दिन विशेष युवा लेखन : ग़ज़ल – अजय जायसवाल ‘अनहद’
अजय जायसवाल ‘अनहद’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के मछली शहर स्थित अगहुआ बाजार (किशुनदासपुर) के मूल निवासी हैं तथा वर्तमान में श्री हनुमत इंटर कॉलेज, धम्मौर (सुलतानपुर) में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं। साहित्यिक क्षेत्र में वे हिन्दी सेवा संस्थान (अमेठी) के अध्यक्ष पद का निर्वहन करने के साथ-साथ राष्ट्रीय कवि संगम, प्रेरणा हिन्दी प्रचारिणी सभा (जबलपुर), उत्तर प्रदेश साहित्य सभा, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ एवं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ जैसी विभिन्न राष्ट्रीय व प्रांतीय संस्थाओं से संबद्ध हैं। उनकी रचनाएँ ‘हिन्दी सामना’, ‘अमर उजाला’, ‘वायस ऑफ अमेठी’, ‘शबरी’ और ‘अभ्युदय’ सहित देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। ‘बद्दुआ माँगता हूँ’ (ग़ज़ल-संग्रह), ‘कदम कदम पर दीवारें’ (काव्य-संग्रह) तथा ‘सहरा से सागर तक’ (प्रकाशनाधीन ग़ज़ल-संग्रह) उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं, जबकि ‘महक शब्दों की’, ‘प्रेम: राधा कृष्ण सा’, ‘बदलाव’, ‘भाव वाटिका’ और ‘एहसास-ए-मोहब्बत’ जैसे साझा संकलनों में भी उनकी रचनाएँ शामिल हैं। उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक साधना एवं सेवाओं के लिए उन्हें विश्व हिन्दी सचिवालय (मॉरीशस), सृजन ऑस्ट्रेलिया, मराठा विद्या प्रचारक समाज, जिलाधिकारी व सांसद (सुलतानपुर) तथा उ०प्र० माध्यमिक शिक्षा परिषद् समेत देश-विदेश के अनेक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
अजय जायसवाल ‘अनहद’
प्रवक्ता हिन्दी
श्री हनुमत इंटर कॉलेज धम्मौर सुलतानपुर
१ . ग़ज़ल
झूठ की दुनिया बसा कर क्या करोगे,
काग़ज़ी कश्ती चला कर क्या करोगे।
स्वर्ग-सी धरती का सत्यानाश करके,
चाँद पर भी घर बना कर क्या करोगे।
पेड़, नदियाँ, पर्वतों को काट डाले,
रेत के जंगल उगाकर क्या करोगे।
बाग़ में तितली नहीं,चिड़ियाँ नहीं हैं,
फूल गमलों में लगाकर क्या करोगे।
माँ की आँखों से अगर आँसू बहें तो,
नाम दुनिया में कमाकर क्या करोगे।
बेटियों की चीख यदि सुन ही न पाए,
देवताओं को रिझा कर क्या करोगे ।
झील, दरिया, ताल गंदे करके अनहद,
एक दिन गंगा नहाकर क्या करोगे।
२ . ग़ज़ल
सपने तमाम भूख के क़ब्ज़े में आ गए,
बच्चे किताब छोड़ के जलसे में आ गए।
सस्ता हुआ ज़मीर तो हैरत बहुत हुई,
फ़नकार भी अमीर के मुजरे में आ गए।
दीवार एक खींच दी आँगन के दरमियाँ,
रोटी के अब निवाले भी झगड़े में आ गए।
बेटी जवान क्या हुई, बढ़ने लगी शिकन,
मज़दूर बाप कितने ही कर्जे में आ गए।
आँखों में एक चाँद सजाने की चाह थी,
अच्छा हुआ कि तुम मेरे हिस्से में आ गए।
इतना असर था उसकी निगाहों में इश्क़ का,
पत्थर भी टूट टूट के सजदे में आ गए।
एक शे’र क्या कहा कि ग़ज़ल गूँजने लगी,
हम भी अदब के शहर के चर्चे में आ गए।
कुछ दर्द उम्र भर ही भुलाए न जा सके,
मंज़र वो बारहा मेरे क़िस्से में आ गए।
आँसू किसी ग़रीब के खाली न जाएंगे,
अनहद निज़ामे-वक़्त भी फाँके में आ गए।
३ . ग़ज़ल
तो प्यार करना
अगर समझते हो साथ दोगे,
अदालतों तक, तो प्यार करना,
खड़े रहोगे, हमारी जानिब,
बगावतों तक, तो प्यार करना ।
रुकावटें गर मिलें सफर में,
डरा सकें ना कोई भी तूफां,
दिखा सको तुम यकीं वफ़ा पे,
इबादतों तक, तो प्यार करना ।
कभी खफ़ा मैं हुआ ज़रा तो,
सदा समझना अदाएं दिल की,
मना सको गर गले लगा कर,
शिकायतों तक, तो प्यार करना ।
ख़याल बुनना बहुत सरल है,
जर ओ जवाहर, हसीन घर के,
मिला सको गर नज़र नज़र से,
हक़ीक़तों तक, तो प्यार करना ।
बसा लिया दिल के आइने में,
सफर में कश्ती, उतार दी है,
बचा सको गर वफ़ा को अनहद,
क़यामतों तक तो प्यार करना ।


Bhut hi acchi lgi Shaandaar