संगोष्ठी एवं बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन 2026” का सफल आयोजन किया। इस पूरे आयोजन के मध्य सबको समान रूप से सम्मान देना, साथ लेकर चलने की इच्छा, भारतीय भाषाओं को लेकर उनकी चिंता, समाधान एवं संभावनाओं को खोजने की जिज्ञासा तथा अधिकांशतः भारतीय भाषाओं को एक मंच पर एक साथ लाने की अदम्य इच्छा शक्ति ने उनके कर्मशील स्वरूप से परिचित करवाया मुझे। इस अधिवेशन की तैयारियों की पूरी यात्रा में अनिल सर से बहुत कुछ सीखा और परिणाम स्वरूप देखा कि धैर्य, संयम, निष्ठा, समर्पण और जो ठान लिया है वो करके दिखाना है, मन में ये संकल्प लेने मात्र से हर कार्य किया जा सकता है।
अनिल जोशी जी का व्यक्तित्व, उनकी विनम्रता, सहजता और गहरी मानवीय संवेदनशीलता एवं दूरगामी दृष्टि ने आज वैश्विक हिन्दी परिवार को सच में वैश्विक बना दिया है। वे जहाँ एक ओर भारतीय उच्चायोग, लंदन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे, वहीं दूसरी ओर फीजी में भारतीय हाई कमीशन में द्वितीय सचिव (हिंदी एवं संस्कृति) और सांस्कृतिक केंद्र, चांसरी ( निदेशक) के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं।
वे हिन्दी के एक सच्चे सेवक एवं एक संवेदनशील चिंतक के रूप में उपस्थित रहे। उनकी कविताओं एवं विचारों में हमेशा एक स्पष्टता झलकती है, जो श्रोताओं को तुरंत अपने से जोड़ लेती है।
हिन्दी के वैश्विक विस्तार में अनिल जोशी जी का कृतित्व अत्यंत विविधतापूर्ण और प्रभावशाली रहा है। आपने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, भारत सरकार की पत्रिका ‘अनुशीलन’, भारतीय उच्चायोग, लंदन की पत्रिका ‘भारत भवन’, और हिंदी की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘अक्षरम संगोष्ठी’ में उनकी संपादकीय भूमिका का निर्वहन किया है।
सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन (2003) में प्रकाशित ‘सम्मेलन समाचार’ के सह-संपादक के रूप में उन्होंने वैश्विक हिन्दी मंच को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंदन और फीजी जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान अतुलनीय रहा है।
साथ ही आप प्रवासी साहित्य, हिन्दी शिक्षण और भारतीय संस्कृति के अंतरराष्ट्रीयकरण के विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। “अनिल जोशी जी केवल एक अधिकारी या आयोजक नहीं हैं — वे हिन्दी के एक सच्चे साधक हैं, जो भाषा को सीमाओं से परे ले गए। उनकी आँखों में हिन्दी का सपना है, और उनके कर्म में उस सपने को साकार करने का संकल्प।”
उनकी उपस्थिति हर कार्यक्रम में एक विशेष ऊर्जा लाती है। चाहे वह लंदन में आयोजित कोई हिन्दी गोष्ठी हो, फीजी में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम, विश्व हिंदी सम्मेलन का कोई सत्र या जर्मनी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन अनिल जोशी जी हमेशा अपनी सकारात्मक ऊर्जा से मंच को एवं दर्शकों को सम्मोहन में लिए रहते है। आपके वैश्विक हिन्दी परिवार की छाया में हजारों हिन्दी प्रेमियों ने अपनी पहचान बनाई और हिन्दी को विश्व पटल पर स्थापित किया है।
“उनका जीवन हमें सिखाता है कि भाषा की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।”
आपका ये सेवा भाव, ये समर्पण ये सकारात्मक ऊर्जा यूं ही आशीष बनकर हम सबको ऊर्जावान करती रहे। आप स्वस्थ रहे और हम सब मिलकर यूं ही भारत का परचम विश्व पटल पर लहराते रहे यही कामना है।
जन्मदिन की असीम शुभकामनाएँ —–


