दिन विशेष प्रवासी रचना : “बेतवा के किनारे, इतिहास के गलियारे में” – डॉ. वंदना मुकेश

डॉ. वंदना मुकेश
ई-मेल : vandanamsharma@hotmail.co.uk
साहित्यकार
निवास : 35 ब्रुकहाउस रोड, वालसल, ब्रिटेन

कहते हैं कि देवस्थलों पर जाना सहज संयोग नहीं होता। जब देवी-देवता आपको बुलाते हैं, तभी आप जा सकते हैं। कोई प्रश्न उठा सकता है कि विज्ञान और तकनीकी विकास के युग में यह किस युग की बात हो रही है? किंतु आस्था का, विश्वास का कोई युग नहीं होता। आस्था या तो होती है या नहीं होती है। इंग्लैण्ड में रहते हुए पच्चीस वर्ष हो गए। पर, उससे पहले पंद्रह वर्ष पुणे में रहे, उससे भी पहले कभी सोचा था कि वैष्णव देवी के दर्शन करने हैं। लेकिन, आज तक नहीं जा पाई हूँ। परम पिता ने हर तरह से सबल बनाया है किंतु अभी तक वहाँ से बुलावा नहीं आया।कितने आश्चर्य की बात है कि सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसीवाली रानी थी’ से झाँसी के विषय में तो बहुत बार सुना किंतु ओरछा का नाम सुनने की कोई स्मृति में नहीं। पापा के मुँह से सुनी एक और बुंदेलखण्डी कहावत याद रह गई है,
“झाँसी गले की फाँसी, दतिया गले का हार, ललितपुर न छोड़ियो, जब तक मिले न उधार।“
मेरे पापा यह किस संदर्भ में कहते थे, वह तो याद नहीं। किंतु, पूरी कहावत छंदबद्ध होने के कारण यादों में रही। उसके साथ-साथ पापा की याद भी दिलाती रही जिन्होंने पुराण, रामायण तथा महाभारत आदि की कथाएँ सुनाईं। पुस्तकों को पढ़ने का शौक जगाया और प्राचीन भारतीय इतिहास और विश्व से मेरा परिचय कराया। इंग्लैँण्ड-प्रवास के बाद, जब कभी साल-डेढ़ साल में भारत जाना होता है तो परिवार से मिलने-जुलने में ही पंद्रह दिन बीत जाते और हम कहीं जाने की सोच ही न पाते। मैं सितंबर 2025 में, राष्ट्रीय निर्मल वर्मा लेखन पुरस्कार ग्रहण करने इंग्लैण्ड से अपने पति डॉ. मुकेश सहित भोपाल गयी। सम्मान समारोह के पश्चात मेरी किसी मंदिर में जाने की इच्छा थी। मेरी बड़ी बहन श्रीमती इंदिरा सनोठिया, बड़े भाई श्री रविंद्र कुमार सिरोठिया और भाभी श्रीमती मधु सिरोठिया के सौजन्य और सान्निध्य में झाँसी और ओरछा जाने का कार्यक्रम बन गया । ओरछा से राम राजा ने बुलावा भेज दिया था। इस कार्यक्रम को सुगम और सुविधापूर्ण बनाने में मेरी बड़ी बहन की ननद, श्रीमती उर्मिला शुक्ला का बहुत बड़ा सहयोग था, जो उस समय संचालनालय, पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, म.प्र. भोपाल की आयुक्त थीं। सोलह सितंबर की सुबह ग्यारह बजे हम पाँच लोग कार से ओरछा-झाँसी के लिए रवाना हुए। हमें बताया गया था कि पाँच-छह घण्टों में हम अपने गंतव्य पर पहुँच जाएँगे। लेकिन हमने रास्ते में साँची का स्तूप देखने का समय जोड़ा ही नहीं। तो हमारा सबसे पहला पड़ाव साँची का स्तूप ही था। ऐतिहासिक इमारतों को देखते हुए इतिहास के गलियारों में खो जाना मुझे सदा ही आकर्षित करता है।
चिलचिलाती धूप और भयानक गर्मी के करण साँची स्तूप देखने का आनंद जी-भर कर न ले सके। लेकिन उसकी भव्यता और उससे जुड़े इतिहास को अपनी स्मृति में समेटे हम भोजन के लिए मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के रेस्टॉरेंट में गए तो भीतर ए.सी. की ठंडी हवा और बाहर तपती धूप के कारण आगे की यात्रा पर जाने का मन ही नहीं हो रहा था। लेकिन झाँसी पहुँचते-पहुँचते रात के सात-आठ तो बजेंगे–यह समझ में आ गया था। गाड़ी में पहले झाँसी या पहले ओरछा -पर चर्चा हुई, हमारे पास डेढ़ दिन का ही समय था। राजा राम ने कहा, भटको मत। सो, पहले ओरछा जाने का तय हुआ। जल्दी पहुँचने के चक्कर में कोई शार्टकट ले लिया और रास्ता लंबा होता चला गया। कई जगहों पर तो स्ट्रीट लाइट तक नहीं थी। ऊबड़-खाबड़, कच्ची-पक्की सड़कों पर हिचकोले और दचके खाते हुए ऐसा लग रहा था की हम उस रात कहीं पहुँच पाएँगे कि नहीं? खैर भगवान श्रीराम ने भी तो आजीवन संघर्षों का सामना किया था, तो हम क्या चीज़?
किंतु अचानक गहन अंधकार में चमत्कार की तरह एकाएक ही स्ट्रीट लाइटें दिखने लगीं। अंततः रात साढ़े नौ बजे हम बेतवा रिसॉर्ट पहुँचे। अँधेरे में सीढ़ियाँ चढ़कर, एक बगीचा पारकर हम अपने- अपने कमरों में पहुँचे। रात हो जाने पर भी गर्मी अच्छी-खासी थी। भोजन करके सो गए। सुबह नौ बजे नाश्ता करके दस बजे दर्शन करने जाना था। क्या संयोग था कि एकादशी का दिन था! उपवास के नाश्ते में साबूदाने की खिचड़ी की व्यवस्था पिछली रात ही करवा ली थी।
मैं सुबह जब कमरे से बाहर निकली तो एक बंदर सामने मुंडेर पर बैठा था। मैंने कहा, जय हो हनुमान जी, तो वह दाँत निपोरने लगा। यह देखकर मुझे हँसी आ गई। मैंने सोचा कि जहाँ राम हैं वहाँ हनुमान तो होंगे ही। तभी बंदर परिवार भी हमारे दर्शन करने आ गया। बेतवा रिसॉर्ट बहुत ही खूबसूरत था। कमरे के बाहर हरी-हरी घास का सुंदर बगीचा, कुछ दूरी पर दिखता बेतवा नदी का तट, सूर्य की किरणों से सुनहरा बेतवा का पानी।
वहाँ बँधी कुछ नावें और कानों में लाउडस्पीकर पर राजाराम मंदिर से आते भजनों की मधुर ध्वनि। कुल मिलाकर वातावरण आनंद-विभोर करने वाला था। हम शीघ्र ही तैयार होकर मंदिर की ओर चल पड़े, सुबह के दस ही बजे थे; लेकिन, धूप और गर्मी अपना रंग दिखा रही थी। मंदिर तक का रास्ता धूल-मिट्टी से भरा था। विदेश में इतने बरस रहने के बाद मन यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि काश! यहाँ बेहतर सड़कें होतीं। ओरछा राजा राम की राजधानी है। इस छोटे से कस्बे में स्थानीय लोगों के अतिरिक्त अधिकांश लोग बाहर के दर्शनार्थी ही थे जो आस-पास के ग्रामीण इलाकों से ही नहीं बल्कि दूसरे दूर-पास के शहरों से आए थे। ओरछा में छोटे-बड़े होटल, बड़े-बड़े रिसॉर्ट की कमी नहीं है। बेतवा नदी के तट पर बसा ओरछा का अपना सौंदर्य है, क्योंकि यह प्राचीन भारतीय इतिहास की दृष्टि से भी बुंदेलखण्ड का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।
मंदिर प्रांगण के बाहर से ही लाइन लगी थी। हमें बहुत अच्छे दर्शन हुए बड़ा-सा आँगन सामने राजाराम का मंदिर। विशेष व्यवस्था के तहत हमने मंदिर में दर्शन पाए, प्रांगण में स्थित एक विशिष्ट शिवलिंग और गौरी का पूजन भी किया। ‘राजाराम सरकार की जय, ओरछा धाम की जय, जय सिया राम, हरे राम हरे कृष्ण’ की गूँजों से भरे वातावरण में भक्तगणों की धार्मिक भावना का उत्साह देखते ही बनता था। आँगन में फूल-पत्ते बिखरे थे। लेकिन, निरंतर सफाई भी हो रही थी, एक अति वृद्ध व्यक्ति और एक-दो महिलाएँ झाडू से निरंतर सफाई कर रहे थे। हनुमान जी, कहीं दुर्गा जी के चित्र और छोटे-छोटे से मंदिर और रामचरित मानस की चौपाइयाँ दीवारों पर। पूरा वातावरण एक अनोखे श्रद्धा-भाव से भरा था। उसी आँगन में एक स्थान पर अपना मनौतियाँ पूरी करवाने के लिए भक्तगण मौली और कपड़े की गाँठे बाँध रहे थे। मैंने भी एक स्कार्फ बाँधा और वहीं मंदिर प्रांगण में बैठ गई। मैं पैर में तकलीफ के कारण चल तो सकती थी पर खड़े रहने में दर्द ज्यादा हो रहा था। आते-जाते भक्तिभाव में डूबे भक्तगणों को देखती रही और उन्हीं के साथ उसी भाव में डूबती-उतराती रही, ‘मैं देखूँ जिस ओर सखी री सामने मेरे साँवरियाँ’। हम तथाकथित आधुनिक कहे जानेवाले लोग अपने भावों की अभिव्यक्ति से हमेशा बचते हैं। अपना भक्तिभाव को भी प्रकट नहीं होने देना चाहते कि कहीं लोग हमें पिछड़े होने का लेबल न लगा दें।
सोलहवीं सदी में ओरछा की महारानी गणेशकुँवरी श्रीराम की बड़ी भक्त थीं जबकि उनके पति राजा मधुकर शाह श्रीकृष्ण के। किंतु मधुकर शाह ने रानी को चुनौती दी थी कि इतनी बड़ी रामभक्त हो तो अपने राम को यहाँ ले आओ। रानी ने तप और साधना की। कहते हैं कि श्रीराम ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और तीन शर्तें रखी कि वे अयोध्या से पुष्य नक्षत्र में प्रस्थान करेंगे और जहाँ वे उन्हें रख देंगी वहीं स्थापित हो जाएँगे, वे स्वयं ओरछा के राजा होंगे। अयोध्या से बाल-रूप श्रीराम की प्रतिमा को लेकर रानी गणेशकुंवरि साधु संतों और महिलाओं के बड़े काफिले के साथ अयोध्या से पांच सौ किमी दूर ओरछा की यात्रा पर निकल पड़ीं। साढ़े आठ माह में प्रण पूरा करके रानी सन् 1574 की रामनवमी को ओरछा पहुँचीं। रानी ने भगवान का विग्रह महल की भोजनशाला में रख दिया और उनके लिए प्रसाद बनाने लगी और रामराज वहीं स्थापित हो गए, उनके लिए बना भव्य मंदिर खाली रह गया। जब उन्हें यहाँ लाया गया था तो ओरछा नरेश मधुकर शाह ने सैन्यबल के साथ भगवान राम का ओरछा में शाही सम्मान से स्वागत किया, यहाँ उन्हें राजा की तरह सम्मान दिया जाता है और स्थानीय पुलिस बल द्वारा सशस्त्र सलामी दी जाती है। कहा जाता है कि रामराजा दिन में ओरछा में राज करते हैं और रात को सूक्ष्म रूप में अय़ोध्या जाते है। कितनी कहानियाँ और कितने रूप! यहाँ श्रीराम को एक भगवान के बजाय एक राजा के रूप में पूजा जाता है और उनकी अदालत लगती है।
हमने प्रसाद के लड्डूओं के कई पैकेट खरीदे, इंग्लैण्ड जो ले जाना था। प्रसाद में रामलला के भोग की थाली बुक करके हम लगभग ग्यारह बजे ओरछा का किला देखने निकल पड़े। ओरछा में कई ऐतिहासिक स्थल हैं। किंतु, ओरछा का किला अपनी विशिष्ट वास्तुकला और नक्काशी के लिए जाना जाता है। सबसे पहले हम जहाँगीर महल गए। इस महल का निर्माण राजा बीर सिंह देव ने तत्कालीन मुगल सम्राट जहाँगीर के सम्मान में बनवाया था, हालाँकि जहाँगीर यहाँ कभी नहीं आया। इसका मुख्य द्वार बेतवा नदी की ओर खुलता है। इसमें कुल एक सौ तीस कमरे हैं। यह चार-मंजिला भूल-भुलैया युक्‍त भव्‍य भवन है। इसके कमरों के दरवाजे़ चारों ओर हैं तथा मध्‍य की दो मंजिलों में दोनों तरफ झरोखे हैं। ऊपरी छत के प्रत्‍येक कोने पर गोल मीनारें हैं, जिन पर गोल छज्‍जे एवं गुम्‍बदे हैं, जिन्हें हमने नीचे से ही देखा। जहाँगीर महल बुन्‍देली वास्‍तुकला और स्‍थापत्‍य का एक सर्वोत्‍तम नमूना है। महल के दरवाज़े को हाथियों की मूर्तियों से अलंकृत किया गया है। इसी महल के पास ऊँटघर और बारूदघर बने हुए हैं। इसी महल के एक ओर वीरदेव सिंह ने अपने दरबार की प्रसिद्ध गायिका एवं नर्तकी प्रवीण राय के लिए अलग से एक हवेली एवं वाटिका का निर्माण कराया था।
जहाँगीर महल और राम-मंदिर के बीच में भव्य रानीमहल बना है। रानीमहल के शयनकक्ष की खिड़की से चतुर्भुज मंदिर के विग्रह के सीधे दर्शनों की व्यवस्था थी, यह बात और है कि रामराजा सरकार ने भोजनशाला में ही अपना स्थान बना लिया था। राजाओं और रानियों ने अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक निवास किया। महल के अन्दर के कक्षों में देवी-देवताओं, पौराणिक पशुओं और लोगों के चित्रों से सजाया गया था। महल के ऊपरी मंजिल के छत और दीवारों में दर्पण के निशान मिलते हैं। इसका स्थापत्य और वास्तुकला अद्भुत है। कमरों में सूर्य की रोशनी तथा तापमान के अनुकूलन की व्यवस्था है। महल की आंतरिक दीवारों में भगवान विष्णु और महाभारत के चित्र बने हैं। डायनोसॉर जैसे बड़े आकार के उड़नेवाले विशालकाय पक्षियों के चित्र हैं। हालाँकि बहुत से चित्र आक्रमणकारियों द्वारा खुरच-खुरच कर मिटा दिए गए हैं लेकिन फिर भी छत पर बनी कलाकृतियाँ और चित्रों के रंग भी अब तक काफी गहरे हैं। इस महल में कई गुप्त मार्ग हैं। अब तक देखे ऐतिहासिक स्मारकों में से यह एक था जहाँ सिपाहियों आदि के शौचादि जाने के लिए व्यवस्था दिखाई दी। कुल मिलाकर बुंदेलखण्ड इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय के अवशेषों को देखकर, उस काल के वैभव की कल्पना करते हुए हम भोजन और विश्राम के लिए बेतवा रिसॉर्ट लौटे।
राजाराम का भोग भी तो भाग्य से ही मिलता है, सो एकादशी होते हुए भी प्रसादस्वरूप स्वादिष्ट भोजन पाया। विश्राम करके शाम के समय हम बेतवा नदी कंचन घाट पर ओरछा की प्रसिद्ध छत्रियाँ देखने गए, यहाँ नदी में डूबते सूर्य का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। बुंदेला शासकों–महाराजा मधुकर शाह, राजा वीर सिंह देव और अन्य प्रमुख शासकों की और उनके परिवार के सदस्यों के दाह संस्कार वाले स्थानों पर अत्यंत भव्य स्मारक छतरियाँ बनाई गई हैं। इनका बाहरी हिस्सा गुंबदों और मेहराबों वाली मुगल शैली से प्रभावित है, जबकि इनका शिखर पारंपरिक भारतीय और नागर शैली का है। यहाँ गुंबदों पर बैठे गरुड़ पक्षी देखना एक विरल दृश्य था।
आजकल, मध्यप्रदेश संस्कृति एवं पर्यटन विभाग रोज रात को लाइट एंड साउंड शो आयोजित करता है। सो, शाम को हम देखने गए; किंतु, बीच में दो बार बिजली चली गई। जेनरेटर चलने में हर बार दस मिनिट लग गए। महल के शाही मच्छर भी हम पर्यटकों का स्वागत करने आ गए और घुलने-मिलने की इतनी कोशिश की कि कितने ही कुसमय काल के गाल चले गए। उनके लिए तो कोई स्मारक बनने से रहा। किसी तरह शो पूरा हुआ और लाइट एंड साउंड शो में सुना हरदौल का एक सुमधुर लोकगीत- ‘अइयो अइयो हजारी हरदौल तुम्हारे बल पै ब्याह रचौ’ स्मृति में रह गया। बहन-भाई के प्रेम और स्नेह के इस मार्मिक गीत को गाते-गाते कितनी ग्रामीण महिलाएँ भाव-विभोर हो रोने लगती हैं। वहाँ हमने एक प्राइवेट कंपनी के स्टूडियो में सौ रुपये का टिकट लेकर ओरछा के वर्च्युअल भ्रमण का आनंद भी लिया।
अगले दिन सुबह हमारी ओरछा से रवानगी थी। समय की कमी के कारण झाँसी का कार्यक्रम बनता नहीं दिख रहा था; इसलिए, यह तय हुआ कि नाश्ता करके, चैक आउट करके हम हरदौल लला की समाधि देखते हुए इंदौर निकल जाएँगे, जहाँ से अगली रात दिल्ली होते हुए हमारी लंदन की फ्लाइट थी। राजा हरदौल, राजा वीरदेव सिंह के कनिष्ठ पुत्र थे। जैसे गुजरात में नरसी जी का भात प्रसिद्ध है, उसी प्रकार बुंदेलखण्ड में हरदौल लला का भात प्रसिद्ध है। लोक में राजा हरदौल भगवान की तरह पूजे जाते हैं।
बुंदेलखण्ड में ऐसी मान्यता है कि राजा हरदौल ने अपनी बड़ी बहन कुंजावती के बुलावे पर मृत्योपरांत अदृश्य रूप से आकर उनकी पुत्री के विवाह में भात भरा। ग्रामीण हो या शहरी, जनमानस की राजा हरदौल पर अटूट आस्था और विश्वास है हरदौल से प्रार्थना करो तो बेटी का विवाह शीघ्र होता है। तभी से बुंदेलखण्ड क्षेत्र में विवाह का पहला निमंत्रण राजा हरदौल को जाता है। विवाह होने के पश्चात नए दूल्हा-दुल्हन या परिवार द्वारा हरदौल की समाधि पर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा आज भी जारी है। जब हम वहाँ पहुँचे तो दर्शनार्थियों की भीड़ लगी थी। किंतु प्रभु- कृपा थी कि हम हरदौल की समाधि दर्शन सुगमता से प्राप्त कर सके। मंदिर के प्रांगण में पुरुषों की दो भजन-मंडलियाँ बुंदेलखण्डी में लोक में प्रचलित भजन-कीर्तन कर रहे थे जो किसी प्रतियोगिता सा लग रहा था। बाहर स्थानीय दुकानों में खेल खिलौने, चूड़ी- बिंदी, कुंकुम बिक रहे थे। इस तीर्थ से स्मृति-स्वरूप चूड़ियाँ खरीदीं। मिट्टी का तवा और एक कढ़ाई खरीदी और इंग्लैँड तक ले भी आई।
हर स्थान पर मन में यह विचार निरंतर आता रहा कि हमारे भारतीय तीर्थ स्थानों को और सुंदर कैसे बनाया जाए? नागरिकों में यह जागृति कैसे आए कि कचरा इधर-उधर न फेंक कर कचरे के डिब्बे में डालें। फिर, ध्यान गया कि वहाँ कचरे के डिब्बे ही नहीं थे। इस विषय में प्रत्येक पर्यटक और दर्शनार्थी को सजग होना पड़ेगा। इन स्थानों को अपना घर समझना होगा, अपनी सोच का विस्तार करना होगा और समष्टि-हित के बारे में सोचना होगा। जब हम अपने परिवेश को सुरक्षित रख सकेंगे तो भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध कर सकेंगे।
वैसे, यह कार्य शासन से ज़्यादा जनता का, अर्थात प्रत्येक व्यक्ति का है। पश्चिमी देशों के पर्यटन स्थलों, धार्मिक स्थल-गिरिजाघरों आदि में यही अंतर है कि वहाँ आम आदमी अपने कर्तव्यों के प्रति सजग है। हमारे अद्भुत तीर्थस्थलों की स्वच्छता के प्रति प्रशासन को विशेष ध्यान देना होगा। ओरछा छोड़ते ही बड़ी बहन ने फोन लगाकर, दतिया के अपने किसी परिचित को फोन करके कार में बैठे -बैठे ही सिद्ध पीतांबरा पीठ दर्शनों की व्यवस्था कर ली। यह हमारे कार्यक्रम में नहीं था लेकिन माँ बगलामुखी ने हमें बुला भेजा था। पीतांबरा पीठ में हम लगभग पौने एक बजे पहुँचे। यह हमारा सौभाग्य था कि इधर हमने दर्शन किए, उधर पट बंद हुए। पीले फूलों से ढँकी सफेद संगमरमर की माँ बगलामुखी की मुस्कुराती प्रतिमा की क्षणिक छवि देखकर ही मन प्रसन्न हो गया। आँखों में वह रूप लिए चले आए। माँ को पीला रंग प्रिय है। कहते हैं कि पीताम्बरा पीठ में माता सती का मुकुट गिरा था। यह स्थान भारत के इक्यावन शक्ति पीठों में से एक है। यहाँ महाभारतकालीन एक प्राचीन शिव मंदिर और माँ धूमावती का मंदिर भी है। एक विशेष बात, माँ धूमावती देवी को अन्य देवियों और भगवानों की तरह मीठे का नहीं, नमकीन वस्तु-समोसा-कचौड़ी, नमकीन सेव आदि का भोग लगाया जाता है। मंदिर प्रांगण में तंत्र सिद्धि साधनारत स्त्री- पुरुष भी अपने-अपने कक्षों के बाहर नेत्र बंद किए बैठे दिखे। विशाल यज्ञशाला और सभी भक्तों के लिए भोजनशाला भी। सिद्ध स्थान श्री पीतांबरा पीठ के दर्शनों का लाभ लेकर हम इंदौर की ओर रवाना हो गए।
सितंबर 2025 में हुई इस यात्रा पर लगभग हजार-बारह सौ शब्दों के नोट्स तो यात्रा के दौरान ही बन गए थे। आधा-अधूरा लिख कर सहेज कर कंप्यूटर के झोले में भी रख दिया था। अप्रैल 2026 की इंदौर से सौ वर्षों से सतत निकालने वाली वीणा पत्रिका में डॉ. नर्मदाप्रसाद जी सिसोदिया का यात्रा-संस्मरण, ‘राजाराम ओरछा धाम’ पढ़ा और उससे प्रेरित होकर मैंने भी अपना अधूरा यात्रा-संस्मरण पूरा किया। तो, इस हेतु उन्हें धन्यवाद देना तो बनता ही है। उनके इस संस्मरण ने मुझ पर ‘जिमि अमोघ रघुपति कर बाना’ का सा असर किया और जिस प्रकार हनुमान जी ने सीता जी को ढूँढकर ही चैन लिया, मैंने भी जब तक अपना यह अधूरा यात्रा-संस्मरण पूरा करके ही विश्रांति ली।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »