दिन विशेष कविता : सत्य सिन्हा ‘अहमक’ की कविताएँ

आज पढ़िए सत्य सिन्हा ‘अहमक’(एल्क ग्रोव, कैलिफोर्निया) की रचनाएँ। सेवानिवृत्त भूगर्भ शास्त्री होने के नाते ज़मीन से उनका गहरा रिश्ता उनकी कविताओं में भी दिखता है। पिछले दो सालों से ही उन्होंने लेखनी को अपनी अभिव्यक्ति का ज़रिया बनाया है लेकिन सालों का मंथन उनकी कलम में दिखता है। – स्वरांगी साने

Satya sinha

क्या कर बैठे हैँ


इस अंधी भीड़ को कौम ही कह बैठे हैँ
हम तो सयाने हैँ, कैसी खता कर बैठे हैँ

हुस्न-ए-ताम कोई गर है तो वो तुम हो
छत से हम अब तो ये ऐलान कर बैठे हैँ

अब्र, धनुक, सितारों ने घर को सजाया है
सुना आओगे, फ़रिश्ते पलकें बिछाए बैठे हैँ

कुछ तो उनकी उम्मीदें हैँ, कुछ बेकरारी है
न जाने कब से वो इक आस लिए बैठे हैँ

इस मंज़र में वो सायेदार दरख्तों को ढूंढते हैँ
सहरा में हम साहिल की उम्मीद लिए बैठे हैँ

इस नए सफर में कोई कुछ दे गया है हमें
किसी के आँसूवों का हम सैलाब लिए बैठे हैँ

बिछड़ गए हैँ, अब मीर-ए-कारवां को कहाँ ढूंढें
थक-हार के हम तो अब बरगद के तले बैठे हैँ

किसी की रानाई पे कुछ इस कदर फिदा हैँ
के सही-गलत के फ़र्क को हम भूल बैठे हैँ

तुम्हारे ऐबों की हिफ़ाज़त करने क्या निकले
सारी दुनिया से हम तो बग़ावत कर बैठे हैँ

उस ज़मींदार को फुरसत नहीं ज़ुल्म ढाने से
और हम उसके रहम का अरमान लिए बैठे हैँ

तवाफ़ को निकले हो तुम तो ये खयाल रहे
तुम्हारी करतूतों की वो फेहरिस्त लिए बैठे हैँ

वो तो मसरूफ़ हैँ जहाँ की उलझनें सुलझाने में
और इक हम के अपने छालों को दिखाने बैठे हैँ

आज अकेला, तन्हा ही छोड़ दो हमें ‘अहमक’
आज हम अपने जख्मों पे मरहम लगाने बैठे हैँ

२ . सोची है


मौसमों का लिबास अगर चेहरे पे ओढ़ने की सोची है
तो बसंत क्या बुरा है, तूने क्यूँ बारिशों की सोची है

ये तेरी क्या अदा है, रुख़सार पे चमक क्या है ज़ालिम
लगता है तूने आज फिर मजनूवों को सताने की सोची है

तू न आए जो पलट के तो क्या है, जीना है, सो जी लेंगे
कुछ तो खुद्दारी है, हमने तेरे बिना खुश रहने की सोची है

क्यूँ लगता है तुझे, के खुशियों पे तेरे अकेले का दावा है
बहुत हुआ, आज तो हमने तुझे चुनौती देने की सोची है

तुझे शिकायत है के कहता तो हूँ, पर रूमानी बातें नहीं कहता
तू सुने तो सुन, आज तुझे अपने दिल की सुनाने की सोची है

क्या सोचता है, किस गफलत में पड़ा है, ये तो न हो पाएगा
काबिल है पर इतना नहीं, जो वक़्त के धारों को रोकने की सोची है

लोग आते हैँ, लोग आएंगे, कुछ यकीनन अपनी छाप छोड़ जाएंगे
हम जो याद आयें तुझे, सो इक ग़ज़ल सुनाने की हमने भी सोची है

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