दिन विशेष लघुकथा : “अपनी ज़मीन से कटन” और “प्रतीक्षा” – रमेश यादव
अपनी ज़मीन से कटना
तेज आँधी में सूखे पत्तों के साथ कुछ कमजोर हरे पत्ते भी गिर गए। इतने दिनों तक पेड़ का साथ था तो वे हरे-भरे, लहलहाते हुए पेड़ की शोभा बने हुए थे। धरा पर गिरे ये पत्ते अपनी- अपनी नियति को दोष देते हुए अनिच्छा से हवा की दिशा में उड़ने को मजबूर थे। पेड़ से अलग होकर लगभग सभी पत्तों का वज़ूद शून्य हो गया था। ‘अब आगे क्या होगा’! सोचते हुए एक पत्ता हवा के साथ इधर-उधर उड़ा जा रहा था। ताजगी खो चुके उस पत्ते का रंग भूरा हो गया था। पेड़ के प्रति शिकायत करते हुए पास उड़ रहे पत्तों से वह बोला,साथियों हमारे बिछुड़ने पर पेड़ ने ना कोई दुख जताया, ना ही कोई अफसोस।
“ठीक कह रहे हो भाई।” उड़ते हुए अन्य पत्तों ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई ।
“भाइयों पेड़ को हमारी चिंता थी या नहीं ये तो वही जानें मगर उसके साथ हमारा इतने दिनों तक का ही साथ था, ऐसा मानकर हमें संतुष्ट हो जाना चाहिए। वैसे तो हम बुजुर्ग हो चुके थे, इसलिए जब अपना स्थान छोड़ेंगे, तब नए पत्तों को स्थान मिलेगा। वे भी खिलेंगे, उन्हें भी पल्लवित होने का मौका मिलेगा। यही प्रकृति का नियम है।” एक जर्जर पत्ते ने अपनी बात रखी।
“हम बुजुर्गों का गिरना तो प्रकृति का नियम है। मगर जो हरे पत्ते धरा पर गिरे, उनका क्या?” एक हरे पत्ते ने अपनी पीड़ा जताई।
“वो लोग शायद पेड़ की संस्कृति से एकरूप नहीं हुए होंगे या कमजोर डाली पर उगे होंगे। ऐसे लोग जरा-सी तेज हवा में भी गिर जाते हैं। गिरने के बाद वे अपने अस्तित्व को खो देते हैं। वैसे अपनी ज़मीन से कटना किसे अच्छा लगता है? फिर चाहे हम पत्ते हों या इंसान जैसे अन्य प्राणी।” दूसरे बुजुर्ग पत्ते ने दर्शन की बात बताई।
जीवन में कई पतझड़ और वसंत देख चुका वह पेड़, प्रकृति के कालचक्र को समझते हुए चुपचाप स्थिर खड़ा उनकी बातें सुन रहा था। आज भी वह अपनी जड़ों से जुड़ा था। वह जानता था कि पतझड़ के खत्म होते ही उसके रन्ध्रों से फिर नई कोपलें जन्म लेंगी, नए पत्ते उगेंगे, वसंत आएगा और प्रकृति में बहार आएगी।
प्रतीक्षा
शाम छह बजे। स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर तीन।
68 साल के दादाजी बेंच पर बैठे थे। हाथ में अटैची, आंखों में चमक। दस साल बाद बेटा अमेरिका से आ रहा था। दादाजी रोज़ दिन गिनते थे — बस एक दिन और। उनकी चाह थी: बेटा आए, गले लगे, कहे; बाबूजी, अब आप मेरे साथ चलो।
ठीक सामने, उसी बेंच के दूसरे कोने पर 24-25 साल की मीरा बैठी थी। हाथ में टिकट, आंखों में आंसू। चार साल बाद उसे कॅनाडा की स्कॉलरशिप मिली थी। उसकी चाह थी:
ट्रेन आए, वो भागे और कहे; पापा, अब मैं उड़ना चाहती हूँ। ट्रेन की सीटी बजी। दादाजी उठकर खड़े हो गए, आ गई… आ गई।
मीरा ने दुपट्टे से आँख पोंछी, आ गई… अब जाना होगा।
ट्रेन रुकी। एक ही डिब्बे से एक लड़का उतरा, एक लड़की चढ़ी।
दादाजी का बेटा उतरा। सूट-बूट, हाथ में आई फोन। दादाजी दौड़े, बेटा!
बेटे ने गले लगाया, पर नजर घड़ी पर थी। बोला, पापा, दो घंटे की कनेक्टिंग फ्लाइट है दिल्ली से। बस आपसे मिलना था। माँ की तेरहवीं पर नहीं आ पाया था ना !… सॉरी। कंपनी ने छुट्टी नहीं दी। आप चल रहे है ना मेरे साथ?
दादाजी की दस साल की चाह, दस सेकंड में बुझ गई। बोले, तू जा बेटा। मैं यहां ठीक हूँ।
अपनी मिट्टी छोड़कर मैं जी नहीं पाऊंगा।
उसी डिब्बे में मीरा चढ़ रही थी। खिड़की से उसके पापा चिल्लाए,- बिटिया, मत जा।
तेरी माँ के बाद अब तू ही तो मेरा सहारा है। तेरे बिना पैसा किस काम का ?
मीरा की चार साल की चाह, चार सेकंड में कांप गई। पर उसने खिड़की से हाथ हिलाया, पापा, मैं लौटूंगी। बस एक बार उड़ लेने दो।
ट्रेन चली गई।
प्लेटफॉर्म पर दो लोग रह गए। एक की चाह थी ‘आना’, पर आया और आकर चला भी गया। दूसरी की चाह थी ‘जाना’, पर जाते-जाते कुछ छोड़ गई।
दादाजी ने खाली बेंच देखा। मीरा के पापा ने खाली पटरी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
कुछ नहीं कहा। बस एक ही बेंच पर बैठ गए।

